पाकिस्तान का राष्ट्रगान: धुन की तैयारी से मंज़ूरी तक पांच साल में क्या-क्या हुआ?

    • Author, अक़ील अब्बास जाफ़री
    • पदनाम, शोधकर्ता और इतिहासकार, कराची

पाकिस्तान के राष्ट्रगान को पहली बार 13 अगस्त, 1954 को रेडियो पाकिस्तान पर प्रसारित किया गया था, जिसके बोल हफ़ीज़ जालंधरी ने लिखे थे और धुन अहमद ग़ुलाम अली छागला ने तैयार की थी.

राष्ट्रगान के बोल और इसकी धुन तैयार करने की प्रक्रिया बहुत लंबी थी और पाकिस्तान बनने के तुरंत बाद ही इस पर काम शुरू हो गया था.

लेकिन आम तौर पर लोग यह नहीं जानते कि एक बार मुसलमानों के पवित्र ग्रंथ क़ुरान के एक श्लोक सूरह अल-फ़ातिहा को भी राष्ट्रगान बनाने का सुझाव दिया गया था.

रुख़साना ज़फ़र अपनी किताब 'द नेशनल एंथम ऑफ़ पाकिस्तान' में लिखती हैं कि "जिन्ना उस समय जीवित थे, जब 14 जनवरी, 1948 को कंट्रोलर ऑफ़ ब्रॉडकास्टिंग, ज़ेड ए बुख़ारी ने गृह मंत्रालय के उप-सचिव को एक नोट भेजा था."

उस नोट में कहा गया था कि एक ब्रिटिश संगीतकार, जोसेफ़ वेल्श ने उन्हें पाकिस्तान के राष्ट्रगान के लिए पियानो पर रिकॉर्ड की गई एक धुन भेजी है. यह धुन रेडियो पाकिस्तान लाहौर में रिकॉर्ड की गई थी.

रुख़साना ज़फ़र के मुताबिक़, ज़ेड ए बुख़ारी ने अपने नोट में लिखा था कि पाकिस्तान को छोड़कर हर देश का अपना राष्ट्रगान है. चूंकि पाकिस्तान में विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं, इसलिए उनका सुझाव है कि सूरह अल-फ़ातिहा को पाकिस्तान के राष्ट्रगान के रूप में अपनाया जाए. उन्होंने अपने प्रस्ताव को उचित ठहराने के लिए निम्नलिखित आठ बिंदु पेश किए.

  • पाकिस्तान के अधिकांश नागरिक इस बात से वाक़िफ़ हैं
  • दुनिया का हर मुसलमान इससे वाक़िफ़ है
  • विश्व की प्रत्येक प्रमुख भाषा में इसका अनुवाद उपलब्ध है
  • जब इसे पारंपरिक तरीक़े से पढ़ा जाता है, तो इसमें संगीत महसूस होता है
  • हमारे देश के अधिकांश लोगों के दिल में इसका सम्मान है
  • इसे किसी वाद्य यंत्र की आवश्यकता नहीं है
  • यहां तक कि गांधी जी भी लोगों के सामने इस सूरह का पाठ करते थे और उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि यह सभी धर्मों के अनुयायियों को स्वीकार्य है.
  • यह हमारे देश के बुद्धिजीवियों और सामान्य शिक्षित वर्ग दोनों को संतुष्ट कर सकेगा

इसके साथ ही, बुख़ारी ने सूरह अल-फ़ातिहा का अंग्रेज़ी अनुवाद भी लिखा था.

आंतरिक मंत्रालय की एक उच्च स्तरीय बैठक में ज़ेड ए बुख़ारी के इस पत्र की सामग्री की समीक्षा की गई. यह बैठक नौ फ़रवरी, 1948 को हुई थी और इसमें गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव, शिक्षा विभाग के उप-सचिव, सूचना और प्रसारण विभाग के उप-सचिव और गृह विभाग के उप-सचिव के अलावा ख़ुद ज़ेड ए बुख़ारी ने भी भाग लिया था.

इस बैठक की कार्यवाही के एक अध्ययन से पता चलता है कि इस बैठक में सूरह अल-फ़ातिहा को पाकिस्तान के राष्ट्रगान के रूप में अपनाने के प्रस्ताव पर बिल्कुल भी विचार नहीं किया गया था. लेकिन जोसेफ़ वेल्श द्वारा तैयार की गई धुन के रिकॉर्ड को ज़रूर सुना गया था.

