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ईरान में इब्राहीम रईसी की जीत पर क्या कह रहा है अरब मीडिया?
- Author, बीबीसी मॉनिटरिंग
- पदनाम, ख़बरों की रिपोर्टिंग और विश्लेषण
ईरान के कट्टरपंथी नेता और देश के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई के क़रीबी माने जाने वाले इब्राहीम रईसी ने राष्ट्रपति चुनाव में जीत हासिल कर ली है.
ईरानी न्यायपालिका के प्रमुख रहे रईसी के राजनीतिक विचार 'अति कट्टरपंथी' माने जाते हैं और संभवत: यही वजह है कि क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तरों पर ईरान की आगामी नीतियों को लेकर अटकलें लगनी शुरू हो गई हैं.
अरब मीडिया ने ईरान की भविष्य की नीतियों को लेकर अटकलें और अंदाज़ा लगाना शुरू कर दिया है. इसकी एक बड़ी वजह रईसी की छवि भी है.
ऐसा माना जा रहा है कि रईसी के राष्ट्रपति बनने के साथ ही इस क्षेत्र में बड़े स्तर पर ईरानी प्रभाव देखने को मिलेगा. इसकी एक प्रमुख वजह यह है कि रईसी सत्तारुढ़ कट्टरपंथी अभिजात वर्ग से संबंधित हैं और देश के सर्वोच्च धार्मिक नेता के क़रीबी भी.
इस बीच कई लेखक और जानकार उम्मीद कर रहे हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन का प्रशासन ईरान में कट्टर शासन प्रणाली के पक्ष में नीति अपनाएगा.
इससे पूर्व नवंबर 2019 में अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने रईसी समेत आठ अन्य लोगों पर प्रतिबंध लगाए थे. अमेरिका का मानना था कि ये सभी आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के बेहद क़रीबी हैं और मानवाधिकारों के उल्लंघन में शामिल हैं.
लेकिन रईसी ने हाल में हुए राष्ट्रपति चुनावों में जीत हासिल कर ली है. 62 फ़ीसदी वोटों के साथ जीत दर्ज करने के बाद रईसी देश के 13वें राष्ट्रपति बनेंगे. रईसी इसी साल अगस्त महीने की शुरुआत में पद की शपथ लेंगे. माना जा रहा रहा है कि देश की घरेलू राजनीति और विदेशी मामलों में उनका काफ़ी प्रभाव रहेगा.
क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ेगा
लेबनान के दैनिक समाचार पत्र अन्नाहार अल-अरबी में फ़ारेस खाशान ने उम्मीद जताई है कि ईरान में रईसी के राष्ट्रपति बनने के बाद इस इलाक़े में ईरान का प्रभाव अधिक होगा.
उन्होंने लिखा है, "ईरान के सर्वोच्च नेता ख़ामेनेई ने देश में नकली लोकतंत्र की औपचारिकताओं को अपने नियंत्रण में अंतिम रूप दिया है और रईसी को राष्ट्रपति के तौर पर नियुक्त किया है."
खाशान के मुताबिक़, ईरान चाहेगा कि वो इराक़ के प्रधानमंत्री मुस्तफ़ा अल कादमी के बदले एक ऐसे शख़्स को लाया जाए, जो ईरान के प्रति वफ़ादार हो.
ख़ायरल्लाह ख़ायरल्लाह ने लंदन स्थित समाचार पत्र अल-अरब में लिखा है कि यमन में "ईरान सना में एक नए सिस्टम की नींव रख रहा है."
उन्होंने लिखा है, "ईरान ने लेबनान के इलाक़ों में जो किया वही अब वह यमन में कर रहा है. वह लेबनान को पूरी तरह से बदलने की राह पर हैं. यही बात इराक़ पर भी लागू होती है, जहाँ वह अपनी मौजूदगी दर्ज करने को लेकर उतावला है."
रईसी से उम्मीद
कई राजनीतिक पंडितों ने अनुमान लगाया है कि ईरान के नए राष्ट्रपति रईसी से क्षेत्र और दुनिया को किस तरह की उम्मीदें हैं.
