पाकिस्तान: तहरीक-ए-लब्बैक पार्टी पर क्यों लगा प्रतिबंध और कितना होगा असर?

    • Author, साराह अतीक़
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम, इस्लामाबाद

बीते सप्ताह पाकिस्तान के विभिन्न शहरों में हिंसक प्रदर्शनों के बाद धार्मिक पार्टी तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) पर पाबंदी लगा दी गई है. यह पाबंदी साल 1997 के आतंकवादी निरोधी क़ानून के तहत लागू की गई है.

पाकिस्तान के गृह मंत्री शेख़ रशीद अहमद ने बुधवार को एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में इसकी घोषणा की थी.

शेख़ रशीद का कहना था कि पाबंदी लगाने का फ़ैसला आतंकवाद-रोधी क़ानून के तहत किया गया है और पंजाब की सरकार ने संगठन पर पाबंदी लगाने की सिफ़ारिश की है जिसके बाद इस सिलसिले में केंद्रीय मंत्रिमंडल को इसकी सिरफ़ारिश भेजी गई.

गृह मंत्री शेख़ रशीद ने बीबीसी से बात करते हुए इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि सरकार ने पाकिस्तान के चुनाव आयोग में रजिस्टर्ड तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाया है. लेकिन यह प्रतिबंध आंतक-रोधी क़ानून 1997 के रूल्स 11 बी के तहत लगाया गया है जिसके लिए सिर्फ़ मंत्रिमंडल की मंज़ूरी की दरकार होती है.

गृह मंत्री का कहना है कि इस पाबंदी के तहत उनकी तमाम राजनीतिक गतिविधियों पर पाबंदी होगी और उनकी संपत्तियां ज़ब्त कर ली जाएंगी.

गृह मंत्रालय की ओर से जारी होने वाली एक रिपोर्ट के मुताबिक़, टीएलपी की ओर से बीते तीन दिन से जारी हिंसक प्रदर्शनों के दौरान देशभर से 2135 लोग गिरफ़्तार किए गए जिनमें से 1669 पंजाब और 228 सिंध से गिरफ़्तार किए गए हैं.

रिपोर्ट में बताया गया है कि ख़ैबर पख़्तूनख़्वा से 193 और राजधानी इस्लामाबाद से 45 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है जबकि गिरफ़्तार लोगों के ख़िलाफ़ आतंकवाद विरोधी क़ानून के तहत मामले दर्ज किए गए हैं.

टीएलपी की पार्टी के तौर पर मौजूदगी

तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान की बुनियाद ख़ादिम हुसैन रिज़वी ने 2017 में रखी थी. बरेलवी सोच के समर्थक ख़ादिम हुसैन रिज़वी धार्मिक विभाग के कर्मचारी थे और लाहौर की एक मस्जिद के मौलवी थे.

लेकिन साल 2011 में जब पंजाब पुलिस के गार्ड मुमताज़ क़ादरी ने पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या की तो उन्होंने मुमताज़ क़ादरी का खुलकर समर्थन किया जिसके नतीजे में पंजाब के धार्मिक विभाग की नौकरी से उन्हें निष्कासित कर दिया गया.

इसके बाद ख़ादिम हुसैन रिज़वी ने न सिर्फ़ सम्मान के क़ानून और संविधान की धारा 295सी की सुरक्षा के लिए अभियान चलाया बल्कि मुमताज़ क़ादरी की रिहाई के लिए भी आंदोलन तेज़ किया.

जनवरी 2016 में मुमताज़ क़ादरी के समर्थन में सरकारी अनुमति के बग़ैर अल्लामा इक़बाल की मज़ार पर रैली की शुरुआत भी की.

मुमताज़ क़ादरी को फांसी दिए जाने के बाद इन्होंने आंदोलन किया लेकिन सरकार से बातचीत के बाद चार दिन के अंदर यह ख़त्म हो गया. इस धरने की समाप्ति पर मौलान ख़ादिम हुसैन रिज़वी ने ऐलान किया कि वो 'तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान या रसूल अल्लाह' नाम से धार्मिक पार्टी की बुनियाद रखेंगे.

