You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
कोरोना पर चीन की मदद क्या भारत के साथ बिगड़े रिश्ते सुधार देगी?
- Author, बीबीसी मॉनिटरिंग
- पदनाम, नई दिल्ली
भारत इस समय कोरोना वायरस महामारी की दूसरी लहर से जूझ रहा है. ऐसे में पूरी दुनिया ने उसके लिए मदद का हाथ भी आगे बढ़ाया है लेकिन चीनी और भारतीय मीडिया की नज़र हमेशा चीन पर रहती है कि वह क्या करने जा रहा है.
सीमा तनाव के बाद दोनों देशों के संबंध बेहद नाज़ुक दौर से गुज़र रहे थे और ऐसी उम्मीद जताई जा रही है कि कोविड-19 को लेकर की गई मदद दोनों देशों के संबंधों पर जमी बर्फ़ को पिघला सकती है.
चीन ने अब तक क्या किया?
बीते हफ़्तों में शिन्हुआ समाचार एजेंसी और दूसरे चीनी सरकारी मीडिया बार-बार इस ओर ध्यान दिला रहे हैं कि चीन की सरकार ने भारत की कोविड-19 महामारी में कई बार मदद का प्रस्ताव दिया है.
इसके साथ ही 30 अप्रैल को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजे गए संदेश के बारे में भी बताया जा रहा है.
विदेश मंत्री वांग यी ने भी 30 अप्रैल को फ़ोन पर भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर को सहानुभूति संदेश भेजा था और दोहराया था कि चीन कोविड-19 की सप्लाई के लिए भारत की हर संभव मदद करने के लिए तैयार है.
सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने उल्लेख किया है कि विदेश मंत्री ने 22 अप्रैल से 30 अप्रैल के बीच अपनी लगातार 7 प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान भारत के प्रति संवेदना प्रकट की थी और आधिकारिक सहायता का प्रस्ताव दिया था.
भारत में चीन के राजदूत सुन वेइडॉन्ग ने ट्विटर पर उन आरोपों का जवाब दिया था जिसमें कहा गया था कि चीनी एयरलाइंस ने भारत के लिए कार्गो उड़ानों को 'निलंबित' कर दिया है. हालाँकि, ट्विटर चीनी ज़मीन पर प्रतिबंधित है.
चीनी मीडिया ने सुन का 29 अप्रैल के ट्वीट के स्क्रीनशॉट को पोस्ट करते हुए लिखा था कि चीन ने अप्रैल से अब तक भारत को 5,000 वेंटिलेटर्स, 21,569 ऑक्सीजन जनरेटर्स और 2.1 करोड़ से अधिक सर्जिकल मास्क और 3.8 हज़ार टन दवाइयाँ उपलब्ध कराई हैं.
यह सभी चीज़ें दान में नहीं दी गई थीं, बल्कि उसे व्यावसायिक तरीक़ों से ख़रीदा गया था.
बॉलीवुड अभिनेता सोनू सूद ने 1 मई को ट्वीट करके चीन पर आरोप लगाया था कि वे रुकावट लगा रहा है तो चीनी राजदूत सुन ने यह भी भरोसा दिलाया था कि कार्गो उड़ानें सामान्य रूप से उड़ान भरती रहेंगी.
चीन का मीडिया क्या आशावादी है?
मैनलेंड चाइना और हॉन्गकॉन्ग का मीडिया इस बात को लेकर काफ़ी सतर्क है कि भारत अगर कोविड-19 की सप्लाई स्वीकार करता है तो इससे दोनों देशो के बीच तनाव कम करने में मदद मिलेगी.
जून 2020 में गलवान घाटी में दोनों देशों के बीच झड़प में दोनों पक्षों को भारी नुक़सान उठाना पड़ा था.
2 मई को चीनी ट्विटर कहे जाने वाले सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म वीबो पर ग्लोबल टाइम्स के प्रधान संपादक हू साइचिन ने कहा था, "चीन और भारत के बीच सीमा टकराव को हम भूल नहीं सकते हैं लेकिन भारत की महामारी के ख़िलाफ़ लड़ाई को लेकर चीन के पर्याप्त समर्थन ने एक संबंध भी बनाया है. यह निश्चित रूप से चीन को लेकर भारत की आम धारणा को आकार देने में मुख्य भूमिका निभाएगा."
यह भी पढ़ें: हज़ाराः पाकिस्तान में ‘निशाने’ पर रहते मुसलमान
4 मई को सरकारी करंट अफ़ेयर्स जर्नल वर्ल्ड अफ़ेयर्स के संपादक वू मेंगके ने एक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने उल्लेख किया कि कोरोना की दूसरी लहर से पहले भारत की मोदी सरकार ने महामारी को 'चीन से औद्योगिक चेन को हटाने के लिए और पश्चिम और अमेरिका से संबंध मज़बूत करने के एक मौक़े के तौर पर देखा था.'
भारत की आलोचना भी हो रही
साथ ही मीडिया ने यह भी माना है कि भारत में कोविड-19 संकट पर चीनी सोशल मीडिया पर कथित अंध-राष्ट्रवाद के कारण भारत से रिश्ते ठीक करने की चीन की कोशिशों में मुश्किलें आ सकती है.
