प्रिंस फ़िलिप: ब्रिटेन में बेहद सम्मानित शख़्सियत रहे

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ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय के पति ड्यूक ऑफ़ एडिनबरा राजकुमार फ़िलिप पिछले साठ बरस से अपनी पत्नी का लगातार साथ निभाते रहे और इसी वजह से वे ब्रिटेन में एक बेहद सम्मानित शख़्सियत रहे.
निश्चित तौर पर ये एक पुरूष के लिए मुश्किल भूमिका थी ख़ासकर उसके लिए जो विभिन्न विषयों पर गहरी पकड़ रखता हो और जिसके हाथ में नौसेना की कमान रही हो.
शायद ये राजकुमार फ़िलिप के व्यक्तित्व की ताक़त थी कि वे बेहद प्रभावशाली तरीक़े से रानी का साथ निभाते रहे ताकि वे अपनी ज़िम्मेदारियों को ठीक से पूरा कर सकें.
एक महिला संप्रभू के सहयोगी के तौर पर राजकुमार फ़िलिप के पास संवैधानिक शक्तियां तो नहीं थीं लेकिन राजशाही के इतने क़रीब भी कोई और नहीं था.
प्रिंस फ़िलिप का जन्म 10 जून 1921 को ग्रीस के कोर्फू़ द्वीप में हुआ हालांकि उनके जन्म प्रमाण पत्र पर जन्मदिन के तौर पर 28 मई 1921 दर्ज है क्योंकि उस समय तक ग्रीस ने ग्रेगोरियन कैलेंडर नहीं अपनाया था.

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बचपन और पढ़ाई
फ़िलिप का जन्म ग्रीस और डेनमार्क के राजकुमार ऐंड्रयू और बैटनबर्ग की राजकुमारी एलिस के यहां हुआ. 1922 के तख़्ता पलट के बाद उनके पिता को ग्रीस से निर्वासित कर दिया गया और परिवार को उनके रिश्तेदार किंग जॉर्ज पंचम ने एक युद्धपोत भेजकर बचाया.
परिवार को फ्रांस भेज दिया गया और राजकुमार फ़िलिप की शुरूआती पढ़ाई फ्रांस में ही हुई. सात बरस की उम्र में वो अपने रिश्तेदारों के पास इंग्लैंड चले आए और सर्रे के एक प्रेप स्कूल में पढ़ने लगे.
इस बीच पता चला कि उनकी मां स्किज़ोफ्रेनिया नामक बीमारी से पीड़ित हैं और उन्हें सुधार गृह में रखना पड़ा जिसके चलते बालक फ़िलिप अपनी मां के संपर्क में ज़्यादा नहीं रह पाए.
1933 में उन्हें दक्षिणी जर्मनी के एक यहूदी शिक्षाविद् कूर्त हान द्वारा चलाए जा रहे शूल श्लॉस सालेम स्कूल भेजा गया लेकिन हान को नाज़ी हिंसा के दौरान जर्मनी छोड़ कर स्कॉटलैंड जाना पड़ा जहां उन्होंने गॉर्डनस्टन स्कूल खोला. फ़िलिप को भी स्थानांतरित करके यहां पढ़ने भेज दिया गया.
गॉर्डनस्टन स्कूल की शिक्षा-दीक्षा ने ही फ़िलिप के आत्मनिर्भर व्यक्तित्व को तराशा.

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सैन्य सेवा और राजकुमारी एलिज़ाबेथ से मुलाक़ात
द्वितीय विश्वयुद्ध के आग़ाज़ के साथ ही फ़िलिप ने सेना में जाने का मन बनाया. उनकी इच्छा शाही वायुसेना में जाने की थी लेकिन उनके ननिहाल में नौसैना में जाने का इतिहास रहा है और फ़िलिप भी डार्टमाउथ स्थित रॉयल नेवल कॉलेज में कैडेट बन गए.
कॉलेज के ही दौरान एक बार किंग जॉर्ज छठे और रानी एलिज़ाबेथ का दौरा होने पर फ़िलिप को दो युवा राजकुमारियों- एलिज़ाबेथ और माग्ररेट की अगवानी की ज़िम्मेदारी दी गई.
फ़िलिप के साथ इस मुलाक़ात ने 13 वर्षीय युवा राजकुमारी पर गहरी छाप छोड़ी. अपने कॉलेज में फ़िलिप ने ख़ुद को सर्वश्रेष्ठ कैडेट साबित किया. उन्हें भूमध्य सागर में मौजूद नौसैनिक बेड़े का हिस्सा बनने और अपनी सेवाएं देने का मौक़ा मिला.
अक्तूबर 1942 तक वे शाही नौसेना के सबसे युवा लेफ्टिनेंट बन कर युद्धपोत एचएमएस व़ॉलेस पर अपनी सेवाएं दे रहे थे.
इस पूरे दौर में राजकुमारी एलिज़ाबेथ के साथ चिट्ठियों का आदान प्रदान होता रहा और उन्हें शाही परिवार के साथ रहने के कई मौक़े मिले.

