कुवैत में एक हत्या के बाद क्यों हो रही है महिलाओं की चर्चा

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‘मैंने बोला था ना कि वो उसे मार देगा और उनसे मेरी बहन को मार डाला…सरकार कहां है?’ फ़ना अकबर ज़ोर-ज़ोर से ये कहती है, और रोती है.
सोशल मीडिया पर छाया ये वीडियो कुवैत में लोगों के ग़ुस्से की वजह बनता जा रहा है.
फ़राह हमज़ा अकबर की बीते सप्ताह एक युवक ने हत्या कर दी, इससे पहले उनके परिवार वालों ने फ़राह को उनका उत्पीड़न करने वाले से आदमी से बचाने के लिए सरकारी अधिकारियों से गुहार लगाई थी. लेकिन कुछ नहीं हुआ और आख़िरकार फ़राह की जान चली गई.
फ़राह को उनकी बेटी और भतीजी के सामने कार से अग़वा किया गया.
कुवैत के गृह मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि एक व्यक्ति ने फराह अकबर का उनकी कार से अपहरण किया और किसी अज्ञात जगह पर ले गया था.
बाद में उसने फ़राह को एक अस्पताल के बाहर छोड़ा मगर तब तक उसकी मौत हो चुकी थी. इस शख़्स को गिरफ्तार कर लिया गया है और उसने माना है कि फ़राह के सीने में उसने चाकू से वार किया.
मंत्रालय का कहना है कि शख़्स पर हत्या के आरोप तय किए गए हैं जिसके लिए मौत की सज़ा तक दी जा सकती है.
फ़राह के पिता का कहना है कि वह उस शख़्स को जानते तक नहीं है लेकिन उसे लेकर पहले भी उत्पीड़न का मामला दर्ज करा चुके हैं.

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महिलाओंकेलिएलंबीलड़ाई
इस घटना ने कुवैत में पहले से जारी महिलाओं के साथ हिंसा और उत्पीड़न की बहस को और मज़बूती दी है. इस साल की शुरूआत में देश में सोशल मीडिया कैंपने #Lan_ Asket चलाया गया था जिसका मतलब है ‘ मैं चुप नहीं रहूँगी’. इस कैंपने का मक़सद महिलाओं के उत्पीड़न की घटनाओं को सामने लाना था ताकि सरकार समाजिक बदलाव ला सके और समाज में महिलाएँ सुरक्षित महसूस कर सकें.
पिछले साल सितंबर में पारित एक घरेलू हिंसा कानून को एक सकारात्मक कदम के रूप में देखा गया. इसमें महिलाओं के लिए शेल्टर होम बनाने की योजना भी शामिल की गई साथ ही महिलाओं का उत्पीड़न करने वाले उनसे संपर्क ना कर सकें इसके लिए रिस्ट्रेनिंग ऑर्डर के प्रावधान की योजना भी शामिल की गई.
फ़राह अकबर की हत्या के बाद कई महिला और पुरूष इसके ख़िलाफ़ अपना विरोध और ग़ुस्सा दर्ज कराने ईरादा चौराहे पर जुटे. ये चौराहा देश की संसद से काफ़ी नज़दीक है जहां बीते साल दिसंबर में चुने गए सभी पुरूष सांसद बैठते हैं.
ये वही जगह है जहां फ़ातिमा एल-जमाई नाम की महिला बतौर गार्ड काम करती थी जिसे उसके भाई ने बीते साल मार डाला था.
महिलाओं की हत्याओं के मामले में एक और तथ्य जो बेहद महत्वपूर्ण है वो य कि अगर महिला की हत्या करने वाला शख़्स महिला पर व्यभिचार का आरोप लगाता है तो उसके लिए थोड़ा नरम रूख़ रखा जाता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि इस देश के दंड संहिता में ऐसा ही प्रावधान है, कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की लड़ाई के बाद भी ये बदला नहीं जा सका है.

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कई अनदेखे वीडियो सामने आ रहे हैं
फ़राह की मौत की घटना के बाद कई ऐसे वीडियो भी सामने आने लगे हैं जिन्हें अब तक नहीं देखा गया था. कुवैती फ़ेमिनिस्ट नामक एक समूह को परंपरावादी समझी जाने वाली कुवैत की बंजारा बद्दू महिलाएँ चलाती हैं.
समूह की एक महिला ने नाम ना छापने की शर्त पर बीबीसी से मैसेज के ज़रिए बात की.
उन्होंने बताया कि बीते साल उनकी महिलाओं से ऑनलाइन पर संपर्क हुआ और इस तरह वो कई समुदायों से आने वाली महिला अधिकारों के लिए सजग महिलाओं से मिले और फिर एक संस्था बनाई जो कुवैत की हर महिलाओं के लिए है. चाहे वो बद्दू जनजाति से हों, घरों में काम करने वाली महिला हों या ट्रांससेक्सुअल हो.
उनका मानना है कि कड़े क़ानून के ज़रिए ही महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा रोकी जा सकती है. महिलाओं को ऐसी हिंसा को रिपोर्ट करना काफ़ी मुश्किल होता है. साथ ही अगली चुनौती ये होती है कि उनके मामले को गंभीरता से लिया जाए.
वह कहतीं हैं, ‘’ जनजातियों से आने वाली महिलाओं के मामलों को अधिकारी गंभीरता से नहीं लेते क्योंकि उनके मामले को घरेलू बता दिया जाता है. बंजारे समूह की महिलाएँ वही मानती है जो क़ानून उनके परिवार और समाज ने बना दिया हो.’’

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रूकावटों की लंबी फ़ेहरिस्त
समाजिक कार्यकर्ता हदील अल शामरी जो ख़ुद इस समुदाय से आती है वह कहती हैं कि हम जैसी महिलाओं को मदद मिलने में कई अड़चनें आती हैं. बद्दू समुदाय से होने के कारण इस समुदाय के लोगों के पास कोई पहचान पत्र नहीं होता तो वे महिलाएँ हिंसा ,उत्पीड़न का मामला दर्ज ही नहीं करा सकतीं.
हदील कहती हैं कि ये महिलाएँ शिक्षा और नौकरियों के लिए भी संघर्ष करती है. ऐसे में किसी हिंसक रिश्ते को छोड़कर निकलना इनके लिए और असंभव सा बन जाता है.
वह कहती हैं,‘’ हम महिला होने का दर्द तो झेलते ही हैं लेकिन…बंजारा समुदाय से आने के कारण समाज के सबसे कमज़ोर तबके का दर्द भी हमारे हिस्से है.’’
पेशे से वकील और समाजिक कार्यकर्ता ओमनेया अशरफ़ कहती हैं कि उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर तो धमकियों का अनुभव नहीं किया है लेकिन अपने मुवक्किलों के ज़रिए ऐसे मामलों को काफ़ी क़रीब से देखा है.
वह कहती हैं, ‘’ अगर मेरा परिवार, मैं और मेरे दोस्त सुरक्षित हैं इसका ये मतलब नहीं की महिलाएँ सुरक्षित हैं. फ़राह का मामला उत्पीड़न से शुरू हुआ और हत्या पर ख़त्म हुआ ये बताता है कि महिला कितनी सुरक्षित है यहाँ. ‘’
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