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अफ़ग़ानिस्तान से भागे राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी यूएई ही क्यों पहुंचे, तालिबान से कैसे हैं इस अरब देश के रिश्ते?
- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
संयुक्त अरब अमीरात ने अफ़ग़ानिस्तान छोड़कर भागे राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी को मानवीय आधार पर शरण दी है.
15 अगस्त को जब तालिबान लड़ाके काबुल की घेराबंदी कर रहे थे तब राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी अचानक देश छोड़ गए थे.
उस वक़्त यह मालूम नहीं था कि वो कहां गए हैं और कई लोग उनके उज़्बेकिस्तान या ताजिकिस्तान जाने की बातें कर रहे थे. फिर अशरफ़ ग़नी ने ख़ुद यूएई में होने की पुष्टि की.
यूएई के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा कि उन्होंने ग़नी को मानवीय अधार पर शरण दी है, वहीं ग़नी ने एक वीडियो जारी कर कहा कि वो देश छोड़कर भागे नहीं है बल्कि उन्होंने एक बड़ी त्रासदी को टाल दिया है.
ग़नी ने कहा, "मैं अभी अमीरात में हूं ताकि ख़ूनख़राबे और अफ़रा-तफ़री को रोका जा सके." ग़नी ने ये भी कहा कि वो अफ़ग़ानिस्तान वापस लौटने के लिए वार्ता कर रहे हैं.
अफ़ग़ानिस्तान की राजनीति
ये पहली बार नहीं है जब यूएई ने इस्लामी दुनिया के किसी नेता को शरण दी हो. 90 के दशक में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री बेनेज़ीर भुट्टो ने भी यूएई को ही अपना नया ठिकाना बनाया था.
पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने भी सत्ता से बेदख़ल होने के बाद यूएई का ही रुख़ किया था. लेकिन फिर भी लोग यह सवाल तो पूछ ही रहें हैं कि आख़िर ग़नी ने अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने के बाद यूएई को ही अपना ठिकाना क्यों बनाया और यूएई ने उनको क्यों शरण दी.
हालांकि यूएई इस बार ये नहीं चाहेगा कि अशरफ़ ग़नी उसकी ज़मीन का इस्तेमाल राजनीतिक प्लेटफ़ॉर्म के तौर पर करें.
बीबीसी सुरक्षा संवाददाता फ्रैंक गार्डनर कहते हैं कि यूएई में बड़ी तादाद में अफ़ग़ान और पाकिस्तानी लोग हैं, ऐसे में यूएई नहीं चाहेगा कि उसकी ज़मीन अफ़ग़ानिस्तान की राजनीति का अखाड़ा बन जाए.
वहीं विश्लेषकों का कहना है कि वो ग़नी के यूएई पहुँचने से बहुत हैरान नहीं हैं.
ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन से जुड़े कबीर तनरेजा कहते हैं, "संयुक्त अरब अमीरात का रिश्ता तालिबान और अफ़ग़ानिस्तान दोनों के साथ रोचक रहा है. अशरफ़ ग़नी को संयुक्त अरब अमीरात ने मानवीय आधार पर शरण दी ही. यूएई का ये क़दम अप्रत्याशित नहीं हैं."
तालिबान से कैसे रहे हैं यूएई के रिश्ते?
साल 1996 में जब तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़ा कर सरकार बनाई थी तब पाकिस्तान, सऊदी अरब और यूएई ने ही इस सरकार को मान्यता दी थी. तब से लेकर अब तक इन देशों के रिश्ते में काफ़ी बदलाव आ चुका है.
तनरेजा कहते हैं, "अमेरिका में 9/11 हमलों के बाद अरब देशों पर अपनी छवि सुधारने का दबाव बना था. इस हमले में शामिल अधिकतर लोग खाड़ी देशों के ही थे. अरब देशों में सुधार का एक क्रम शुरू हुआ था और उस समय सऊदी और यूएई ने अपने आप को तालिबान से अलग करना शुरू कर दिया था. इन देशों ने तालिबान से एक स्पष्ट दूरी बनाए रखी."
जब अमेरिका के नेतृत्व में नेटो सेनाओं ने 2001 में अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर तालिबान को खदेड़ दिया था तब यूएई ने इस आक्रमण में सहयोग भी दिया था. यूएई के सैनिक भी अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद थे, हालांकि इनकी संख्या बहुत नहीं थी.
यूएई के सैनिकों की छोटी टुकड़ी अफ़ग़ानिस्तान में शांति और मानवीय मिशन पर तैनात रही है. अफ़ग़ानिस्तान भी इन सैनिकों को मित्र मुस्लिम सैनिकों के रूप में देखता है.
सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात दोनों में ही सुन्नी वहाबी विचारधारा हावी रही है. इन देशों ने मदरसों और मस्जिदों के ज़रिए चैरिटी के नाम पर अफ़ग़ानिस्तान में विकास कार्य भी कराए हैं. वैचारिक तौर पर यूएई और तालिबान के बीच निकटता रही है.
लेकिन तालिबान को मान्यता देने वाले यूएई ने साल 2001 में बहुत हद तक अपने आप को तालिबान से अलग कर लिया था और एक कूटनीतिक दूरी बना ली थी.
