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अमेरिका में गर्भपात क़ानून: ज़िंदगी पर किसका हक़, महिला का या भ्रूण का?
- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
अमेरिका के टेक्सस राज्य में नए क़ानून के अनुसार गर्भवती महिलाओं को पहले छह हफ़्तों के भीतर गर्भपात कराने का अधिकार दिया गया है.
ये क़ानून एक सितंबर से लागू हुआ है और इस नए क़ानून के अनुसार अगर कोई डॉक्टर इस समय सीमा से बाहर गर्भपात करता है, तो उसके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई का भी प्रावधान किया गया है.
अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट में इस क़ानून पर रोक लगाने की अपील की गई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से फ़ैसला करते हुए नए क़ानून पर रोक लगाने से मना कर दिया.
अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को महिलाओं के अधिकारों पर 'अभूतपूर्व हमला' बताया है.
दुनिया के शक्तिशाली देशों में से एक अमेरिका की बात की जाए, तो यहाँ की सुप्रीम कोर्ट ने साल 1973 में एक मामले की सुनवाई करते हुए देशभर में गर्भपात को वैध करार दिया था लेकिन गर्भपात का मामला हमेशा से यहाँ कंज़र्वेटिव पार्टी के समर्थनकों के निशाने पर रहा है.
अमेरिका में काम करने वाली एक शोध संस्था गुटमाकर इंस्टिट्यूट के मुताबिक़ देश के अलग-अलग राज्यों में गर्भपात को लेकर अपने क़ानून हैं. पिउ रिसर्च सेंटर के अनुसार अमेरिका में गर्भपात एक ऐसा मुद्दा है, जहाँ कांग्रेस सदस्यों में विभाजन साफ़ दिखाई देता है.
लगभग सभी डेमोक्रेट गर्भपात के अधिकारों का समर्थन करते नज़र आते हैं, वहीं लगभग सभी रिपब्लिकन पार्टी के सदस्य गर्भपात के विरोध में खड़े दिखते हैं. सेंटर के मुताबिक़ अमेरिका की जनता में इतना बड़ा विभाजन नहीं दिखाई देता.
इतना ही नहीं हाल में हुए राष्ट्रपति चुनाव में ये एक बड़ा मुद्दा उभर कर सामने आया था. साल 2020 के जनवरी महीने में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप गर्भपात के विरोध में एक बड़ी रैली में शामिल हुए थे और वो ऐसा करने वाले पहले राष्ट्रपति बताए जाते हैं.
क़ानून के पक्षधर
इस क़ानून को 'हार्टबीट एक्ट' कहा जा रहा है और इसे प्रो-लाइफ़ समूह का समर्थन हासिल है. उनका मानना है कि इस क़ानून से कई बच्चे दुनिया में आ सकेंगे. इस क़ानून को हार्टबीट एक्ट इसलिए भी बताया जा रहा है, क्योंकि छह हफ़्ते में गर्भ में पल रहे भ्रूण में धड़कन आ जाती है.
लेकिन अमेरिकन कॉलेज ऑफ़ ऑब्स्टट्रिशन एंड गाइनोक्लोजिस्ट का कहना है कि ये नाम भ्रमित करने वाला है.
गर्भपात को लेकर अलग-अलग राय सामने आती रही हैं. एक पक्ष के अनुसार गर्भपात कराना एक महिला की अपनी इच्छा और उसके प्रजनन के अधिकार का मामला है, वहीं दूसरी राय ये हैं कि राज्य जीवन के सरंक्षण के लिए बाध्य है और इसलिए भ्रूण को सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए.
मैक्स अस्पताल में प्रिंसिपल कंसल्टेंट और स्त्री रोग विशेषज्ञ, डॉ. भावना चौधरी का कहती हैं, ''अल्ट्रासाउंड करने वाली उच्च तकनीक की मशीनें छह हफ़्ते के भ्रूण में हार्टबीट का पता लगा लेती हैं, लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि एक महिला को गर्भपात कराने का अधिकार नहीं होना चाहिए.''
