ईरान चुनाव: इब्राहीम रईसी बने अगले राष्ट्रपति, अगस्त में लेंगे पद की शपथ

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ईरान के राष्ट्रपति चुनावों में कट्टरपंथी विचारों वाले इब्राहीम रईसी ने जीत हासिल कर ली है. 62 फीसदी वोटों के साथ जीत दर्ज करने के बाद रईसी देश के 13वें राष्ट्रपति बन गए हैं.
चुनाव नतीजे आने से कुछ देर पहले (90 फीसदी वोटों की गिनती के बाद) उन्होंने अपनी जीत के नागरिकों का धन्यवाद किया और कहा कि वो सभी के भरोसे पर खरा उतरेंगे.
रईसी ने मौजूदा राष्ट्रपति हसन रूहानी से मुलाक़ात की जिसके बाद दोनों नेता मीडिया के सामने आए. रईसी ने कहा कि उनकी सरकार लोगों की बेहतरी के लिए काम करने का हरसंभव कोशिश करेगी.
रईसी इसी साल अगस्त महीने की शुरूआत में पद की शपथ लेंगे. माना जा रहा रहा है कि देश की घरेलू राजनीति और विदेशी मामलों में उनका काफी प्रभाव रहेगा.
ईरान की राजनीतिक व्यवस्था में देश से जुड़े सभी मसलों पर आख़िरी फ़ैसला सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामनेई का होता है. सुप्रीम लीडर के बाद देश में का दूसरा सबसे बड़ा पद राष्ट्रपति का होता है.
लेकिन माना जा रहा है कि रईसी को सुप्रीम लीडर का भरोसा प्राप्त है. उन्हें ख़ामनेई के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा है.

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समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार ईरान के गृह मंत्री अब्दुलरज़ा रहमानी फ़ज़ली ने गृह मंत्रालय में राष्ट्रपति चुनाव के अंतिम नतीजे का ऐलान किया. उन्होंने इब्राहीम रईसी को विजेता घोषित किया गया है.
शुक्रवार 18 जून को ईरान में राष्ट्रपति के चुनाव के लिए वोट डाले गए थे. राष्ट्रपति पद की रेस में कुल चार उम्मीदवार थे.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार ईरान के विदेश मंत्री जवाद जरीफ़ ने कहा है कि इब्राहीम रईसी देश के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति हैं और सभी को अब उनके साथ मिलकर काम करना है.
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पाक प्रधानमंत्री ने दी बधाई
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने इब्राहीम रईसी की जीत पर उन्हें बधाई दी और कहा कि वो उन्हें उम्मीद है कि क्षेत्रीय शांति और विकास के लिए दोनों देशों के बीच के दोस्ताना रिश्ते और मज़बूत होंगे.
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काली पगड़ी बांधने वाले रईसी कौन हैं?
ईरान की न्यायपालिका के प्रमुख रहे मौलवी रईसी ने ईरानी मतदाताओं को यह कर अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश की थी कि वो ईरान में फैले कथित भ्रष्टाचार पर क़ाबू पाने और ईरान की आर्थिक समस्याओं को दूर करने के लिए सबसे बेहतर विकल्प हैं.
हालांकि कई लोगों और ख़ासकर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने 80 के दशक में राजनीतिक क़ैदियों को फाँसी देने में उनकी भूमिका को लेकर चिंता जताई है.
14 दिसंबर 1960 को उत्तर पूर्वी ईरान के मशहद में जन्मे हुज्जत-उल-इस्लाम सैय्यद इब्राहीम रईसी के बारे में कहा जाता है कि वो कट्टरपंथी विचारधारा को मानने वाले हैं.
रईसी ईरान के सबसे समृद्ध सामाजिक संस्था और मशहाद शहर में मौजूद आठवें शिया इमाम अली रज़ा की पवित्र दरगाह आस्तान-ए-क़ुद्स के संरक्षक भी रह चुके हैं.
बीबीसी मॉनिटरिंग के अनुसार रईसी हमेशा काली पगड़ी बांधते हैं जो इस बात का प्रतीक है कि वो सैय्यद हैं और मुसलमानों के आख़िरी पैगंबर मोहम्मद के वंशज हैं.