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विवाह
फ़िलिप और राजकुमारी के रिश्ते की शुरुआत काफ़ी शांत वातावरण में हुई. हालांकि शाही कर्मचारियों में से कुछ ने फ़िलिप के आचार-व्यवहार पर आपत्ति ज़रूर ज़ाहिर की लेकिन राजकुमारी एलिज़ाबेथ अब तक पूरी तरह फ़िलिप से प्रेम करने लगी थीं. साल 1946 में फ़िलिप ने राजकुमारी के पिता से उनका हाथ माँगा.
हालांकि सगाई से पहले फ़िलिप को एक नई नागरिकता और पारिवारिक नाम की ज़रूरत थी. इसके लिए उन्होंने ब्रिटिश नागरिकता ली और अपनी मां का नाम माउंटबैटन अपना लिया.
विवाह वाले दिन किंग जॉर्ज छठे ने उन्हें ड्यूक ऑफ़ एडिनबरा, अर्ल ऑफ़ मेरियॉनेथ और बैरन ग्रीनविच ऑफ़ ग्रीनविच घोषित किया.
ये शाही विवाह 20 नवंबर 1947 को वेस्टमिन्स्टर एबे में संपन्न हुआ जिसके बारे में विंस्टन चर्चिल का कहना था कि यह द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बदरंग हुए ब्रिटेन पर रंगों की एक बौछार थी.
शादी के बाद फ़िलिप अपने नौसैनिक करियर में वापिस लौटे और उन्हें माल्टा भेजा गया.
इस शाही जोड़े के यहां 1948 में पुत्र चार्ल्स और 1950 में पुत्री एने का जन्म हुआ.

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महारानी और राजशाही
फ़रवरी 1952 में जब फ़िलिप और एलिज़ाबेथ केन्या में रह रहे थे तभी किंग जॉर्ज छठे की मौत हो गई. यह वह क्षण था जब फ़िलिप को राजकुमारी एलिज़ाबेथ को यह बताना था कि वो अब रानी हैं और ख़ुद अपने लिए एक नई भूमिका की तलाश करनी थी. वे अफ़सोस करने वालों में नहीं थे लेकिन उन्होंने इस बात का ज़िक्र ज़रूर किया है कि उन्हें अपने नौसैनिक करियर के ख़त्म होने का बेहद दुख था.
महारानी के राज्याभिषेक के वक़्त तक एक शाही फ़रमान जारी किया जा चुका था जिसके मुताबिक़ राजशाही में रानी के बाद राजकुमार फ़िलिप का स्थान सबसे ऊपर होगा लेकिन उनके पास कोई संवैधानिक भूमिका या पद नहीं होगा.
फ़िलिप के पास राजशाही को आधुनिक रंग-रूप देने के बहुत से नए विचार थे लेकिन शाही परिवार के पुराने वफ़ादारों के रवैये ने उनके इरादों को क़मज़ोर कर दिया और उन्होंने ख़ुद को बाहरी दुनिया में व्यस्त कर लिया. उनकी चकाचौंध भरी ज़िंदगी की तस्वीरें छपने लगीं.
साल 1956 के दौरान जब वे चार महीने की लंबी छुट्टी पर चले गए तो रानी एलिज़ाबेथ और फ़िलिप के रिश्ते को लेकर अटकलें लगने लगीं. हालांकि इस तरह की अफ़वाहों का खंडन कर दिया गया.
राजकुमार फ़िलिप को अगर किसी क्षेत्र में पूरा अधिकार दिया गया तो वो था परिवार में उनकी भूमिका. यह उनकी ही इच्छा थी कि बेटे राजकुमार चार्ल्स को पढ़ाई के लिए उसी गॉर्डनस्डन स्कूल भेजा जाए जहां वो ख़ुद पढ़े थे हालांकि चार्ल्स इस फ़ैसले से ज़्यादा ख़ुश नहीं थे क्योंकि उस स्कूल के दौरान उन्हें घर की याद और दोस्त दोनों सताते रहे.
राजकुमार चार्ल्स के आत्मकथा लेखक जौनेथन डिंबलबी का कहना है कि पिता के कठोर व्यवहार के चलते फ़िलिप और चार्ल्स के बीच दोस्ताना संबंध कभी नहीं रहे.

