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ईरान के अगले राष्ट्रपति क्या कट्टरपंथी इब्राहीम रईसी बनने वाले हैं?
- Author, बीबीसी
- पदनाम, मॉनिटरिंग
ईरान के रूढ़िवादियों के एक लिए अच्छी ख़बर है, वहां के न्यायतंत्र के प्रमुख इब्राहीम रईसी को जून में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की इजाज़त दे दी गई है. राजनीति में वो एक बड़ा क़द हैं और रूढ़िवादी ख़ेमे के सबसे प्रबल दावेदार. रूढ़िवादियों के बीच उन्हें चुनने को लेकर सहमति दिख रही है.
रईसी को ईरान के सुप्रीम लीडर आयातुल्लाह अली ख़ामेनेई का उत्ताराधिकारी माना जा रहा है. उन्होंने ही इब्राहीम रईसी को 2019 में न्यायतंत्र का प्रमुख बनाया था. सरकार मीडिया के अलावा ईरानी सेना के रिवल्यूशन गार्ड कॉर्प्स द्वारा चलाए जाने वाले मीडिया संस्थाओं का भी उन्हें समर्थन हासिल है.
ईरान में किए गए कई सर्वे बताते हैं कि रईसी रेस में आगे हैं, हालांकि ये सर्वे पूरी तरह से भरोसेमंद नहीं हैं.
उन्होंने पहले 2017 में ध्रुवीकरण के बीच राष्ट्रपति चुनाव में क़िस्मत आज़माई थी लेकिन मौजूदा राष्ट्रपति हसन रूहानी से हार गए थे. रईसी को एक करोड़ 60 लाख वोट मिले थे जबकि उनके प्रतिद्वंदी ने दो करोड़ 40 लाख वोट पाकर जीत दर्ज की थी.
बुरे आर्थिक दौर में ईरान
लेकिन इस साल हालात अलग हैं. जिन लोगों ने रूहानी को वोट दिया था वो उनके नरम रवैये से ख़ुश नहीं हैं. कई लोग उन्हें ईरान के बुरे आर्थिक हालात का ज़िम्मेदार मानते हैं. अमेरिका ने 2015 में परमाणु समझौते से हाथ खींच लिया था, इसके बाद ईरान पर प्रतिबंध लगा दिए गए और वहां की आर्थिक हालात बदतर होती गई.
अब ईरान परमाणु डील को फिर से लागू करने के लिए ऑस्ट्रिया से बात कर रहा है. वो अगर इसमें सफल हो भी जाता है, तब भी इसका असर जून में होने वाले चुनावों पर नहीं पड़ेगा क्योंकि इसके नतीजे देर से नज़र आएंगे.
ईरान के उलझे हुए राजनीतिक समीकरण ने विश्लेषकों का पिछले 25 सालों में कई बार ध्यान खींचा है. अभी ये पता नहीं है कि रूढ़िवादियों के वर्चस्व वाली गार्डियन काउंसिल, जो चुनाव कराती है, वो कितने उम्मीदवारों को चुनाव में उतरने की इजाज़त देगी.
लेकिन रईसी के जीतने की उम्मीद ज़्यादा लग रही है, ख़ासतौर पर रूहानी सरकार से जुड़े लोगों की तुलना में.
लेकिन उनके लिए राष्ट्रपति पद तक पहुँचना आसान नहीं होगा. आने वाली बहसों और कैंपेन में उन्हें दूसरे उम्मीदवारों से कड़ी टक्कर मिलेगी.
सुधारवादी लोगों के ख़िलाफ़ आक्रोश
सुधारवादियों ने 2013 और 2017 में राष्ट्रपति रूहानी का समर्थन किया था. लेकिन वो आर्थिक और सामाजिक मसलों पर बहुत बदलाव नहीं ला सके. इसलिए इस बार हवा सुधारवादियों के ख़िलाफ़ दिख रही है.
सुधारवादी और नरमपंथी गुट परमाणु समझौते के सबसे बड़े समर्थक थे. ये डील रूहानी सरकारी की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है. लेकिन अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समझौते से बाहर आने और प्रतिबंध लगाने के फ़ैसलों के कारण हालात बिगड़ गए.
साल 2020 के चुनावों में वोट देने वाले लोगों का प्रतिशत 1979 में आई क्रांति के बाद सबसे कम था. ये इस ओर इशारा करता है कि सुधारवादियों का वोटरों पर प्रभाव कम हो गया है.
