ईरान में इब्राहीम रईसी सरकार पर सऊदी अरब की दो टूक

ईरान के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति इब्राहीम रईसी के कार्यकाल में सऊदी अरब के साथ संबंध कैसा होगा, इसे लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं. ईरान शिया मुस्लिम बहुल देश है जबकि सऊदी सुन्नी मुस्लिम बहुल देश.

दोनों देशों के बीच प्रतिद्वंद्विता और दुश्मनी का जटिल इतिहास है. दोनों देशों के बीच इस्लामिक मुल्कों के नेतृत्व की भी होड़ दिखती है.

पिछले कुछ महीनों में मध्य-पूर्व की राजनीति में कई तरह के बदलाव आए हैं. ईरान में तुलनात्मक रूप से उदार माने जाने वाले राष्ट्रपति हसन रूहानी की जगह कट्टरपंथी और पश्चिम विरोधी रईसी को कमान मिलने जा रही है तो इसराइल में कट्टर यहूदी राष्ट्रवादी तेवर वाले बेनेट नेफ़्टाली को सत्ता मिली है.

नेफ़्टाली ने तो रईसी की जीत के बाद ही संकेत दे दिया कि ईरान की नई सरकार के साथ कैसा संबंध बनने जा रहा है. नेफ़्टाली ने रईसी को तेहरान का कसाई कहा है.

ईरान और इसराइली की जितनी दुश्मनी है उसकी तुलना सऊदी और ईरान की शत्रुता से करें तो एक बड़ा फ़र्क़ ये नज़र आता है कि सऊदी और ईरान दोनों इस्लामिक देश हैं जबकि इसराइल यहूदियों का.

इसराइल के प्रधानमंत्री ने तो संकेत दे दिया है कि रईसी की सरकार को लेकर वे क्या वे सोचते हैं. मंगलवार को सऊदी अरब ने भी पहली बार इब्राहिम रईसी के चुने जाने पर टिप्पणी की है.

मंगलवार को सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फ़ैसल बिन फ़रहान ने ऑस्ट्रिया के विदेश मंत्री के साथ वियना में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान कहा, ''हमारे नज़रिए में ईरान की विदेश नीति वहाँ के सर्वोच्च नेता अयोतोल्लाह अली ख़ामेनेई ही तय करते हैं. इसीलिए हम अपना रुख़ ज़मीनी हक़ीक़त के आधार पर तय करते हैं. मैं नई सरकार को इसी नज़रिए से देखूंगा कि ज़मीनी हक़ीक़त क्या है न कि इस आधार पर कि किसके हाथ में सत्ता है.''

प्रिंस फ़ैसल ने कहा कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े जिन सवालों के जवाब नहीं मिल रहे हैं, उसे लेकर वे चिंतित हैं. ईरान में अघोषित ठिकानों पर यूरेनियम मिले हैं और संयुक्त राष्ट्र परमाणु वॉचडॉग इस पर जवाब चाह रहा है, लेकिन अभी तक कुछ ठोस पता नहीं चला है.

रईसी को लेकर उत्साह नहीं

सऊदी अरब और खाड़ी के उसके सहयोगी देश ईरान पर परमाणु कार्यक्रम को लेकर लगातार दबाव डाल रहे हैं. ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण है. अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसियों और अंतरराष्ट्रीय

परमाणु ऊर्जा एजेंसी का कहना है कि ईरान गोपनीय रूप से परमाणु हथियार कार्यक्रम चला रहा है, जिसे 2003 में रोक दिया गया था.''

रईसी की छवि ईरान में कट्टर और पश्चिम विरोधी जज की रही है लेकिन अब वे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से राष्ट्रपति की कुर्सी तक पहुँच चुके हैं. चुनाव में जीत के बाद सोमवार को रईसी ने कहा था कि वे अरब के पड़ोसियों से रिश्ते सुधारना चाहते हैं.

अमेरिका का बाइडन प्रशासन भी रईसी की जीत से उत्साहित नहीं है. मंगलवार को बाइडन प्रशासन ने ईरान की दर्जनों न्यूज़ वेबसाइट को ग़लत सूचना फैलाने के आरोप में बंद कर दिया. दूसरी तरफ़ रईसी ने कहा है कि अगर अमेरिका प्रतिबंध हटा भी देता है तो वे राष्ट्रपति बाइडन से मुलाक़ात नहीं करेंगे.

बाइडन प्रशासन से उम्मीद की जा रही थी कि ईरान के साथ परमाणु क़रार को बहाल कर दिया जाएगा लेकिन अब तक कुछ भी ठोस नहीं हो पाया है. वियना में चल रही बैठक स्थगित कर दी गई है. रईसी पर अमेरिका ने राष्ट्रपति बनने से पहले ही प्रतिबंध लगा रखा है.

सऊदी अरब और ईरान की दुश्मनी

सऊदी अरब और ईरान के बीच लंबे समय से टकराव चल रहा है. दोनों देश लंबे वक़्त से एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं. दोनों शक्तिशाली पड़ोसियों के बीच यह संघर्ष लंबे समय से क्षेत्रीय प्रभुत्व को लेकर चल रहा है. दशकों पुराने इस संघर्ष के केंद्र में धर्म भी है.