शायरों को राष्ट्रगान लिखने का निमंत्रण

बैठक में इस धुन को पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया गया और राष्ट्रगान लिखने के लिए पाकिस्तान के मशहूर शायरों को आमंत्रित करने का फ़ैसला लिया गया. और यह निर्णय भी लिया गया कि राष्ट्रगान की समीक्षा के लिए विशेषज्ञों की एक समिति बनाई जाए जो सुझाव दे कि उन्हें संगीत में कैसे ढाला जाए.

बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि कंट्रोलर ऑफ़ ब्रॉडकास्टिंग देश के मशहूर शायरों को राष्ट्रगान लिखने के लिए आमंत्रित करें और गृह मंत्री इस संबंध में संविधान सभा में एक प्रस्ताव पेश करें.

अंतिम प्रस्ताव का ज़िक्र करते हुए गृह मंत्री ने सुझाव दिया कि इस मुद्दे पर संविधान सभा के बजाय कैबिनेट में चर्चा की जाए, जो इस कार्य के लिए बेहतर जगह है.

18 फ़रवरी, 1948 को पाकिस्तान सरकार के उप-महासचिव अहमद अली ने इस बैठक की कार्यवाही का सारांश गृह मंत्रालय को भेजा. इस कार्यवाही के साथ 14 जनवरी 1948 को कंट्रोलर ऑफ़ ब्रॉडकास्टिंग, ज़ेड ए बुख़ारी का एक नोट भी संलग्न था.

27 फ़रवरी, 1948 को कैबिनेट की बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा की गई. इस बैठक में, प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ान ने कहा कि देश में राष्ट्रगान का होना बहुत ज़रूरी है. हालांकि, इसके लिए पहले एक अच्छी धुन बनवाई जाए और फिर शायरों को इस धुन के अनुरूप बोल लिखने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए.

प्रधानमंत्री ने कहा कि वो पहले ही विभिन्न सैन्य बैंड मास्टर्स और अन्य संगीतकारों को धुन बनाने के लिए कह चुके हैं.

दो जून, 1948 को, पाकिस्तान सरकार ने एक प्रेस नोट जारी किया जिसमें कहा गया था, कि "पाकिस्तान सरकार ने दक्षिण अफ़्रीका के ट्रांसवाल प्रान्त के क्लेरिक्स ड्राप शहर के मास्टर अहमद एआर ग़नी के पाँच-पाँच हज़ार रुपये के उन दो पुरस्कारों की पेशकश स्वीकार कर ली है. जिसमें उन्होंने एक पुरस्कार पाकिस्तान के राष्ट्रगान की धुन तैयार करने के लिए और दूसरा राष्ट्रगान के बोल लिखने के लिए पेश किया था. यह पेशकश मास्टर ग़नी ने अपने पिता स्वर्गीय श्री एआरए ग़नी की याद में दान के रूप में पेश की थी."

सरकार ने धुन भेजने के लिए आख़िरी तारीख़ 30 जून, 1948 निर्धारित की, लेकिन बाद में इस तारीख़ को एक महीना आगे बढ़ा दी गई थी.

पहला राष्ट्रगान किसने लिखा था?

कुछ लोगों का दावा है कि पाकिस्तान का पहला राष्ट्रगान जगन्नाथ आज़ाद ने लिखा था और इसकी मंज़ूरी ख़ुद जिन्ना ने दी थी. लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में मौजूद दस्तावेज़ों के अध्ययन से पता चलता है कि ज़ेड ए बुख़ारी के प्रस्ताव से लेकर अहमद एआर ग़नी की पेशकश की मंज़ूरी तक, जिन्ना न केवल जीवित थे, बल्कि राजधानी कराची में भी मौजूद थे.

अगर जिन्ना ने जगन्नाथ आज़ाद द्वारा लिखे गए 'गीत' को पाकिस्तान का 'राष्ट्रगान' स्वीकार किया होता, तो उनके जीवित रहते हुए, क्या उनके द्वारा मंज़ूर किये गए गीत को बदलना संभव था. बल्कि देश का राष्ट्रगान तैयार करने के लिए इस प्रक्रिया पर अमल करना तो दूर, इसके बारे में सोचना भी असंभव था?

11 सितंबर 1948 को जिन्ना का देहांत हो गया. तीन महीने बाद, दिसंबर 1948 में, पाकिस्तान सरकार ने एसएम इकराम की देखरेख में और सरदार अब्दुल रब नश्तर की अध्यक्षता में नौ सदस्यीय राष्ट्रगान समिति के गठन की घोषणा की.