साल 2017 में चुनाव आयोग की ओर से टीएलपी को बतौर राजनीतिक पार्टी रजिस्टर भी नहीं किया गया था कि तभी पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को संसद से अयोग्य ठहरा दिया गया.

इसके बाद खाली हुई एनए 120 सीट पर जब उपचुनाव हुआ तो टीएलपी के समर्थक स्वतंत्र उम्मीदवार शेख़ इज़हार हुसैन रिज़वी ने चुनाव में हिस्सा लिया और 7130 वोट हासिल किए, जो जमाते इस्लामी और पीपल्स पार्टी के उम्मीदवारों से भी अधिक थे.

इसके बाद टीएलपी ने मौलाना ख़ादिम हुसैन रिज़वी के नेतृत्व में उस वक़्त के क़ानून मंत्री ज़ाहिद हामिद और चुनाव क़ानून 2017 में बदलाव के ख़िलाफ़ इस्लामाबाद का रुख़ किया.

नवंबर 2017 में रावलपिंडी और इस्लामाबाद में क़ानून में बदलाव के ख़िलाफ़ एक कामयाब धरना दिया जिसने न सिर्फ़ ख़ादिम हुसैन रिज़वी बल्कि टीएलपी की शोहरत में बढ़ोतरी कर दी.

इस धरने के नतीजे में क़ानून मंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ा और सरकार ने पहली बारी टीएलपी की मांगों को स्वीकार करते हुए उनके साथ क़रार किया.

टीएलपी ने इस शोहरत का लाभ उठाते हुए साल 2018 के आम चुनाव में चारों प्रांतों में उम्मीदवार खड़े करने का ऐलान किया. पार्टी ने संसदीय और प्रांत की विधानसभा सीटों पर 559 उम्मीदवार खड़े किए जिनमें से दो उम्मीदवार सिंध विधानसभा की सीटों पर जीते भी और एक ने अन्य विधानसभा में जीत दर्ज की.

संसदीय सीटों के चुनाव में उनकी पार्टी वोटों के हिसाब से पांचवीं बड़ी पार्टी थी और उन्हें 22 लाख से अधिक वोट मिले थे.

इस तरह तहरीक के इस वक़्त तीन सदस्य विधानसभा में भी मौजूद हैं और ख़ादिम हुसैन रिज़वी का लाहौर में एक मदरसा जामिया अबुज़र ग़फ़्फ़ारी भी मौजूद है.

क्यों शुरू हुए थे हिंसक प्रदर्शन

सोमवार को पाकिस्तान में धार्मिक नेता साद हुसैन रिज़वी और उनके कई सहयोगियों की गिरफ़्तारी के बाद देश के कई हिस्सों में तनाव शुरू हुआ था.

लाहौर पुलिस ने तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान के मुखिया साद हुसैन रिज़वी और दूसरे नेताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं पर पाकिस्तान दंड संहिता की अलग-अलग धाराओं, आतंकवाद विरोधी क़ानून और लोक व्यवस्था अध्यादेश के तहत मामला दर्ज किया है.

इसके बाद से ही देशभर में प्रदर्शन हो रहे हैं जिससे कई इलाक़ों में जनजीवन भी प्रभावित हुआ है.

बीते साल टीएलपी प्रमुख ख़ादिम हुसैन रिज़वी के निधन के बाद संगठन की 18 सदस्य परिषद ने उनके बेटे साद रिज़वी को टीएलपी प्रमुख चुना था.

लाहौर में ख़ादिम हुसैन रिज़वी की अंतिम यात्रा के दौरान साद ने अपने भाषण में कहा था कि वो अपने पिता का मिशन जारी रखेंगे.

साद रिजवी उस वक़्त लाहौर में अपने पिता के मदरसे जामिया अबुज़र ग़फ़्फ़ारी में दरसे निज़ामी के आख़िरी साल के छात्र थे. दरसे निज़ामी एमए के बराबर मदरसे की शिक्षा को कहा जाता है.

