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ईरान राष्ट्रपति चुनाव: नए नेता से कितनी उम्मीदें और क्या होंगी चुनौतियां
- Author, बीबीसी मॉनिटरिंग
- पदनाम, .
ईरान में आज यानी 18 जून को राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान हो रहा है. इसके ज़रिए ईरान के लोग, इस्लामी क्रांति के बाद अपना आठवां राष्ट्रपति चुनने वाले हैं.
नए राष्ट्रपति, 'उदारवादी' माने जाने वाले मौजूदा राष्ट्रपति हसन रूहानी की जगह लेंगे. हसन रूहानी 2013 में राष्ट्रपति बने थे और लगातार दो बार इस पद पर रह चुके हैं.
ख़बरों के मुताबिक़ इस बार चुनाव में वोट देने के लिए रजिस्ट्रेशन कराने वालों की संख्या में कमी का नया रिकॉर्ड कायम हुआ है और ऐसे में कट्टरपंथी माने जाने वाले न्यायपालिका के प्रमुख इब्राहीम रईसी की जीत तय मानी जा रही है.
बताया जा रहा है कि इस बार चुनावों को लेकर गार्जियन काउंसिल ने भी असामान्य रूप से कड़े नियम लागू किए हैं जिसके बाद राइसी को कड़ी चुनौती देने वाला कोई उम्मीदवार मैदान में नहीं बचा. साथ ही इन कठोर नियमों ने वोटरों का उत्साह कम करने का भी काम किया है.
नए राष्ट्रपति के सामने घरेलू स्तर पर चुनौतियों के अलावा विदेश नीति से जूझने की भी चुनौती है. साथ ही देश की गणतांत्रिक व्यवस्था और इस्लामिक राज्य व्यवस्था वाली देश की हाइब्रिड प्रणाली के भविष्य को लेकर भी वो अहम भूमिका निभा सकते हैं.
कम वोटर रजिस्ट्रेशन और चुनाव को लेकर चुनौती
देश की सरकार के सामने फिलहाल चुनाव को लेकर जो सबसे बड़ी चुनौती है वो है मतदान के लिए बेहद कम संख्या में वोटरों रजिस्ट्रेशन.
आधिकारिक पोल्स का अनुमान है कि चुनाव में 42 फ़ीसदी वोटर मतदान कर सकते हैं. बीते साल संसदीय चुनावों में भी क़रीब इतनी संख्या में ही वोटरों ने मतदान किया था. ये देश के इतिहास में सबसे कम वोटर टर्नआउट था.
ईरान में आधिकारिक तौर पर ये माना जाता है कि यहां की इस्लामिक व्यवस्था को लोगों का प्रबल समर्थन हासिल है. ऐसे में अधिक संख्या में वोटरों के मतदान करने को बेहद अहम समझा जाता है.
लेकिन इस साल इसमें कुछ बदलाव देखा जा रहा है. देश के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली ख़ामनेई और कई वरिष्ठ धार्मिक नेताओं ने लोगों से रिकॉर्ड संख्या में वोट डालने की अपील की थी लेकिन इसके बावजूद कई रूढ़िवादी नेता इन चुनावों के महत्व को कम करके देख रहे हैं.
गार्जियन काउंसिल के प्रवक्ता अब्बास अली काडखोदे ने इन चिंताओं को ख़ारिज करते हुए कहा है कि चुनाव की वैधता को लेकर "कम वोटरों के मतदान करने से कोई क़ानूनी समस्या नहीं खड़ी होगी."
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वोटरों का मोहभंग?
हाल में बड़े पैमाने पर उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराने के बाद गार्जियन काउंसिल की कड़ी आलोचना हुई थी, जिसके अब्बास अली की ये टिप्पणी आई है.
आलोचकों ने गार्जियन काउंसिल पर 'चुनावों में धांधली की कोशिश' का आरोप लगया है. साथ ही कहा है कि काउंसिल की वजह से नागरिकों का मतदान से मोहभंग हो रहा है.
राष्ट्रपति हसन रूहानी ने ईरानी इस्लामिक गणतंत्र के संस्थापक अयातुल्लाह ख़ुमैनी के दिखाए रास्ते से न भटकने की चेतावनी दी है. वहीं काउंसिल के एक सदस्य अयातुल्लाह सादिक़ अमोली-लारिजानी ने काउंसिल के फ़ैसले को "समर्थन न करने योग्य" बताया है.