इस समिति के सदस्यों में सरदार अब्दुल रब नश्तर, पीरज़ादा अब्दुल सत्तार, प्रोफ़ेसर राज कुमार चक्रवर्ती, चौधरी नज़ीर अहमद ख़ान, सैय्यद जुल्फ़िक़ार अली बुख़ारी, एडी अज़हर, क़वी जसीमुद्दीन, हफ़ीज़ जालंधरी और एसएम इकराम शामिल थे.

दैनिक 'जंग' में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार, 23 फ़रवरी, 1949 को संघीय मंत्री ख़्वाजा शहाबुद्दीन ने संविधान सभा में घोषणा की थी कि पाकिस्तान के राष्ट्रगान का चयन करने के लिए एक समीक्षा समिति का गठन किया गया है. कमेटी ने जल्द ही अपना काम शुरू कर दिया.

अप्रैल 1949 में, प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ान इंग्लैंड के दौरे पर गए. तीन मई, 1949 को दैनिक डॉन कराची में इस यात्रा पर एक लेख प्रकाशित किया गया था. इस लेख में डेली हेराल्ड के एक संवाददाता के हवाले से लिखा गया था, कि लियाक़त अली ख़ान ने उनसे पाकिस्तान के राष्ट्रगान की रचना में मदद करने के लिए कहा था. उन्होंने चयनित राष्ट्रगान के लिए इनाम में पाँच सौ पौंड देने की घोषणा भी की थी.

राष्ट्रगान समिति को पूरे देश से धुन और गीत मिलने शुरू हो गए थे. हफ़ीज़ जालंधरी ने मासिक 'अफ़कार' के हफ़ीज़ अंक में प्रकाशित अपने लेख 'क़ौमी तराने का अफ़साना' (राष्ट्रगान का अफसाना) में लिखा है, कि राष्ट्रगान समिति को कुल मिलकर 200 से अधिक गीत और लगभग 63 धुनें मिलीं.

इन धुनों और गीतों की समीक्षा करने के लिए संचार मंत्री सरदार अब्दुल रब नश्तर की अध्यक्षता में चार जुलाई 1949 को समिति की छह घंटे की बैठक हुई. जिसके बाद पाकिस्तान सरकार ने विशेषज्ञों की दो उप-समिति बनाई. इन समितियों के बारे में कहा गया था कि वे अब तक मिले गीतों और धुनों की समीक्षा करेंगी.

बैठक के दौरान, समिति को राष्ट्रगान की कई पाकिस्तानी, ईरानी और पश्चिमी धुनों के रिकॉर्ड सुनाये गए, जिसके बाद निर्णय लिया गया कि विशेषज्ञों की उप-समितियां उन नियमों को तय करें, जिनके आधार पर राष्ट्रगान का अंतिम चयन किया जाएगा.

लंबे समय से, राष्ट्रगान के विशेषज्ञ यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे थे कि एक राष्ट्रगान की जो विशेषताएं होती हैं, वह सब पाकिस्तान के राष्ट्रगान में भी मौजूद हों. इन विशेषताओं में इस बात के अलावा कि गीत और धुन लोकप्रिय और राष्ट्रीय मानकों पर पूरी उतरे, यह भी ज़रूरी है कि गुणवत्ता, गीत, भाषा, लय, धुन और संगीत के मामले में मुस्लिम राष्ट्र की परंपराओं को भी ध्यान में रखा जाए.

एजी अली छागला की धुन

चार जुलाई 1949 को गठित विशेषज्ञों की दो उप-समितियों में से एक, उप-समिति के सदस्य, अहमद ग़ुलाम अली छागला थे, जिन्होंने समिति को उनके द्वारा तैयार की गई एक धुन के साथ-साथ कुछ अन्य चुनी हुई धुनें भी पेश कीं. इन धुनों को रॉयल पाकिस्तान नेवल बैंड के माध्यम से एमपीएस दिलावर पर सुनवाने की व्यवस्था की गई थी. नेवी बैंड ने इन धुनों को बैग पाइपर से भी बजा कर सुनाया था.

20 जुलाई 1949 को सरदार अब्दुल रब नश्तर को पश्चिमी पंजाब का गवर्नर नियुक्त किया गया. उन्होंने दो अगस्त 1949 को अपना पदभार संभाल लिया. उसके बाद समिति की अध्यक्षता की ज़िम्मेदारी पीरज़ादा अब्दुल सत्तार को सौंपी गई.