टीएलपी के प्रदर्शन की वजह

फ़्रांस के राजदूत को देश से निकालने के लिए टीएलपी प्रमुख ख़ादिम हुसैन रिज़वी ने धरना दिया था.

इसके बाद पाकिस्तान की केंद्र सरकार ने 16 नवंबर 2020 को ख़ादिम रिज़वी के साथ क़रार किया था कि दो से तीन महीने में संसद के ज़रिए क़ानून बनाकर फ़्रांस के राजदूत को वापस भेजा जाएगा.

इसके बाद फ़रवरी 2021 में संगठन और सरकार के बीच बातचीत में वादा किया गया कि 20 अप्रैल तक फ़्रांस के राजदूत को देश से वापस भेजने की प्रक्रिया पर अमल किया जाएगा.

हाल ही में तहरीक-ए-लब्बैक ने कोरोना वायरस महामारी के बावजूद 20 अप्रैल तक फ़्रांस के राजदूत को देश से न निकालने पर इस्लामाबाद की तरफ़ लॉन्ग मार्च करने का ऐलान किया हुआ है.

तहरीक-ए-लब्बैक पर प्रतिबंध के बाद क्या होगा?

गृह मंत्रालय की ओर से तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान पर आतंक रोधी क़ानून 1997 की धारा बी-11 के तहत प्रतिबंध लगाया गया है और इस वक़्त पाकिस्तान में 78 संगठनों पर इस क़ानून के तहत पाबंदी है.

इस क़ानून के तहत जब किसी संगठन पर पाबंदी लगती है तो इसे फ़र्स्ट शेड्यूल की सूची में शामिल किया जाता है और इस सूची में शामिल संगठन के तमाम राजनीतिक कार्यालय सील कर दिए जाते हैं और उनमें मौजूद तमाम ऑफ़िस रिकॉर्ड और सामग्री को क़ब्ज़े में ले लिया जाता है.

इसके अलावा संगठन की तमाम संपत्तियां भी ज़ब्त कर ली जाती हैं. पार्टी को चुनाव या किसी और राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने की अनुमति नहीं होती और न ही ये पार्टी किसी परोपकारी या धार्मिक उद्देश्य के लिए आर्थिक सहायता भी इकट्ठा कर सकती है.

इसके अलावा मीडिया संगठन या कोई भी शख़्स जो प्रतिबंधित सगंठन के संदेश को फैलाने में मदद करेगा उसके ख़िलाफ़ भी कार्रवाई की जा सकती है.

तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान पाबंदी के ख़िलाफ़ क्या कर सकती है?

सरकार की ओर से टीएलपी पार्टी पर पाबंदी लागू करने की तैयारियां पूरी की जा चुकी हैं लेकिन टीएलपी 30 दिन के अंदर-अंदर इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ गृह मंत्रालय में अपील दायर कर सकती है.

पार्टी की इस अपील पर गृह मंत्रालय की एक कमिटी जांच करेगी और अगर ये कमिटी भी अपील रद्द कर देती है तो इसके ख़िलाफ़ 30 दिन के अंदर-अंदर टीएलपी हाईकोर्ट भी जा सकती है.

प्रतिबंध टीएलपी को पूरी तरह ख़त्म कर देगा?

सरकार की ओर से पहले भी कई राजनीतिक और धार्मिक संगठनों पर पाबंदियां लगाई जा चुकी हैं. पाकिस्तान के आतंकवाद-रोधी संगठन नेकटा के पूर्व प्रमुख एहसान ग़नी और इस्लामाबाद की नेशनल डिफ़ेंस यूनिवर्सिटी में आंतक-रोधी विषय के प्रोफ़ेसर डॉक्टर ख़ुर्रम इक़बाल का मानना है कि टीएलपी के ख़िलाफ़ ये पाबंदी शायद अधिक प्रभावी न हो सके.