एशिया सेफ़ अबॉर्शन पार्टनरशिप नाम से काम कर रहे नेटवर्क की संयोजक डॉ सुचित्रा दलवी इस बात को आगे बढ़ाते हुए कहती हैं कि डेमोक्रेट हमेशा प्रो-चॉयस (चयन) रहे हैं और रिपब्लकिन ख़ुद को प्रो-लाइफ(ज़िंदगी) कहते हैं लेकिन हमारे हिसाब से वो प्रो लाइफ़ नहीं हैं क्योंकि उनके लिए औरत की ज़िंदगी के कोई मायने ही नहीं है बल्कि वे भ्रूण की ज़िंदगी की बात करते हैं.
वे कहती हैं, ''औरत या लड़की जो गर्भवती हुई है उसकी ज़िंदगी की ज़्यादा क़ीमत है ना कि वो बच्चा, जो नौ महीने गर्भ में रहेगा और आगे जाकर जन्म लेगा.''
महिला अधिकार
वे कहती हैं, "ये जो 'हार्टबीट बैंड' है, ये महिलाओं के अधिकारों के लिए कतई नहीं है. उसके पीछे उनकी जो मानसिकता या दर्शन है वो ये है कि अगर महिला गर्भवती हो जाती है तो उसके शरीर, ज़िंदगी और चयन पर उसका अधिकार नहीं होता जो एक महिला के अधिकारों के बिल्कुल ख़िलाफ़ है. दरअसल ये महिला विरोधी है. सरकार की ज़िम्मेदारी है कि उसके हर नागरिक को उसका मौलिक अधिकार मिले."
सुरक्षित गर्भपात के मुद्दे पर पिछले 25 सालों से कई संस्थाओं के साथ काम कर रहीं डॉ सुचित्रा दलवी का कहना, ''हमें अमेरिका की राजनीति को समझना होगा. वहाँ धार्मिक समूह हमेशा से रहे हैं और वहाँ रूढ़िवादी मानसिकता रही है लेकिन नागरिक और धर्म ये दो अलग चीज़े हैं और उनको नियम क़ायदों को अलग रखना चाहिए. नागरिक होने के नाते हमारे अधिकार स्वतंत्र होते हैं कि हम किस धर्म का पालन करना चाहते हैं.''
वे मानती हैं कि ये भ्रूण के नाम पर औरतों को नियंत्रित करने की कोशिश है.
वे बताती हैं, ''भ्रूण को अधिकार किसने दिया. जब तक वो जन्म लेकर इंसान नहीं बनता है उसके मानवाधिकार तक नहीं हैं. जिसके शरीर में वो पल रहा है उसके शरीर को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और अगर वो गर्भ महिला को अपने शरीर में नहीं चाहिए तो किसी और को क्या अधिकार है कि वो ये बताए कि तुम ऐसा करो?''
भारत में क्या है क़ानून?
डॉ सुचित्रा दलवी मानती हैं कि भारत में गर्भपात का क़ानून दुनियाभर के क़ानूनों से कई मामलों में बहुत बेहतर है.
भारत की बात की जाए, तो मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेंसी (संशोधित) बिल 2020 को दोनों सदनों की मंज़ूरी मिल गई है.
भारत के स्वास्थ्य और कल्याण मंत्रालय के अनुसार इस बिल को राज्यसभा में 16 मार्च 2021 को पास किया गया है
इस बिल के मुताबिक़ गर्भपात की अवधि 20 हफ़्ते से बढ़ाकर 24 हफ़्ते की गई है.
इसमें कहा गया है कि ये समय सीमा विशेष तरह की महिलाओं के लिए बढ़ाई गई है, जिन्हें एमटीपी नियमों में संशोधन के ज़रिए परिभाषित किया जाएगा और इनमें दुष्कर्म पीड़ित, सगे-संबंधियों के साथ यौन संपर्क की पीड़ित और अन्य असुरक्षित महिलाएँ (विकलांग महिलाएँ, नाबालिग) भी शामिल होंगी.
इससे पहले भारत में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेन्सी एक्ट , 1971 था, जिसमें संशोधन किए गए हैं.
