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अफ़ग़ानिस्तान और तालिबान के बीच समझौते में क्या अशरफ़ ग़नी 'दीवार' बन गए हैं?
- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दुनिया में सबसे ख़राब नौकरी (जॉब) क्या है? हर आदमी के लिए इसका जवाब अलग अलग हो सकता है. लेकिन इसका एक जवाब ऐसा भी है जो बहुत मशहूर हुआ.
बात अक्टूबर 2017 की है. अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ गनी बीबीसी को एक साक्षात्कार दे रहे थे.
बीबीसी संवाददाता जस्टिन रॉलेट को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा, "अफ़ग़ानिस्तान का राष्ट्रपति होना पृथ्वी की सबसे ख़राब नौकरी है. यहाँ दिक़्क़तों की कमी नहीं है. जिसमें सबसे बड़ी चुनौती सुरक्षा की है."
उस साक्षात्कार में उन्होंने स्वीकार किया था कि बीते तीन साल (जब से वो अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति बने) उनके लिए काफ़ी मुश्किल भरे रहे. लेकिन उस वक़्त शायद उन्हें अंदाज़ा नहीं रहा होगा कि आने वाले साल इससे भी ज़्यादा चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं.
अशरफ़ ग़नी का जब ज़िक्र आता है तब बीबीसी को दिए उस साक्षात्कार की चर्चा आज भी होती है .
तालिबान की शर्त
उन्हें लेकर ताज़ा शर्त तालिबान ने रखी है.
तालिबान अमेरिकी सैनिकों के अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने के साथ देश के अलग-अलग हिस्सों को लगातार अपने नियंत्रण में ले रहा है. अफ़ग़ानिस्तान सरकार और तालिबान के बीच समझौते की कोशिशें चल रही हैं और इस बीच तालिबान का एक बयान आया है.
तालिबान का कहना है कि वो अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर एकाधिकार नहीं चाहते हैं लेकिन जब तक काबुल में नई सरकार का गठन नहीं होगा और राष्ट्रपति अशरफ़ गनी पद से हटाए नहीं जाएंगे देश में शांति स्थापित नहीं होगी.
समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस को दिए इंटरव्यू में तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने अफ़ग़ानिस्तान के भविष्य को लेकर तालिबान का रूख स्पष्ट किया है.
सुहैल शाहीन ने समाचार एजेंसी एपी से कहा, "जब बातचीत के बाद काबुल में ऐसी सरकार बनेगी जो सभी पक्षों को स्वीकार होगी और अशरफ़ गनी की सरकार चली जाएगी तब तालिबान अपने हथियार डाल देगा."
सुहैल शाहीन तालिबान की ओर से अलग-अलग देशों के साथ वार्ता कर रहे प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा भी हैं.
बीते हफ़्ते बकरीद के मौके पर राष्ट्रपति अशरफ़ गनी ने अपने भाषण में तालिबान पर हमला करने की बात कही थी. जिसके जवाब में तालिबान ने अशरफ़ गनी को 'जंग का सौदागर' बताया.
तालिबान प्रवक्ता सुहैल शाहीन का बयान ऐसे मौक़े पर आया है जब अमेरिका और नेटो के 95 फ़ीसदी सैनिक वापस लौट चुके हैं और 31 अगस्त तक सेना की वापसी का काम पूरा हो जाएगा.
कौन हैं अशरफ़ ग़नी?
अशरफ़ ग़नी की तालिबान से शुरू से ही नहीं बनी है.
अशरफ़ गनी एक पूर्व टेक्नोक्रेट हैं, जिन्होंने अफ़ग़ानिस्तान लौटने से पहले अपना अधिकांश वक़्त देश के बाहर ही बिताया है.
अशरफ़ ग़नी अमेरिका में लंबे समय तक प्रोफ़ेसर थे. उन्होंने वर्ल्ड बैंक में भी काम किया है.
इस वजह से जानकार मानते हैं कि उनकी पकड़ अफ़ग़ानिस्तान में वैसी नहीं, जैसी पूर्व अफ़ग़ान राष्ट्रपति हामिद करज़ई की थी.