अमोली-लारिजानी के भाई अली लारिजानी संसद के पूर्व स्पीकर रहे हैं और राष्ट्रपति चुनावों में रईसी को कड़ी टक्कर देने वाले संभावित उम्मीदवार के तौर पर देखे जा रहे थे. लेकिन अब वो उन उम्मीवारों की सूची में शामिल हैं जिन्हें काउंसिल ने अयोग्य ठहरा दिया है.
ख़ामेनेई काउंसिल का समर्थन करते रहे हैं लेकिन हाल में इसकी आलोचना के बाद ईरान की राजनीतिक व्यवस्था में इसकी बढ़ती भूमिका को लेकर कई लोग सवाल कर रहे हैं.
परमाणु कार्यक्रम और पश्चिमी देशों के साथ रिश्ते
अपने परमाणु कार्यक्रम और इसे लेकर पश्चिमी देशों के साथ तनावपूर्ण रिश्तों के कारण ईरान अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के केंद्र में है.
कड़े प्रतिबंधों से जूझ रहे ईरान में हसन रूहानी इस वादे के साथ पहली बार राष्ट्रपति चुनाव जीते थे कि वो पश्चिमी देशों के साथ रिश्ते बेहतर करेंगे.
साल 2015 में उन्होंने पश्चिमी देशों के साथ ऐतिहासिक परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते के तहत ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में छूट के बदले उसके परमाणु कार्यक्रम पर कुछ प्रतिबंध लगाए गए.
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क्या चाहता है ईरान?
अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडन ने समझौते पर वापिस लौटने की इच्छा जताई है. फिलहाल ईरान परमाणु समझौते को फिर से लागू करने को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वार्ता जारी है लेकिन अब तक इसका कोई पुख्ता नतीजा नहीं निकल पाया है.
ईरान चाहता है कि उस पर लगी आर्थिक पाबंदियां हटा ली जाएं. हालांकि अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने 8 जून को कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि ईरान पर कई पाबंदियां लागू रहेंगी.
हाल में ईरान के सुप्रीम लीडर ने सभी उम्मीदवारों को अंतरराष्ट्रीय मुद्दों की बजाय घरेलू मुद्दों पर अपना ध्यान लगाने के लिए कहा था. ऐसे में फिलहाल ये कहना मुश्किल है कि ईरान के अगले राष्ट्रपति परमाणु करार को लेकर बातचीत को किस दिशा में ले कर जाएंगे.
हाल में एक टीवी डिबेट में शामिल हुए रईसी ने कहा था कि ईरान परमाणु करार को ख़ामेनेई ने मंज़ूरी दी थी इसलिए वो इसका समर्थन करते हैं लेकिन इसका पालन करने के लिए "एक मज़बूत सरकार" की ज़रूरत है.
ईरान के कट्टरपंथी नेता देश के परमाणु कार्यक्रम से पीछे हटने का विरोध करते रहे हैं.
साल 2020 में रूढ़िवादी नेताओं के प्रभुत्व वाली संसद ने एक क़ानून पारित कर सरकार को 2015 के परमाणु समझौते में दिए स्तर से अधिक स्तर के यूरेनियम संवर्धन करने की अनुमति दे दी.
इस नए क़ानून के बाद ईरान सरकार 20 फ़ीसदी तक यूरोनियम संवर्धन दोबारा शुरू कर सकती है जबकि परमाणु समझौते में इसे 3.67 फीसद तक सीमित कर दिया गया था.
हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अगर पश्चिमी देशों के साथ एक बार फिर किसी सहमति तक नहीं पहुंचा जा सका, तब भी ईरान उतना अलग-थलग नहीं पड़ेगा जितना पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद के कार्यकाल (साल 2007 से 2013) के दौरान रहा.
पारंपरिक तौर पर ईरान अपनी विदेश नीति में 'न पूर्व और न पश्चिम' की नीति का पालन करता रहा है. लेकिन हाल में सुप्रीम लीडर ख़ामेनेई ने अपने वक्तव्य में 'पूर्व' को प्रथमिकता देने की बात की है.
हाल के सालों में ईरान ने सीरिया समेत कई मामलों में रूस से हाथ मिलाया है. साथ ही उसने चीन के साथ 25 साल के रणनीतिक रोडमैप पर भी हस्ताक्षर किए हैं.
आर्थिक चुनौतियां
अगर चुनाव प्रचार को देखें तो यह स्पष्ट है कि सभी उम्मीदवार देश की आर्थिक स्थिति को सुधारने से जुड़े वायदे कर रहे हैं.