चुनावों से पहले रईसी को 'उदारवादी' माने जाने वाले राष्ट्रपति हसन रूहानी के उत्तराधिकार की रेस में सबसे आगे देखा जा रहा था और ये भी माना जा रहा था कि आने वाले वक़्त में वो सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामनेई के वारिस भी हो सकते हैं.
बीबीसी मॉनिटरिंग ने वॉशिंगटन पोस्ट में छपी एक ख़बर के अनुसार कहा है कि रईसी को आयतुल्लाह अली ख़ामनेई के संभावित उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा है.
माना जा रहा है कि ख़ामनेई अब 82 साल के हो गए हैं और उनका उत्तराधिकारी खोजना अब फ़िलहाल सबसे बड़ी प्राथमिकता है.

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राष्ट्रपति चुनाव से निकलेगा सुप्रीम लीडर के पद का रास्ता?
राष्ट्रपति चुनावों से पहले गार्डियन काउंसिल ने उम्मीदवारों के लिए कड़े नियम लागू किए थे. इसके चलते केवल सात उम्मीदवार ही राष्ट्रपति चुनावों की दौड़ में शामिल हो पाए जिनमें से पाँच कट्टरपंथी और दो उदारवादी माने जाते हैं.
संसद के पूर्व स्पीकर अली लारिजानी समेत कई उम्मीदवारों को राष्ट्रपति पद की रेस में शामिल होने से पहले ही अयोग्य घोषित कर दिया गया था.
सीएनएन में छपी ख़बर के अनुसार ऐसा करने के बाद रईसी के लिए ये चुनाव लगभग बिना किसी विरोध के जीतने जैसा हो गया था.
अल अरबिया के अनुसार अली लारिजानी को अयोग्य ठहराए जाने के बाद कइयों को उम्मीद थी कि इस मामले में आयतुल्लाह अली ख़ामनेई हस्तक्षेप करेंगे और गार्डियन काउंसिल का फ़ैसला पलटेंगे.
हालाँकि, ख़ामनेई ने इस फ़ैसले को न केवल अपना पूरा समर्थन दिया बल्कि चुनावों का बहिष्कार करने की माँग करने वालों की भी कड़ी आलोचना की.

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ब्लूमबर्ग में बॉबी घोष ने लिखा कि ख़ामनेई ने गार्डियन काउंसिल पर अपनी पकड़ का इस्तेमाल करते हुए और अपने पसंदीदा उम्मीदवार को चुनौती देने वालों को पहले ही रेस से अलग कर दिया.
वो लिखते हैं कि ये मामला देश की अर्थव्यवस्था और विदेश नीति संभालने से कहीं अधिक देश को संभालने का है और ख़ामनेई चाहते हैं कि उनका उत्तराधिकारी भी उन्हीं की तरह के विचारों वाला हो.
आयतुल्लाह अली ख़ामनेई ख़ुद सुप्रीम लीडर बनने से पहले दो बार राष्ट्रपति रह चुके हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद इस पद तक पहुँचने के लिए रईसी का रास्ता आसान हो जाएगा.
वॉशिंगटन पोस्ट में छपी एक ख़बर के अनुसार रईसी ख़ामनेई के सबसे भरोसेमंद लोगों में से एक हैं और दोनों ही देश और सरकार चलाने के लिए इस्लामी न्याय व्यवस्था के हक़ में हैं.
रईसी का मानना है कि देश को विदेशी निवेश की ज़रूरत नहीं है और अमेरिका के साथ बातचीत आगे नहीं बढ़ाई जानी चाहिए.
हालांकि ख़ामनेई के आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने के लिए अमेरिका से बातचीत का समर्थन करने के बाद रईसी ने इस बात का समर्थन किया था.
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सुप्रीम लीडर बनने की अफ़वाहों का रईसी ने खंडन नहीं किया
रईसी ने अपना करियर 1979 में हुई ईरान क्रांति के बाद ही शुरू किया था.