तालिबान के पतन के बाद अशरफ़ ग़नी को पहली बार शोहरत तब मिली जब वो लोया जिरगा में थे. लोया जिरगा अफ़ग़ानिस्तान की एक अनूठी संस्था है जिसमें तमाम कबायली समूहों के नेता एक साथ बैठते हैं. इसकी बैठक में देश के मामलों पर विचार विमर्श कर फ़ैसले किए जाते हैं. लोया जिरगा पश्तो भाषा का शब्द है और इसका मतलब होता है महापरिषद.
2002 में जब हामिद करज़ई अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति थे, उस वक़्त अशरफ़ गनी उनके करीबी माने जाते थे.
उस सरकार में उन्हें वित्त मंत्री बनाया गया था. उनके आज के प्रतिद्वंदी डॉ. अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह उस समय अफ़ग़ानिस्तान के विदेश मंत्री थे.
बाद में हामिद करज़ई से अलग होने के बाद ग़नी दोबारा शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े. 2004 में उन्हें काबुल विश्वविद्यालय का चांसलर नियुक्त किया गया.
उस दौरान अफ़ग़ानिस्तान में बेतहाशा अंतरराष्ट्रीय सहायता राशि आ रही थी, ख़ास तौर पर अमेरिका से. ग़नी उसके कठोर आलोचक माने जाते थे.
उनका तब ये मानना था कि इस तरह की सहायता राशि के जरिए अफ़ग़ानिस्तान में एक 'समानांतर सरकार' चलाने की कोशिश की कोशिश की जा रही थी, जो एक तरह से अफ़ग़ानिस्तान के संस्थानों को कमज़ोर करने की कोशिश थी.
बीबीसी को 2007 में दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, " जब अफ़ग़ानिस्तान के लोग एक स्कूल बनाते हैं तो उसे बनाने पर ज़्यादा से ज़्यादा 50 हज़ार डॉलर ख़र्च होते हैं. लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय मदद से स्कूल बनाया जाता है तो इसका ख़र्च 2 लाख 50 हज़ार डॉलर हो जाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें विदेशी कॉन्ट्रैक्टर अपना कमिशन लेते हैं, जो कि क़ानूनी तौर पर सही है, लेकिन क्या ये भ्रष्टाचार नहीं है?
लेकिन कहा जाता है कि बाद में उसी अमेरिका के समर्थन पर उन्हें 'गुमान' होने लगा. साल 2009 में वो राष्ट्रपति पद के दावेदारों में से एक थे, लेकिन वो चौथे स्थान पर रहे.
हामिद करज़ई ने तब दोबारा राष्ट्रपति पद का चुनाव जीता. लेकिन करज़ई तीसरी बार चुनाव नहीं लड़ सकते थे, तो 2014 में अशरफ़ गनी ने राष्ट्रपति पद के लिए दोबारा चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया और इस बार वो सफ़ल हुए.
अशरफ़ ग़नी के तालिबान के साथ रिश्ते
पश्तून समुदाय से आने वाले अशरफ़ गनी जब 2014 में राष्ट्रपति का चुनाव जीते उस वक़्त उन पर धोखाधड़ी के आरोप भी लगे थे.
2019 के चुनाव में भी तालिबान ने उन पर चुनावी धांधली के जरिए जीत हासिल करने का आरोप लगाया. उनके पहले कार्यकाल से ही तालिबान ने उनके प्रभुत्व को चुनौती देने का काम किया.
साल 2019 में अमेरिका और तालिबान के बीच अफ़ग़ानिस्तान को लेकर हुई शांति वार्ता का वो हिस्सा नहीं थे.
जानकारों की राय है कि तालिबान ने उन्हें हमेशा से अमेरिका के हाथों की कठपुतली के तौर पर देखा है. लेकिन सत्ता की मजबूरी कहें या फिर उसकी मज़बूती के लिए अशरफ़ ग़नी ने हमेशा तालिबान के साथ समझौते की कोशिश की.
पहली बार सत्ता में आने के बाद साल 2018 में अशरफ़ गनी ने तालिबान के साथ समझौते की पेशकश की थी. जिसके बाद उसी साल जून के महीने में तीन दिनों तक सीज़फायर भी रहा था.