वीबो पोस्ट और 4 मई को अंग्रेज़ी में लिखे संपादकीय में हू साइचिन ने ज़ोर दिया कि चीन की जनता की राय भारत या किसी और देश की तुलना में अधिक 'राष्ट्रवादी' नहीं है और भारत की कुछ आलोचना सामान्य है.
उन्होंने कहा, "आधिकारिक स्तर पर चीन भारत का मज़बूती से समर्थन और सहायता कर रहा है, जो चीन के रुख़ को दिखाता है. वहीं, समाज की विभिन्न आवाज़ें चीन में आपके विचार की विविधता को दिखाते हैं."
उनकी यह टिप्पणी तब आई है, जब आधिकारिक कम्युनिस्ट पार्टी एजेंसी और सार्वजनिक सुरक्षा मंत्रालय से जुड़े दो अकाउंट ने चीन में कोविड-19 के लिए 10 दिनों के अंदर अस्पताल बनाने और भारत में कोविड-19 पीड़ितों के अंतिम संस्कार की तुलना की थी.
यह दोनों तस्वीरें 30 अप्रैल और 1 मई को वीबो पर पोस्ट की गई थीं जिसके बाद भारतीय और चीनी सोशल मीडिया यूज़र्स के बीच वाद-विवाद शुरू हो गया था और बाद में इनको डिलीट कर दिया गया था.
भारतीय मीडिया की क्या है प्रतिक्रिया?
भारतीय मीडिया इस बात पर ज़ोर दे रहा है कि कैसे भारत ने अब तक चीन की मदद नहीं ली है.
द हिंदू अख़बार ने लिखा, "भारत ने चीन को व्यावसायिक आधार पर मेडिकल सप्लाई के स्रोत के रूप में चुना है."
29 अप्रैल को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक लेख में था कि भारत ने आपातकालीन सप्लाई में ख़ासतौर पर ऑक्सीजन से संबंधित उपकरण चीन से ख़रीदे हैं जो '16 सालों में नीतियों को लेकर एक बड़ा बदलाव दिखाता है.'
द हिंदू ने सूत्रों के हवाले से 29 अप्रैल को लिखा था कि भारत को चीन से उपकरण ख़रीदने में 'वैचारिक समस्या' नहीं है. इसमें लिखा था कि हाल ही में भारतीय एयरलाइन्स हॉन्ग कॉन्ग से 800 ऑक्सीजन कॉन्संट्रेटर्स को लेकर आई हैं.
26 अप्रैल को इकोनॉमिक टाइम्स अख़बार के लेख में था कि ऑक्सीमीटर जैसे चीनी सामान भारत के मेडिकल उपकरणों में पैठ जमा चुके हैं जो इस समय दोनों देशों के संबंधों में एक स्थिरता को दिखाता है.
सीमा तनाव और अमेरिका
भारतीय मीडिया ने यह भी कहा कि सीमा तनाव चीन-भारत के मैत्री संबंधों पर अभी भी हावी है और अमेरिका मज़बूत रणनीतिक साझेदार बना हुआ है.
द हिंदू में 28 अप्रैल को छपे एक लेख में बताया गया था कि कैसे अमेरिका ने कोरोना वैक्सीन के कच्चे माल पर रोक लगा दी थी और इससे जनता में नाराज़गी थी. दोनों देशों के संबंधों पर इससे 'गंभीर असर' पड़ने की आशंका थी.
यह भी पढ़ें: RCEP समझौता: चीन की सफलता या उसकी परेशानी का सबब
द प्रिंट न्यूज़ वेबसाइट ने सूत्रों के हवाले से कहा था कि लद्दाख़ में डिसएंगेजमेंट प्रक्रिया के लिए 1 मई को होने वाली भारत-चीन कॉर्प्स कमांडर स्तर की वार्ता को महामारी के कारण अगले कुछ महीने नहीं हो पाएगी.
सूत्रों ने वेबसाइट को बताया कि भारतीय जवान 'लद्दाख़ में मुस्तैदी से बैठे हुए हैं और चीन की गतिविधियों पर ड्रोन के साथ-साथ नज़र रख रहे हैं', वहीं चीनी जवान पूर्वी लद्दाख़ में 'वास्तविक नियंत्रण रेखा के बेहद क़रीब हैं' जितना कि वे अप्रैल 2020 के पहले थे.
30 अप्रैल को इंडिया टुडे ने रिपोर्ट किया कि, "कोविड-19 की गिरफ़्त में भारत के आने के बाद पूर्वी लद्दाख़ के इलाक़ों में चीनी सेना ने अपनी उपस्थिति को बढ़ा दिया है और वहां पर स्थाई टैंट और डिपो बना लिए हैं."
(बीबीसी मॉनिटरिंग दुनिया भर के टीवी, रेडियो, वेब और प्रिंट माध्यमों में प्रकाशित होने वाली ख़बरों पर रिपोर्टिंग और विश्लेषण करता है. आप बीबीसी मॉनिटरिंग की ख़बरें ट्विटर और फ़ेसबुक पर भी पढ़ सकते हैं.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)