देश की अर्थव्यवस्था इस वक्त एक साथ कई स्तरों पर मुश्किलों से जूझ रही है. देश की एक तरफ आधिकारिक मुद्रा लुढ़क कर अपने निचले स्तर पर पहुंच चुकी है, स्टॉक मार्केट में स्थिरता नहीं है, आम ज़रूरत की चीज़ों की भारी कमी हो रही है और बिजली गुल होना आम बात हो गई है, तो दूसरी तरफ देश पर कड़े प्रतिबंध लगे हैं, कोविड-19 महामारी का अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ा है और भ्रष्टाचार भी बढ़ रहा है.
आर्थिक परेशानियों के बीच, साल 2017 में भारी मतों से जीत कर सत्ता में एक बार फिर लौटे हसन रूहानी की लोकप्रियता हाल के दिनों में कम हुई है.
इस मौक़े का फायदा उठाते हुए राष्ट्रपति पद की रेस में शामिल कट्टपंथी माने जाने वाले पांच उम्मीदवार मौजूदा सरकार पर निशाना साधने की कोशिश कर रहे हैं.
यहां तक कि हाल के दिनों तक रिजर्व बैंक का गवर्नर रहे ग़ैर-रूढ़ीवादी राजनेता अब्दुल नासिर हिम्मती ने भी प्रशासन से दूरी बनाने की पूरी कोशिश की है.
रूहानी ने अपने आलोचकों का ये कह कर विरोध किया है कि वो आर्थिक संकट के लिए आर्थिक प्रतिबंधों और कोविड-19 महामारी के व्यापक असर को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं.
लेकिन ये आर्थिक संकट न केवल मौजूदा सरकार या अगली सरकार के लिए बड़ी चुनौती है बल्कि ये ईरान की इस्लामिक गणतंत्रिक व्यवस्था के स्थायित्व और सुरक्षा के लिए भी बड़ी चुनौती है.
लगातार बिगड़ते आर्थिक हालात के कारण दिसंबर 2017 और जनवरी 2018 और फिर अचानक से तेल की क़ीमतें बढ़ने के बाद नवंबर 2019 में देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए. इन विरोध प्रदर्शनों में सैंकड़ों लोग मारे गए और कई घायल हुए.
इन विरोध प्रदर्शनों के कारण न केवल रूहानी सरकार की आलोचना हुई बल्कि देश की इस्लामिक गणतंत्रिक व्यवस्था की भी कड़ी आलोचना की गई. और तो और इन विरोध प्रदर्शनों के ख़िलाफ़ प्रशासन की सख़्ती के कारण देश की व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कम हुआ.
अगले उत्तराधिकारी की तलाश
अब तक दो राष्ट्रपतियों को छोड़ कर ईरान के सभी राष्ट्रपतियों ने दूसरी बार चुनाव जीत कर दो बार का कार्यकाल पूरा किया है. ऐसे में माना जा रहा है कि नए राष्ट्रपति लंबे वक्त तक अपने पद पर बने रह सकते हैं.
पूर्व राष्ट्रपति अबुल हसन बनी सद्र के ख़िलाफ़ महाभियोग लाया गया था. मोहम्मद अली रजई की हत्या राष्ट्रपति पद का कार्यभार संभालने के एक महीने बाद कर दी गई थी.
एक और बात जिसे ध्यान में रखने की ज़रूरत है वो ये है कि देश के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई अब 82 साल के हो गए हैं और देश को उनके उत्तराधिकारी की ज़रूरत पड़ सकती है.
काफी दिनों से देश में ये चर्चा है इब्राहीम रईसी ख़ामेनेई के उत्तराधिकारी हो सकते हैं. ख़ामेनेई ख़ुद आठ साल तक देश के राष्ट्रपति बने रहने के बाद सर्वोच्च नेता बने थे.
हालांकि अब तक रईसी ने कोई चुनाव नहीं जीता है, उन्होंने जिन पदों पर काम किया है उन पदों पर उनकी नियुक्ति हुई थी. ऐसे में आने वाले वक्त में उनके लिए लोगों के बीच लोकप्रियता हासिल करना और देश की सत्ता में लंबे वक्त तक रहने के लिए जनसमर्थन जुटाना बड़ी चुनौती होगी.
रईसी साल 2017 में हसन रूहानी के ख़िलाफ़ 19 फ़ीसदी के मार्जिन से चुनाव हार चुके हैं. हो सकता है कि इस साल मतदान के लिए कम वोटरों के आने और मैदान में कड़ी चुनौती देने वाले उम्मीदवार के न रहने का उन्हें फायदा मिले और उन्हें आसान जीत हासिल हो.
लेकिन इससे आने वाले वक्त में अपनी महत्वाकांक्षा पूरा करने के लिए उन्हें ज़रूरी लोकप्रियता और वैधता मिलेगी, ये कह पाना फिलहाल मुश्किल है.
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