डॉक्टर ख़ुर्रम इक़बाल का कहना है कि सरकार को पार्टी की सरगर्मियों को मुकम्मल तौर पर रोकने में कई चुनौतियों का सामना करना होगा.

वो कहते हैं, "सबसे पहली चुनौती तो ये है कि पहले की तरह बहुत संभावना ये है कि ये संगठन किसी दूसरे नाम से अपनी सरगर्मियां शुरू कर दे लेकिन अच्छी बात ये है कि बीते चंद सालों में क़ानून में ऐसे बदलाव लाए गए हैं जो संगठनों के नाम में बदलाव करके काम करने से रोकने में प्रभावी साबित हो सकते हैं."

इसके अलावा आर्थिक तौर पर तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान अधिकतर ऐसे लोगों के चंदे पर निर्भर है जो आज तक सामने नहीं आए और जिसका शायद रिकॉर्ड मौजूद न हो. उन लोगों की निशानदेही करना और उनकी आर्थिक सहायता को संगठन तक पहुंचने से रोकना भी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी.

इसी तरह टीएलपी से जुड़े मदरसों की निशानदेही भी सरकार के लिए एक मुद्दा होगी क्योंकि जब भी टीएलपी की ओर से प्रदर्शन किए गए उनमें बरेलवी संप्रदाय से संबंध रखने वाले मदरसों के छात्रों की एक बड़ी तादाद ने भागीदारी की.

आतंकवाद-रोधी संगठन नेकटा के पूर्व प्रमुख एहसान ग़नी का कहना है कि उनके अनुभव के मुताबिक़ संगठनों को प्रतिबंधित क़रार देना और उन पर पाबंदी लगा देने से उनकी सरगर्मियों को रोकने में ज़्यादा प्रभावी साबित नहीं हुआ है क्योंकि ये संगठन पाबंदी लागू होने के बाद किसी नए नाम से अपना काम शुरू कर देते हैं.

एहसान ग़नी के मुताबिक़, संगठनों पर पाबंदी लगा देने से अच्छा किसी शख़्स पर पाबंदी लगाना ठीक है क्योंकि पाकिस्तान में इस वक़्त कोई ऐसा क़ानून मौजूद नहीं है जो संगठन के लोगों को चुनाव लड़ने से नहीं रोकता है क्योंकि इस पाबंदी के बाद टीएलपी बतौर राजनीतिक पार्टी तो शायद चुनाव नहीं लड़ पाएगी लेकिन इससे जुड़े लोग स्वतंत्र उम्मीदवार के तर पर चुनाव लड़ सकते हैं.

वो कहते हैं, "पाबंदी लागू करने की ज़िम्मेदारी इस पर निर्भर करती है कि सरकार उनकी गतिविधि रोकने को लेकर कितनी गंभीर है क्योंकि सरकार समेत अन्य राजनीतिक पार्टियों में टीएलपी का समर्थन करने वाले लोग आज भी मौजूद हैं."

अगर सरकार उनकी गतिविधियों को रोकने में वाक़ई में गंभीर है तो उसे चाहिए कि हिंसा के लिए उकसाने वाले और हिंसा करने वाले लोगों की निशानदेही करे और उनके ख़िलाफ़ मुक़दमे दर्ज करके उन्हें सख़्त सज़ाएं दिलवाई जाए.

वरना पहले की तरह ये पाबंदी भी संगठनों की गतिविधियों को रोकने में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं लाएगी.

वहीं, गुरुवार को हिंसक विरोध प्रदर्शनों की वजह से इस्लामाबाद स्थित फ्रांस के दूतावास ने पाकिस्तान में मौजूद फ्रांसीसी नागरिकों और कंपनियों को फ़िलहाल पाकिस्तान से चले जाने की सलाह दी है.

फ्रांस 24 के मुताबिक, ''दूतावास ने कहा है कि पाकिस्तान में फ्रांस के हितों पर गंभीर ख़तरों के कारण फ्रांसीसी नागरिकों और कंपनियों को अस्थायी रूप से देश छोड़ने की सलाह दी जाती है.''

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