4 मई 2021 को फॉरनअफेयर्स डॉट कॉम के लिए लिखे एक लेख में अशरफ़ ग़नी ने लिखा था, " मेरी सरकार तालिबान के साथ बातचीत जारी रखने के लिए तैयार है. अगर तालिबान को शांति स्वीकार है, तो मैं अपना कार्यकाल जल्दी ख़त्म करने को तैयार हूँ."
लंदन के एसओएएस साउथ एशिया इंस्टीट्यूट में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के सीनियर लेक्चरर अविनाश पालीवाल ने अफ़ग़ानिस्तान पर एक किताब लिखी है 'माय एनेमीज़ एनेमी'.
बीबीसी हिंदी से बातचीत में उन्होंने कहा, "तालिबान का ग़नी से वैचारिक मतभेद है. अशरफ़ ग़नी एक ऐसी व्यवस्था के प्रतीक हैं, जो तालिबान को मंज़ूर नहीं है. अशरफ़ ग़नी अफ़ग़ानिस्तान रिपब्लिक के मुखिया है. अगर उन्हें तालिबान ने स्वीकार कर लिया, इसका मतलब ये निकाला जाएगा कि तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान गंणतंत्र को स्वीकार कर लिया. ऐसे में तालिबान जैसा अफ़ग़ानिस्तान बनाना चाहते हैं उसका कोई अस्तित्व नहीं रह जाएगा."
"दूसरी तरफ़ अशरफ़ ग़नी ने भी कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में पिछले 20 साल में जो राजनीतिक व्यवस्था बनी है हम उसको रातों रात ख़त्म नहीं होने देंगे. ऐसे में ये टकराव दो विचारधाराओं का टकराव है."
यही है तालिबान और अशरफ़ ग़नी के बीच विरोध का मुख्य कारण. ग़नी के अलावा इस वक़्त अफ़ग़ान के राष्ट्रपति कोई और भी होते तो शायद तालिबान की समझौते के लिए उनको हटाने की शर्त रखते.
महिलाओं के प्रति अशरफ़ ग़नी का रवैया
दो दशक पहले अफ़ग़ानिस्तान में जब तालिबान का शासन था. तब महिलाओं को तमाम पाबंदियों का सामना करना पड़ा था. महिलाओं की शिक्षा और उनके नौकरी करने पर भी कई तरह की बंदिशें थीं.
लेकिन नए संविधान के आने के बाद और अशरफ़ ग़नी के राष्ट्रपति बनने के बाद महिलाओं के लिए स्थितियां थोड़ी ही सही लेकिन बदली हैं. जानकार इसे भी तालिबान और अशरफ़ गनी के बीच तकरार की एक वजह मानते हैं.
डॉक्टर अविनाश के मुताबिक़ अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं की स्थिति किसी भी शासन काल में बहुत अच्छी नहीं रही है. लेकिन सांकेतिक रूप से ही सही राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने अपने कार्यकाल में महिलाओं के लिए काफ़ी कुछ किया है.
पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई के बीवी को अफ़ग़ानिस्तान में किसी ने नहीं देखा है. लेकिन अशरफ़ गनी की बीवी रूला गनी अक्सर उनके साथ देखी जाती हैं, वो भी बिना पर्दे के. उन्हें देश में सब जानते हैं.
डॉक्टर अविनाश कहते हैं, "सत्ता में आने के बाद अशरफ़ गनी ने कई कूटनीतिक और राजनीतिक पदों पर महिलाओं को शामिल किया. तालिबान के साथ बातचीत में भी महिलाओं को शामिल किया गया".
प्रोफ़ेसर ग़नी और शासक अशरफ़ ग़नी
अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ गनी ने 'फ़िक्सिंग फ़ेल्ड स्टेट' नाम की किताब लिखी है.
लेकिन उनकी लिखी यही किताब कई बार उनकी आलोचना का आधार भी बनती हैं.
किताब में उन्होंने जिन बातों का ज़िक्र किया, जब उनके हाथ अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता आई तब वो ख़ुद उसमें ज़्यादा तब्दीली नहीं ला सके.
'फ़ेल्ड स्टेट' यानी असफ़ल राष्ट्र को दुरुस्त करने के उनके उपाए वो ख़ुद पर आज़मा नहीं सके.