तनरेजा कहते हैं, "उस समय संयुक्त अरब अमीरात ने बहुत हद तक तालिबान के साथ संबंध तोड़ दिए थे और हामिद करज़ई और फिर अशरफ़ ग़नी के नेतृत्व में बनी सरकारों से औपचारिक कूटनीतिक संबंध रखे थे. हालांकि वैचारिक तौर पर यूएई, सऊदी अरब और तालिबान के बीच रिश्ते थे जो अब कम हो गए हैं. अब यूएई और अफ़ग़ानिस्तान के बीच रिश्ते वैचारिक कम और व्यावहारिक अधिक हैं."
साल 2017 में यूएई के राजनयिकों के एक समूह पर क़ंधार में एक हमला हुआ था. इस हमले में राजनयिकों समेत कई लोगों की जान चली गई थी. इस हमले के बाद से यूएई ने तालिबान से दूरी बनाकर रखी है.
तालिबान यूएई के रिश्तों में क्या भूमिका निभा सकता है पाकिस्तान?
वहीं तालिबान और यूएई के रिश्तों में पाकिस्तान की भी अहम भूमिका हो सकती है. पाकिस्तान के साथ तुर्की और क़तर, अफ़ग़ानिस्तान में काफ़ी हावी हैं, हो सकता है कि यूएई और सऊदी ये सोचे कि कहीं उनका प्रभाव कुछ कम ना हो जाए.
पाकिस्तान और यूएई के बीच आर्थिक मामलों को लेकर भी तनाव रहा है. यूएई ने पाकिस्तान को जो क़र्ज़ दिए थे उनकी वसूली के लिए दबाव डाला था.
तनरेजा कहते हैं, "पाकिस्तान के यूएई से रिश्ते भी तालिबान से उसके रिश्तों को प्रभावित कर सकते हैं. मुझे लगता है कि पाकिस्तान ये नहीं चाहेगा कि यूएई और तालिबान के रिश्ते किनारे पर चले जाएं या ख़राब हो जाएं. पाकिस्तान के अरब दुनिया से रिश्ते अहम हैं, यदि ये रिश्ते प्रभावित होते हैं तो चीन का प्रभाव पाकिस्तान पर और भी अधिक बढ़ सकता है और पाकिस्तान ऐसा नहीं चाहेगा. ऐसे में तालिबान से अरब देशों के रिश्तों पर पाकिस्तान का भी प्रभाव हो सकता है."
तनरेजा कहते हैं, "ऐसा हो सकता है कि यूएई अफ़ग़ानिस्तान में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करे लेकिन वहां हाथ डालना आग में हाथ डालने जैसा है. मुझे लगता है कि यूएई जो भी क़दम उठाएगा सोच समझकर उठाएगा."
यूएई में कब तक रहेंगे ग़नी?
हालांकि अभी ये स्पष्ट नहीं है कि ग़नी यूएई में कब तक रहेंगे. हो सकता है वो आगे चलकर अमेरिका चले जाएं लेकिन विश्लेषक मानते हैं कि अभी फ़िलहाल तो अमेरिका उनके लिए अपने दरवाज़े नहीं खोलेगा.
तनरेजा कहते हैं, "यूएई ने पहले भी इस्लामिक दुनिया के लोगों को शरण दी है और बातचीत की जगह उपलब्ध करवाई है. ऐसे में ग़नी का यूएई पहुँचना हैरान नहीं करता है."
लेकिन यूएई में रहना बहुत आसान भी नहीं है. यहां जीवन बहुत महंगा है. कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया था कि ग़नी मोटी रक़म अपने साथ लेकर भागे हैं लेकिन ग़नी ने एक बयान में इन आरोपों का खंडन किया है.
ग़नी ने अपने बयान में कहा है कि वो अफ़ग़ानिस्तान से एक जोड़ी कपड़े और जूते पहनकर निकले हैं और उनके पास कुछ भी नहीं है.
यूएई ही क्यों पहुँचे ग़नी?
विश्लेषक मानते हैं कि यूएई पहुँचने की एक वजह ये भी है कि ये देश सुरक्षा और गोपनीयता देता है. यहां गुपचुप रहने और अपना पैसा निवेश करने के पर्याप्त अवसर और ठिकाने हैं.
यूएई में अत्याधुनिक कैमरे लगे हैं और सुरक्षा अचूक है. यहां राजपरिवार की सत्ता पर मज़बूत पकड़ भी है. ऐसे में यहां पहुँचने वाले राजनीतिक लोग अपने आप को सुरक्षित महसूस करते हैं.
यही वजह है कि दुनिया भर से नेता और राजनीतिक परिवारों से जुड़े लोग शरण लेने के लिए संयुक्त अरब अमीरात पहुँचते रहे हैं. सैन्य तख़्तापलट में सत्ता से बाहर हुए थाईलैंड के प्रधानमंत्री थकसिन शिनावात्रा और यिंगलक शिनावात्रा ने भी यूएई में ही शरण ली थी.
इसके अलावा स्पेन के पूर्व राजा ह्वान कार्लोस, फ़लस्तीन के नेता मोहम्मद दहलान और यमन के दिवंगत नेता अली अब्दुल्लाह सालेह के सबसे बड़े बेटे अहमद अली अब्दुल्लाह सालेह ने भी दुबई में ही शरण ली थी.
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