लगभग पूरे मध्य-पूर्व में यह धार्मिक बँटवारा देखने को मिलता है. यहाँ के देशों में कुछ शिया बहुल हैं तो कुछ सुन्नी बहुल. समर्थन और सलाह के लिए कुछ देश ईरान तो कुछ सऊदी अरब की ओर देखते हैं.

ऐतिहासिक रूप से सऊदी अरब में राजतंत्र रहा है. सुन्नी प्रभुत्व वाला सऊदी अरब इस्लाम का जन्म स्थल है और इस्लामिक दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण जगहों में शामिल है. लिहाजा यह ख़ुद को मुस्लिम दुनिया के नेता के रूप में देखता है.

हालांकि, 1979 में इसे ईरान में हुई इस्लामिक क्रांति से चुनौती मिली, जिससे इस क्षेत्र में एक नए तरह का राज्य बना- एक तरह का क्रांतिकारी धर्मतंत्र वाली शासन प्रणालि. उनके पास इस मॉडल को दुनिया भर में फैलाने का स्पष्ट लक्ष्य था.

ख़ास कर बीते 15 सालों में, लगातार कुछ घटनाओं की वजह से सऊदी अरब और ईरान के बीच मतभेदों में बेहद तेज़ी आई है. 2003 में अमरीका ने ईरान के प्रमुख विरोधी इराक़ पर आक्रमण कर सद्दाम हुसैन की सत्ता को तहस नहस कर दिया. इससे यहाँ शिया बहुल सरकार के लिए रास्ता खुल गया और देश में ईरान का प्रभाव तब से तेज़ी से बढ़ा है.

2011 की स्थिति यह थी कि कई अरब देशों में विद्रोह के स्वर बढ़ रहे थे जिसकी वजह से इस पूरे इलाक़े में राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो गई.

ईरान और सऊदी अरब ने इस उथल-पुथल का फ़ायदा उठाते हुए सीरिया, बहरीन और यमन में अपने प्रभाव का विस्तार करना शुरू किया, जिससे आपसी संदेह और बढ़े.

ईरान के आलोचकों का कहना है कि वो इस पूरे क्षेत्र में या तो ख़ुद या अपने नज़दीकियों को ही प्रभुत्व में देखना चाहता है ताकि ईरान से लेकर भूमध्य सागर तक फैले इस भूभाग पर उसका अपना नियंत्रण हो.

शत्रुता कैसे बढ़ी

ईरान कई मायनों में इस क्षेत्रीय संघर्ष को जीतता हुआ दिख रहा है. सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद को ईरानी (और रूसी) समर्थन हासिल है और इसी के बल पर उनकी सेना सऊदी अरब के समर्थन वाले विद्रोही गुटों को व्यापक रूप से पछाड़ने में सक्षम बन गई.

सऊदी अरब ईरान के प्रभुत्व को रोकने के लिए उतावला है और सऊदी के शासक युवा और जोशीले प्रिंस मोहम्मद बिन-सलमान का सैन्य दुस्साहस इस क्षेत्र में तनाव की स्थिति को और भी बदतर बना रहा है.

उन्होंने पड़ोसी यमन में विद्रोही हूती आंदोलन के ख़िलाफ़ चार साल से युद्ध छेड़ रखा है ताकि वहाँ ईरान का प्रभाव न पनप सके. लेकिन चार साल बाद अब यह उनके लिए भी महंगा दांव साबित हो रहा है.

ईरान ने उन सभी आरोपों को ख़ारिज कर दिया है जिसमें यह कहा गया है कि वो हूती विद्रोहियों को हथियार मुहैया कराता है.

हालांकि संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ तेहरान हूतियों को हथियार और तकनीक दोनों मुहैया कराने में मदद कर रहा है.

वहीं ईरान के सहयोगी देश लेबनान में शिया मिलिशिया समूह हिज़्बुल्लाह राजनीतिक रूप से ताक़तवर ब्लॉक का नेतृत्व करता है और एक विशाल और सशस्त्र सैनिकों का संचालन करता है.

कई जानकारों का मानना है कि सऊदी अरब ने क्षेत्रीय लड़ाई में हिज़्बुल्लाह की भागीदारी पर 2017 में लेबनान के प्रधानमंत्री साद हरीरी को इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर कर दिया. ख़ुद सऊदी अरब उनका समर्थन करता था.

मध्य पूर्व के कौन देश किसके साथ

मोट तौर पर कहें तो मध्य-पूर्व का वर्तमान रणनीतिक नक्शा शिया-सुन्नी के विभाजन को दर्शाता है. सुन्नी बहुल सऊदी अरब के समर्थन में यूएई, बहरीन, मिस्र और जॉर्डन जैसे खाड़ी देश खड़े हैं.

वहीं ईरान के समर्थन में सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद हैं जिन्हें सुन्नियों के ख़िलाफ़ हिजबुल्लाह सहित ईरानी शिया मिलिशिया समूहों का भरोसा है.

इराक़ की शिया बहुल सरकार भी ईरान की क़रीबी सहयोगी है, हालांकि विरोधाभास यह है कि उसने अमरीका के साथ भी अपने क़रीबी संबंध बनाए रखे हैं. अमरीका पर वह तथाकथित इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ संघर्ष में मदद के लिए निर्भर है.

कॉपी - रजनीश कुमार

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