डॉ. अविनाश पालीवाल कहते हैं, "किताब लिखना और शासन के दौरान उनको अमल में लाना दोनों अलग बातें हैं. कोई अकेला इंसान ये कर भी नहीं सकता."
डॉक्टर अविनाश के मुताबिक़ अशरफ़ ग़नी किताब में लिखी बातों को अपने कार्यकाल के दौरान अपना नहीं पाए. उसकी एक बड़ी वजह उनका ख़ुद का व्यक्तित्व भी रहा.
"सत्ता के शुरुआती दिनों में वो अपनी किताब के मुताबिक़ 'सिपाहसालारवाद' को ख़त्म करना चाहते थे. ऐसा करने की कोशिश में उन्होंने उस वक़्त हार्ड लाइन ले ली और चुनाव की बात करने लगे. तब उन्हें अमेरिका के साथ और अपनी सत्ता के पॉवर पर गुमान था."
"लेकिन ऐसा करने की कोशिश में, उन्होंने शक्तिशाली सत्ता के सिपाहसालारों से अपने संबंध खराब कर लिए. 2017-18, तक जब उन्होंने थोड़ा बदलाव लाने का अहसास हुआ तब तक देर हो चुकी थी. सिपाहसालारों में उनके प्रति एक पर्सेप्शन बन चुका था और फिर वो सबको साथ नहीं ला पाए."
अफ़ग़ान सरकार और तालिबान के बीच शांति कैसे होगी ?
अब सवाल है कि तालिबान के अशरफ़ ग़नी को सत्ता से बाहर करने की शर्त के साथ अब अफ़ग़ानिस्तान में शांति कैसे बहाल होगी?
इसके लिए अफ़ग़ानिस्तान के सामाजिक और राजनीतिक ताने बाने को भी समझना होगा.
अफ़ग़ानिस्तान की सामाजिक और राजनीतिक परिवेश में पश्तूनों का दबदबा हमेशा से रहा है.
वहाँ ताज़िक, हज़ारा और उज़्बेक की तादाद भी है लेकिन पश्तूनों के मुकाबले कम है.
अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई पश्तून हैं, तालिबान में भी ज़्यादातर पश्तून हैं और अशरफ़ गनी भी पश्तून हैं लेकिन उनके प्रतिद्वंदी अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह आधे पश्तून हैं. कुछ जानकार तालिबान और अशरफ़ गनी के बीच के टकराव को पश्तून बनाम पश्तून की लड़ाई के तौर पर भी देखते हैं. लेकिन डॉक्टर अविनाश इससे सहमत नहीं है.
विदेश मंत्रालय के पूर्व सचिव विवेक काटजू कहते हैं, "अमेरिका की अब तक की प्लानिंग थी कि नई अंतरिम सरकार बने, फिर सीज़फायर हो, फिर जितने अफ़ग़ान गुट है वो बाद संवैधानिक प्रणाली में आपसी चर्चा के परिवर्तन हो."
"लेकिन अंतरिम सरकार बने कैसे और उसका मुखिया कौन होगा? ये सबसे बड़ा सवाल है. अशरफ़ गनी कह रहे हैं कि वो अपनी जगह छोड़ने को तैयार हैं, बशर्ते चुनाव हो और उसके बाद जो उसमें जीते वो उसे सत्ता सौंप दें. लेकिन तालिबान तो अशरफ़ गनी को हमेशा से अमेरिका के हाथ की कठपुतली मानता रहा है. तो अंतरिम सरकार में अभी के सरकार के लोगों को वो कबूल करने को तैयार नहीं है."
विवेक काटजू भी मानते हैं कि अशरफ़ ग़नी ने राष्ट्रपति पद का दो बार चुनाव ज़रूर जीता है, लेकिन उनकी देश में पकड़ बहुत मज़बूत नहीं है.
उनका कहना है कि दूसरी तरफ़ तालिबान में भी गुटबाज़ी है ऐसा प्रतीत होता है. एक गुट हिंसा के रास्ते सत्ता चाहता है तो दूसरा गुट बातचीत चाहता है. इसी वजह से दोनों के बीच डेडलॉक बना हुआ है जो कुछ दिनों तक आगे भी जारी रहेगा.
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