इस एक्ट में ये प्रावधान था कि अगर किसी महिला का 12 हफ़्ते का गर्भ है, तो वो एक डॉक्टर की सलाह पर गर्भपात करवा सकती है. वहीं 12-20 हफ़्ते में दो डॉक्टरों की सलाह अनिवार्य थी और 20-24 हफ़्ते में गर्भपात की महिला को अनुमति नहीं थी.
लेकिन इस संशोधित बिल में 12 और 12-20 हफ़्ते में एक डॉक्टर की सलाह लेना ज़रूरी बताया गया है.
इसके अलावा अगर भ्रूण 20-24 हफ़्ते का है, तो इसमें कुछ श्रेणी की महिलाओं को दो डॉक्टरों की सलाह लेनी होगी और अगर भ्रूण 24 हफ़्ते से ज़्यादा समय का है, तो मेडिकल सलाह के बाद ही इजाज़त दी जाएगी.
मैक्स अस्पताल में प्रिंसिपल कंसल्टेंट और स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ भावना चौधरी मानती हैं कि भारत का गर्भपात पर संशोधित क़ानून बहुत विचार-विमर्श के बाद आया है और कई बार बलात्कार पीड़ित लड़कियों, नाबालिग या मानसिक रूप से विक्षिप्त लड़कियों को अपनी प्रेग्नेंसी के बारे में पता ही नहीं चल पाता था और जब तक पता चलता था तो बहुत देरी हो जाती थी.
ऐसे में 24 हफ़्ते की जो छूट दी गई है, वो बहुत सही है.
दुनिया में क्या हैं गर्भपात पर क़ानून
दुनिया भर में अगर गर्भपात के नियमों की बात की जाए, तो वहाँ अलग-अलग नियम लागू होते हैं
डॉ दलवी अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए सवाल पूछती हैं कि अबॉर्शन टूरिज़्म जैसे टर्म कहाँ से आते हैं?
वे कहती हैं, ''जब औरतों के गर्भपात की अनुमति अपने देश में नहीं मिलती, तो वो विकल्प के तौर पर दूसरे राज्यों या देशों का रुख़ करती हैं, लेकिन ऐसे में वहीं औरतें बाहर जाकर गर्भपात करवा सकती हैं, जिनके पास उतना ख़र्च करने के लिए पैसे हैं.''
नेशनल सेंटर फ़ॉर बायोटेक्नोलॉजी इनफार्मेशन (एनसीबीआई) में छपी जानकारी से पता चलता है कि आयरलैंड से महिलाएँ गर्भपात कराने के लिए ब्रिटेन जाया करती थी. एनसीबीआई, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ हेल्थ की एक शाखा है.
हालाँकि अब आयरलैंड में महिलाएँ कुछ प्रावधानों के तहत गर्भपात करा सकती हैं.
डॉ दलवी आशंका ज़ाहिर करते हुए कहती हैं कि अब टेक्सस में भी ऐसा हो सकता है, लेकिन उन लड़कियों का सोचिए जिनके पास इतने पैसे नहीं हैं कि बाहर जाकर गर्भपात करवाएँ या अगर कोई लड़की परिवार के सदस्य द्वारा ही बलात्कार का शिकार होती है और गर्भ धारण कर लेती है, तो वो क्या करेगी?
वे कहती हैं, "हमारे क्षेत्र में पड़ने वाले देशों की बात करें, उदाहरण के तौर पर नेपाल को लें, तो वहाँ अगर कोई महिला तीन महीने की गर्भवती है तो उसे गर्भपात के लिए कोई कारण भी नहीं बताना पड़ता, ऐसे में वहाँ के क़ानून को प्रगतिशील कहा जा सकता है. वहीं वियतनाम, थाइलैंड में भी बेहतर क़ानून हैं. अगर इससे बाहर निकले तो फ्रांस और यूके में अच्छे क़ानून हैं. लेकिन जर्मनी और पोलैंड जैसे रूढ़िवादी देशों में गर्भपात को लेकर भारत से ख़राब स्थिति है."
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