अब्दोऊ खल ने सऊदी ओकाज़ में लिखा है, "दुनिया अब ईरान के नए राष्ट्रपति के पहले क़दम की प्रतीक्षा कर रही है या तो उनका पहला क़दम बीते चार सालों में हुए नुक़सान को ठीक करने की दिशा में होगा या फिर ऐसा जिससे ईरान में हालात और बिगड़ेंगे."
सऊदी वित्त पोषित और लंदन स्थित अशरक अल अवसात में अब्दुल्ला अल उताबी ने कहा, "इस क्षेत्र में आने वाले समय में सबसे ख़राब हालात पैदा हो सकते हैं."
उन्होंने कहा, "वियना वार्ता के परिणाम ईरान में शासन की क्रूरता और हिंसक गतिविधियों के साथ-साथ शक्ति संतुलन में बदलाव को बढ़ाएँगे जिससे ना सिर्फ़ क्षेत्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गठबंधनों और वैश्विक संबंधों में बदलाव देखने को मिलेगा."
उन्होंने अमेरिका के प्रति ईरान के कट्टरपंथियों के दृष्टिकोण पर कहा कि वे और सख़्त रुख़ अपनाएँगे और फिर वे विस्तार और प्रभावित करने की नीति के तहत आगे बढ़ेंगे.
सऊदी ओकाज़ में ख़ालिद अल सुलेमान लिखते हैं, "ईरान के सभी राष्ट्रपति, कमोबेश एक ही तरह के और सिर्फ़ मुखौटा भर हैं."
उन्होंने कहा कि खाड़ी के देशों को निवर्तमान राष्ट्रपति हसन रूहानी या उनके पहले के राष्ट्रपतियों की सुधारवादी प्रकृति होने के बावजूद कोई लाभ नहीं हुआ, क्योंकि खाड़ी देशों के प्रति उनकी आक्रामक नीति हमेशा एक समान ही रही. और इसका सामना करने का एकमात्र तरीक़ा किसी पर भी निर्भर ना रहते हुए (जैसा कि अमेरिका बदलता रहता है) राजनीतिक रुख़ को एकजुट रखना ही है.
किसी बदलाव की उम्मीद नहीं
कई जानकारों का कहना है कि भले ही ईरान को अगस्त में नया राष्ट्रपति मिल जाए, लेकिन इससे कुछ ख़ास बदलाव होने की उम्मीद नहीं की जा सकती है.
इन जानकारों का तर्क है कि ईरान में राष्ट्रपति सिर्फ़ एक चेहराभर है और असल शासन ख़ामेनेई के ही हाथ में है. वही 'सब कुछ नियंत्रित' करते हैं.
लंदन स्थित अल-अरबी अल-जदीद में अल-फ़ातिमा यासीन लिखती हैं कि ईरानी नीतियाँ राष्ट्रपति के दफ़्तर में तय नहीं होती हैं, क्योंकि वहाँ उससे भी बड़ा एक निकाय है. वही सर्वोच्च नेता का कार्यालय है, जहाँ ईरान के नीति निर्माण से जुड़े सभी फ़ैसले लिए जाते हैं.
उनके अनुसार, "सर्वोच्च नेता और उनका कार्यालय ही दीर्घकालिक योजनाओं और नीतियों को अंतिम रूप देता है और राष्ट्रपति के पास प्रेस के सामने बोलेने के लिए कुछ तो हो यह सोचकर कुछ हिस्से ज़ाहिर नहीं करता है."
उनका कहना है कि भले ही राष्ट्रपति बदल गया हो, लेकिन व्यवहारिक रूप से कुछ भी नहीं बदला है.
इयाद अबू शकरा ने अशरक अल-अवसात में लिखा है, "यह चुनाव डिज़ाइन ही इस तरह किए गए थे कि रईसी को ही विजेता बनाया जाए."
शकरा रईसी को ख़ामेनेई के उत्तराधिकारी के तौर पर देखते हैं. उनका मानना है कि रईसी के राष्ट्रपति बनने से ईरान में राजनीतिक जीवन पर रूढ़िवादी प्रवृत्ति की पकड़ और मज़बूत होगी.