इरान रिफ़ॉर्म फ्रंट सुधारवादी पार्टियों का एक राजनीतिक समूह है. उम्मीद की जा रही है कि वो पहले उप-राष्ट्रपति रहे इसहाक़ जहांगीर को चुनाव में उतार सकता है.
एक ज़माने में जहांगीर रूहानी के समर्थकों के बीच जाना माना चेहरा थे. लेकिन अब उनपर ग़लत आर्थिक फ़ैसले लेने के आरोप लग रहे हैं. इसलिए वो दूसरे उम्मीदवारों के निशाने पर रहेंगे.
एकसाथ आएंगे रूढ़िवादी?
दो गुट बिखर चुके रूढ़िवादियो को एकसाथ लाने की कोशिश कर रहे हैं- कोएलिशन काउंसिल और द फ़ोर्सेस ऑफ़ द इस्लामिक रिवल्यूशन (सीसीएफआईआर) और प्रिंसप-लिस्ट यूनिटी काउंसिल (पीयूसी).
सीसीएफ़आईआर दिसंबर 2019 से काम कर रहा है और इसे मजलिस के पूर्व स्पीकर और वरिष्ठ राजनेता ग़ुलामली हदद अदेल चलाते है.
पीयूसी का गठन नवंबर 2020 में किया गया था और इसे एक रूढ़िवादी संस्था कॉम्बैटन क्लर्गी एसोसिएशन चलाता है. पीयूसी की अध्यक्षता अयातुल्लाह मोहम्मद मोवाहेदी करमानी करते हैं, तो एक रूढ़िवादी धार्मिक नेता हैं.
इसके प्रवक्ता मनुशेहर मोट्टकी पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद अहमदीनेजाद की सरकार में विदेश मंत्री रह चुके हैं.
सीसीएफआईआर ने रईसी के नामांकन का स्वागत किया है और दूसरे रूढ़िवादी संगठनों से भी समर्थन की अपील की है. मई के शुरुआत में मोट्टकी ने कहा था कि रईसी पर गुट की फ़ाइनल सहमति बन गई है. उम्मीद की जा रही है कि कई रूढ़िवादी अपने नामांकन वापस ले लेंगे ताकि राइसी के लिए राह आसान हो. इसके अलावा गार्डियन काउंसिल भी अहमदीनेजाद समेत कुछ प्रतिद्वंदियों को हटा सकता है.
लेकिव रईसी को फिर भी उन उम्मीदवारों से कड़ी टक्कर मिलेगी जिन्हें काउंसिल इजाज़त देगा. इसमें पूर्व स्पीकर अली लारिजानी भी शामिल है. वो एक मध्यम रूढ़िवादी हैं जिन्हें कई राजनीतिक दलों का क़रीबी माना जाता है. वो सुप्रीम लीडर के वरिष्ठ सलाहकार भी हैं और उनके शानदार भाषण देने की कला उनके लिए फ़ायदेमंद साबित हो सकती है.
वोटिंग प्रतिशत का असर
कई जानकारों का मानना है कि मौजूदा समय में वोटरों की रुचि चुनावों में कम है.
सरकारी चैनल के एक पोल में कहा गया है कि वोटरों का प्रतिशत महामारी के इस दौर में कम रह सकता है.
पिछले तीन दशकों में कम वोटिंग ज़्यादातर रूढ़िवादियों के लिए फ़ायदेमंद रही है. सुधावरवादियों ने अपना वोट बैंक खो दिया है और सत्ता के पक्ष में वोट देने वाले मतदाता रूढ़िवादियों के साथ है.
इसलिए इस बार उम्मीद जताई जा रही है कि रईसी ईरान के नए राष्ट्रपति बन सकते हैं, एक ऐसे चुनाव में जिसे जानकार ढीला-ढाला चुनाव बता रहे हैं.
(बीबीसी मॉनिटरिंग दुनिया भर के टीवी, रेडियो, वेब और प्रिंट माध्यमों में प्रकाशित होने वाली ख़बरों पर रिपोर्टिंग और विश्लेषण करता है. आप बीबीसी मॉनिटरिंग की खबरें ट्विटर और फ़ेसबुक पर भी पढ़ सकते हैं)
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