राष्ट्रगान समिति के सामने एक और समस्या यह भी थी कि कुछ महीने बाद ईरान के बादशाह पाकिस्तान का दौरा करने वाले थे. समिति का विचार था कि इस अवसर पर पाकिस्तान के राष्ट्रगान की धुन ज़रूर बजनी चाहिए. इसलिए 21 अगस्त, 1949 को, अहमद ग़ुलाम अली छागला द्वारा तैयार की गई धुन को पाकिस्तान के राष्ट्रगान की अस्थाई धुन के रूप में अपनाने की घोषणा कर दी गई.

राष्ट्रगान की इस धुन को रेडियो पाकिस्तान पर बहराम सोहराब रुस्तम जी ने अपने पियानो पर बजा कर रिकॉर्ड कराई थी. इस धुन की ड्यूरेशन 80 सेकंड थी और इसे बजाने में संगीत के 21 उपकरण और 38 साज़ों का इस्तेमाल किया गया था.

अहमद ग़ुलाम अली छागला का जन्म 31 मई, 1902 को कराची में हुआ था. उन्होंने सिंध के मदरसा-तुल-इस्लाम कराची से शिक्षा प्राप्त की और कराची के प्रसिद्ध संगीतकार महाराज स्वामी दास के शिष्य बने.

अहमद ग़ुलाम अली छागला ने इंग्लैंड के ट्रिनिटी कॉलेज ऑफ़ म्यूज़िक से भी शिक्षा हासिल की. पाकिस्तान बनने से पहले उन्होंने बंबई की एक फ़िल्म कंपनी अजंता में संगीतकार के रूप में काम किया और पाकिस्तान बनने के बाद सरकार ने उन्हें राष्ट्रगान की धुन तैयार करने वाली समिति का सदस्य नियुक्त किया. लेकिन ये धुन तैयार करने का सम्मान उन्हीं की क़िस्मत में लिखा था.

कुछ महीनों बाद, पाकिस्तान में ईरान के बादशाह के आगमन के अवसर पर, सरकार ने पाकिस्तान का राष्ट्रगान बजाने की ज़िम्मेदारी नौसेना के बैंड को सौंपी. जिसने अब्दुल गफ़ूर के नेतृत्व में एक मार्च, 1950 को कराची हवाई अड्डे पर पाकिस्तान के राष्ट्रगान की धुन को बजाने का सम्मान हासिल किया.

यह पहला अवसर था जब किसी आधिकारिक समारोह में पाकिस्तान के राष्ट्रगान की धुन बजाई गई थी. इसके बाद, मई 1950 और जुलाई 1950 के बीच, जब प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ान ने अमेरिका का आधिकारिक दौरा किया, तो इस अवसर पर आयोजित होने वाले आधिकारिक समारोहों में भी राष्ट्रगान की यही धुन बजाई गई थी.

इस बीच, देश के स्थायी राष्ट्रगान के लिए एक उपयुक्त धुन की तलाश करने का काम भी जारी रहा. समिति ने सभी धुनों पर सावधानीपूर्वक विचार करने के बाद दो धुनों को प्रस्तावित राष्ट्रगान की धुन के रूप में मंज़ूरी दी.

इनमे से एक धुन तो अहमद ग़ुलाम अली छागला की वही धुन थी, जिसे अस्थायी रूप से स्वीकार किया गया था, जबकि दूसरी धुन प्रसिद्ध संगीतकार सज्जाद सरवर नियाज़ी ने तैयार की थी.

10 अगस्त 1950 को, इस समिति ने पाकिस्तान के स्थायी राष्ट्रगान की धुन के रूप में अहमद ग़ुलाम अली छागला की धुन को मंज़ूरी दे दी.

इस धुन की मंज़ूरी के बाद छह दिसम्बर 1950 को कंट्रोलर ऑफ़ ब्रॉडकास्टिंग ज़ेड ए बुख़ारी ने कैबिनेट बैठक में इस धुन पर लिखा हुआ अपना गीत प्रस्तुत किया. हालांकि कैबिनेट ने इस गीत के शब्दों के बारे में कहा कि ये शब्द मुश्किल हैं और आम लोगों की समझ के मुताबिक़ नहीं हैं.