कितने बदलेंगे अमेरिका और ईरान के संबंध
अमेरिका के साथ ईरान के संबंधों के लिहाज़ से राष्ट्रपति पद पर नए चेहरे का आना महत्वपूर्ण माना जा रहा है. कुछ राजनीतिक पंडितों का कहना है कि ईरान में नए प्रशासन के प्रति अमेरिकी दृष्टिकोण से ईरान को लाभ होगा. ख़ासतौर पर परमाणु वार्ता के संबंध में.
ईरान और पश्चिमी देशों के बीच 2015 में एक परमाणु समझौता हुआ था, जिसके बाद ईरान पर लगे सख़्त प्रतिबंध हटा लिए गए थे. हालाँकि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2018 में अमेरिका को इस सौदे से बाहर कर लिया था और ईरान पर फिर से आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे. नए राष्ट्रपति जो बाइडन की सरकार अब फिर से समझौते में शामिल होने का रास्ता निकाल रही है.
अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडन ने समझौते पर वापस लौटने की इच्छा जताई है. फ़िलहाल ईरान परमाणु समझौते को फिर से लागू करने को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वार्ता जारी है लेकिन अब तक इसका कोई पुख्ता नतीजा नहीं निकल पाया है.
ईरान चाहता है कि उस पर लगी आर्थिक पाबंदियाँ हटा ली जाएँ. हालांकि अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने 8 जून को कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि ईरान पर कई पाबंदियाँ लागू रहेंगी.
हाल में ईरान के सुप्रीम लीडर ने सभी उम्मीदवारों को अंतरराष्ट्रीय मुद्दों की बजाय घरेलू मुद्दों पर अपना ध्यान लगाने के लिए कहा था. ऐसे में फ़िलहाल ये कहना मुश्किल है कि ईरान के अगले राष्ट्रपति परमाणु करार को लेकर बातचीत को किस दिशा में ले कर जाएँगे.
वहीं एक टीवी डिबेट में शामिल हुए रईसी ने कहा था कि ईरान परमाणु करार को ख़ामेनेई ने मंज़ूरी दी थी इसलिए वो इसका समर्थन करते हैं लेकिन इसका पालन करने के लिए "एक मज़बूत सरकार" की ज़रूरत है.
लेबनानी समाचार पत्र अल-दियार में नबीह अल बोरजी लिखते हैं कि उन्हें उम्मीद नहीं है कि रईसी वियना वार्ता में ईरानी वार्ताकारों से अलग सोच रखते होंगे.
उनका कहना है कि इस वार्ता के दौरान ईरानी वार्ताकरों ने चतुराई का परिचय दिया और वो बख़ूबी जानते हैं कि इस क्षेत्र में अमेरिका की कमज़ोरी क्या है.
प्रतिबंध सख़्त किए जाने के बाद ईरान ने भी अपना परमाणु कार्यक्रम तेज़ कर दिया है. ईरान इस समय अपने अब तक के सर्वोच्च स्तर पर यूरेनियम संवर्धन कर रहा है. हालाँकि ईरान अब भी परमाणु बम बनाने की क्षमता हासिल नहीं कर पाया है.
रईसी जिस दिन ईरान के राष्ट्रपति चुनाव में जीते, वियना में ईरान के परमाणु समझौते को बचाने के लिए बातचीत जारी थी.
अशरक अल-अवसात के एक लेख में इयाद अबू शकरा लिखते हैं कि क्षेत्रीय स्तर पर एक नए और एकीकृत अमेरिकी-ईरानी प्रतिनिधित्व की अपेक्षा की जा सकती है.
सऊदी ओकाज़ में ख़ालिद अल सुलेमान लिखते हैं कि राष्ट्रपति के तौर पर रईसी का जीतना अमेरिकी प्रशासन के 'नैतिक-मूल्यों' के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं है. आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ईरान से बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए बाइडन प्रशासन अमेरिकी प्रतिबंध सूची से रईसी का नाम हटा देता है अथवा नहीं.
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