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वन्यजीवन के समर्थक
राजकुमार फ़िलिप के व्यक्तित्व पर अकेलेपन में गुज़रे उनके बचपन की गहरी छाप थी. कम उम्र में ही आत्मनिर्भर हो जाने के चलते उनके लिए ये समझना मुश्किल रहा कि हर किसी की ज़िंदगी में ऐसा हो ये ज़रूरी नहीं है.
युवाओं की बेहतरी के लिए काम उनकी प्रबल इच्छा थी. इसके चलते 1956 में ड्यूक ऑफ़ एडिनबरा अवॉर्ड स्कीम की घोषणा की गई जिसने लाखों युवाओं को ज़िंदगी के लिए बेहतर नज़रिया पैदा करने का मौक़ा दिया. राजकुमार फ़िलिप ने ताउम्र इस योजना के लिए काम करते रहे.
इसके अलावा वन्यजीव संरक्षण में भी उनकी गहरी रूचि थी. हालांकि 1961 में भारत यात्रा के दौरान एक चीते का शिकार करने की वजह से उन्हें काफ़ी आलोचना झेलनी पड़ी.
इसके घटना के बावजूद उन्होंने लगातार वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ़ फ़ंड का समर्थन किया और उसके पहले अध्यक्ष भी बने.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा था, "ये अद्भुत है कि इस दुनिया में विविध प्रकार का अंतर्सबंधित जीवन है. मैं सोचता हूं कि अगर इंसानों के पास ये ताक़त है कि वो किसी की ज़िंदगी और मौत निश्चित कर सकें तो इस ताक़त का इस्तेमाल नैतिक तरीक़े से होना चाहिए. क्यों किसी जीवन का ख़तरे में डाला जाए."
राजकुमार फ़िलिप की खेलों में भी ख़ासी दिलचस्पी थी.

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महारानी की ताक़त
राजकुमार फ़िलिप एक ऐसी शख़्सियत थे जिन्हें अपने जीवन में पारिवारिक प्रेम हासिल नहीं हुआ. उनमें एक अगुआ की भूमिका निभाने के गुण थे लेकिन ज़िंदगी ने उन्हें दूसरे नंबर पर रहने को मजबूर कर दिया.
बीबीसी से बातचीत में उन्होने कहा था, "मैंने बस वही किया जो मुझे सबसे बेहतर लगा. मेरे लिए अपना काम करने का तरीक़ा अचानक से बदलना मुमकिन नहीं है. मैं अपनी रुचियां और प्रतिक्रिया बदल नहीं सकता."
राजकुमार फ़िलिप की 90वीं सालगिरह पर अपने संदेश में प्रधानमंत्री जेम्स कैमरन ने जून 2011 में कहा था "उन्होंने हमेशा अपने हिसाब से काम किया. मैं समझता हूं कि उनका सामान्य नागरिक जैसा बर्ताव और सटीक रवैया ब्रिटिश लोगों को बेहद पसंद है."
हालांकि एक बात जो बिना किसी संदेह के कही जा सकती है वो यह कि उनका सबसे बड़ा योगदान वो बेशक़ीमती सहयोग और समर्थन है जो उन्होंने महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय को दिया.
इस शाही जोड़े की शादी की पचासवीं सालगिरह के समारोह पर महारानी ने अपने संदेश में कहा था, "उन्हें तारीफ़ें सुनने की आदत नहीं है लेकिन इतने बरसों में वे मेरी ताक़त बने रहे. मैं, हमारा पूरा परिवार, ये देश और दुनिया के कई अन्य देश उनके क़र्ज़दार हैं जिसका वो ख़ुद कभी तक़ाज़ा भी नहीं करेंगे और ना ही किसी को उसका अंदाज़ा होगा."
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