28 फ़रवरी, 1951 को, कैबिनेट से हकीम अहमद शुजा के लिखे हुए एक गीत को सुनने का अनुरोध किया गया. दूसरी ओर राष्ट्रगान समिति की दो बैठकें 28 और 29 मार्च 1951 को हुई. कुछ अन्य शायरों द्वारा लिखे गए गीत भी समिति के सामने पेश किए गए.

समिति ने हफ़ीज़ जालंधरी और हकीम अहमद शुजा द्वारा लिखे गए गीतों को अपेक्षाकृत अच्छा कहा, लेकिन यह भी सुझाव दिया कि अल्लामा इक़बाल और क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम की दो नज़्मों को आधिकारिक रूप से मंज़ूर करके उन्हें राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया जाना चाहिए.

समिति ने क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम के एक गीत, 'चल चल चल' को जिसे जसीमुद्दीन ने संशोधित करके बेहतर किया था, राष्ट्रीय गीत के तौर पर मंज़ूर करने की पेशकश भी की थी.

शब्दों को बिठाने में मुश्किल

समिति को अब पूरे पाकिस्तान से मशहूर शायरों के उर्दू और बंगाली दोनों भाषाओं में लिखे गीत मिलने लगे थे. इस चरण में, समिति को लगा कि छागला की धुन कुछ मुश्किल है और इस पर 'शब्द बिठाने' की प्रक्रिया कवियों के लिए एक समस्या है, इसलिए समिति ने एक बार फिर सज्जाद सरवर नियाज़ी द्वारा तैयार की गई धुन को बीबीसी लंदन भेजा, ताकि इसे दोबारा से बेहतर अंदाज़ में रिकॉर्ड किया जा सके.

जब धुन रिकॉर्ड हो कर वापस आई, तो समिति के लिए एक बार फिर से बेहतर धुन का चयन करना समस्या बन गई. इसलिए चार जून, 1953 को एचएमपीएस दिलावर पर कैबिनेट की उप-समिति की बैठक हुई, जहां नौसेना बैंड ने इन धुनों को समिति के सामने बजाई.

समिति तब भी किसी सर्वसम्मत निर्णय पर नहीं पहुँच सकी, लेकिन सूचना मंत्री शोएब क़ुरैशी को अहमद ग़ुलाम अली छागला द्वारा बनाई गई धुन सज्जाद सरवर नियाज़ी द्वारा रचित धुन से बेहतर लगी.

29 और 30 दिसंबर, 1953 को, ये दोनों धुनें एक कैबिनेट बैठक में पेश की गई, जहां ये धुनें एक बार फिर बजा कर सुनाई गई.

2 जनवरी, 1954 को, संघीय कैबिनेट ने अहमद ग़ुलाम अली छागला की धुन को राष्ट्रगान की धुन के रूप में अपनाने की घोषणा कर दी.

जब इस समिति ने अहमद ग़ुलाम अली छागला की धुन को पाकिस्तान के राष्ट्रगान की धुन के रूप में मंज़ूरी दे दी, तो अब इस धुन के लिए उपयुक्त शब्दों की खोज का कार्य शुरू हुआ.

देश के सभी बड़े शायरों को इस धुन के ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड भी भेजे गए और हर रात इस धुन को एक निश्चित समय पर रेडियो पाकिस्तान पर प्रसारित करने की भी व्यवस्था की गई थी, ताकि वे (शायर) इस धुन से मिलता हुआ गीत लिख सकें.

कैबिनेट ने यह निर्णय भी लिया कि हफ़ीज़ जालंधरी, हकीम अहमद शुजा और ज़ेड ए बुख़ारी द्वारा लिखे गए गीतों के बोल इस धुन से मिला कर कैबिनेट के सामने प्रस्तुत किए जाएं.

कैबिनेट ने इन गीतों को सुना और सुझाव दिया कि पहला बंद ज़ेड ए बुख़ारी के गीत से और बाक़ी बंद हफ़ीज़ जालंधरी के गीत से लेकर एक नया गीत बनाया जाए. हालांकि, हफ़ीज़ जालंधरी ने इस प्रस्ताव को सिरे से अस्वीकार कर दिया. उन्होंने कहा कि या तो उनके गीत को पूरी तरह से स्वीकार किया जाए या पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया जाए. वे अपने गीत में किसी और के लिखे गीत का संयोजन स्वीकार नहीं करेंगे.