1978-79 में ईरान में पहलवी वंश के मोहम्मद रेज़ा शाह पहलवी के शासन के ख़िलाफ़ इस्लामी इंक़लाब शुरू हुआ जिसमें उस वक़्त के धार्मिक लोग, धनी वर्ग, व्यवसायी वर्ग और चिंतक शामिल हुए. इस आंदोलन के बाद पहलवी शासन को ख़त्म कर ईरान के इस्लामिक गणराज्य की स्थापना की गई थी.
ये आंदोलन आयतुल्लाह ख़ोमैनी के नेतृत्व में हुआ था जिसके बाद वो देश के पहले रहबर-ए-आला यानी ईरान के सर्वोच्च नेता बन गए. ईरान में रहबर-ए-आला यानी सुप्रीम लीडर को देश का सबसे बड़ा धार्मिक और राजनीतिक ऑथोरिटी माना जाता है. वो सेना के कमांडर इन चीफ़ भी होते हैं.
आयतुल्लाह ख़ुमैनी साल 1989 में अपनी मौत तक इस पद रहे. उनके दो बेटे थे मुस्तफ़ा ख़ामनेई और अहमद ख़ामनेई. मौजूदा सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामनेई, अहमद ख़ामनेई के बेटे हैं जो साल 1989 में सुप्रीम लीडर बने.
बीबीसी फ़ारसी सेवा के राना रहीमपुर ने एक लेख में लिखा था कि सुप्रीम लीडर बनने की अफ़वाहों का रईसी ने कभी खंडन नहीं किया और उनके कई क़दम भी इस तरफ़ इशारा करते हैं जैसे उन्हें इस पद के लिए तैयार किया जा रहा हो.
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हसन रूहानी के मुक़ाबले कम लोकप्रिय
रईसी ने न्यायपालिका में विभिन्न पदों पर काम किया है और सुप्रीम लीडर का चुनाव करने वाली काउंसिल ऑफ़ एक्सपर्ट के सदस्य और फिर चेयरमैन भी रह चुके हैं.
1988 में तेहरान इस्लामिक रिवोल्यूशन कोर्ट के डिप्टी अभियोजक के रूप में काम करते वक़्त वो कथित तौर पर बड़े पैमाने पर वामपंथी नेताओं, राजनीतिक क़ैदियों और असंतुष्टों को सामूहिक रूप से मृत्युदंड का फ़ैसला सुनाने वाली चार सदस्यों की स्पेशल कमीशन (इस कमीशन को अमेरिका ने कथित तौर पर डेथ कमीशन कहा था) के एक सदस्य थे.
इस घटना के बाद देश के भीतर उनकी लोकप्रियता कम हो गई थी.
इसके बाद साल 2017 में हसन रूहानी के ख़िलाफ़ राष्ट्रपति पद के चुनाव में उन्हें केवल 38.5 फ़ीसद वोट मिले थे. लेकिन चुनाव हारने के बावजूद रईसी को मार्च 2019 में आयतुल्लाह अली ख़ामनेई ने न्यायपालिका का प्रमुख बना दिया था.
इससे पहले वो मशहद में आठवें शिया इमाम अली रज़ा की मस्जिद की देखरेख करने वाली संस्था आस्ताने क़ुद्स रज़ावी में संरक्षक थे.
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नवंबर 2019 में अमेरिकी विदेश विभाग ने रईसी समेत आठ अन्य लोगों पर प्रतिबंध लगाए थे. अमेरिका का मानना था कि ये सभी आयतुल्लाह अली ख़ामनेई के बेहद क़रीबी हैं और मानवाधिकारों के उल्लंघन में शामिल हैं.
17 अप्रैल 2019 को अमेरिका ने ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्पस (आईआरजीसी) को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था. इसके बाद आईआरजीसी के कुछ अधिकारियों समेत रईसी का भी इंस्टाग्राम अकाउंट सस्पेंड कर दिया गया था.
रईसी आईआरजीसी के सदस्य नहीं थे. ऐसे में इसके एक दिन बाद उनका अकाउंट फिर से बहाल कर दिया गया था.
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