हफ़ीज़ जालंधरी की इस स्पष्ट स्थिति पर, कैबिनेट ने राष्ट्रगान के चयन के निर्णय को स्थगित कर दिया और दो जून, 1954 को अहमद ग़ुलाम अली छागला द्वारा तैयार की हुई धुन को राष्ट्रगान की अंतिम धुन के रूप में मंज़ूरी दे दी.

इस विषय पर कैबिनेट की अगली बैठक सात जुलाई, 1954 को हुई. इस बैठक में हफ़ीज़ जालंधरी को उनके गीत के आख़िरी बंद के दो शब्दों (परचम और जान इस्तिक़बाल) की व्याख्या करने के लिए कहा गया. हफ़ीज़ जालंधरी ने इन दोनों शब्दों की व्याख्या की और यह भी कहा कि अगर कैबिनेट को 'जान इस्तिक़बाल' के मिश्रण को समझने में कोई कठिनाई हो रही है, तो वे इसे 'मिल्लत का इक़बाल' करने के लिए तैयार हैं.

गीत की मंज़ूरी

पाँच अगस्त, 1954 को कैबिनेट की एक और बैठक हुई, जिसमें हफ़ीज़ जालंधरी द्वारा लिखे गए गीत को बिना किसी बदलाव के मंज़ूर करने की घोषणा की गई. इस बैठक में कैबिनेट ने यह भी निर्णय लिया कि इस गीत के होते हुए उर्दू और बंगाली के दो राष्ट्रीय गीतों की कोई आवश्यकता नहीं है, इसलिए इस प्रस्ताव को रद्द माना जाए.

पाकिस्तान के लिए तो हफ़ीज़ जालंधरी का लिखा हुआ गीत स्वीकार किया ही गया था, लेकिन यह बात कम ही लोग जानते हैं कि 1947 में उन्होंने कश्मीर का राष्ट्रगान भी लिखा था. जो आज भी पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के राजकीय रेडियो पर रोज़ाना प्रसारित होता है. जिसके बोल हैं "वतन हमारा आज़ाद कश्मीर."

इसके अलावा, 1949 में उनका लिखा हुआ एक गीत पाकिस्तान के राष्ट्रगान के रूप में अपनाया गया था, जिसका पहला मिसरा था "ए मेरे आबाद वतन, आज़ाद पाकिस्तान."

इस राष्ट्रगान की ख़बर 15 मई 1949 को पाकिस्तान के अख़बारों में छपी थी. कराची से निकलने वाले दैनिक जंग ने लिखा था, "पाकिस्तान सरकार ने राष्ट्रगान का चयन करने के लिए जो समिति गठित की है, वह 29 मई को मशहूर शायर हफ़ीज़ जालंधरी के एक 'गीत' पर विचार करेगी, जिसकी धुन भी उन्होंने ही तैयार की है.

"समिति की इस बैठक की अध्यक्षता संचार मंत्री सरदार अब्दुल रब नश्तर करेंगे. हाल ही में, राष्ट्रगान की 30 अलग-अलग धुनों को पाकिस्तानी और भारतीय आर्केस्ट्रा पर बजाई गईं और उनके रिकॉर्ड तैयार किए गए."

"उनमें से अधिकांश धुन सरकार की देखरेख में सैन्य बैंड द्वारा रिकॉर्ड की गई थी, लेकिन उनमें से एक भी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को पसंद नहीं आई थी.

"इसके बाद हफ़ीज़ जालंधरी को राष्ट्रगान की धुन बनाने के लिए कहा गया था और उन्होंने सरकार को सूचित किया कि यह धुन तैयार हो चुकी है. इस धुन का रिकॉर्ड ढाई या तीन मिनट का होगा."

कमेटी ने हफ़ीज़ जालंधरी के इस गीत को अस्वीकार कर दिया. लेकिन पाँच साल बाद ही उनका एक और गीत पाकिस्तान के राष्ट्रगान का दर्जा हासिल करने में कामयाब हो गया.

रेडियो पाकिस्तान के रिकॉर्ड के अनुसार, इस गीत के गायन में भाग लेने वाले गायकों में अहमद रुश्दी, ज़व्वार हुसैन, अख़्तर अब्बास, ग़ुलाम दस्तगीर, अनवर ज़हीर, अख़्तर वसी अली, नसीमा शाहीन, रशीदा बेगम, नज़म आरा, कॉकब जहां और शमीम बानो शामिल थे.

दुनिया भर के राष्ट्रगानों में एक और ख़ूबसूरत राष्ट्रगान जुड़ चुका था.

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