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वियना में ईरान न्यूक्लियर डील में शामिल होने पर विचार करेगा अमेरिका
ईरान परमाणु समझौते को फिर से लागू करने के लिए अमेरिका वियना में होने जा रही बातचीत में शामिल होगा. इस पर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा है कि वे फिर से यह महत्वपूर्ण समझौता लागू करना चाहते हैं.
हालांकि इस समझौते के फिर से प्रभावी होने की संभावना तभी है जब इसमें शामिल सभी छह देश ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाने को तैयार हो जाते हैं. ईरान ने भी कहा है कि वह तभी बातचीत के लिए तैयार होगा जब उस पर लगे प्रतिबंध ख़त्म कर दिए जाएंगे.
हालांकि ईरान के लिए भी ज़रूरी होगा कि वह समझौते के अनुरूप यूरोनियम शोधन की तय सीमा का पालन करे. इस तरह दोनों पक्ष एक दूसरे से अपनी शर्तें पहले मानने की उम्मीद लगा रहे हैं.
यह बैठक इस समझौते में शामिल 'पी5+1' देशों के बाहर यानी आस्ट्रिया में आयोजित की जा रही है. अमेरिकी अधिकारी आस्ट्रिया में होने वाली बैठक में भाग लेंगे. इसमें यूरोपीय संघ के अधिकारी मध्यस्थता का काम करेंगे.
अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नेड प्राइस ने सोमवार को पत्रकारों से कहा कि हम आने वाली चुनौतियों को कम करके नहीं आंक रहे हैं.
उनके मुताबिक़, 'अभी इस बारे में कुछ भी कहना ज़ल्दबाजी होगी. हमें उम्मीद है कि इस मामले में तुरंत कोई सफलता नहीं मिल सकती क्योंकि हमें पता है कि यह बातचीत काफ़ी जटिल होने जा रही है.'
नेड प्राइस ने बताया कि बाइडन प्रशासन ने दोनों पक्षों की ओर से समझौते का पालन करने के लिए कई चरण तय किए हैं. उधर ईरान के विदेश मंत्री ने कहा है कि मंगलवार को होने वाली बातचीत का उद्देश्य प्रतिबंध हटाने का रास्ता तैयार करना है.
'अमेरिका को प्रतिबंध हटाना होगा'
वहीं ईरान के प्रवक्ता सईद खातिबज़ादेह ने तेहरान ने कहा, ''चाहे संयुक्त आयोग के एजेंडे से परिणाम मिले या न मिले यह इस पर निर्भर करेगा कि यूरोपीय संघ और पी4+1 देश अमेरिका को उसकी ज़िम्मेदारी याद दिलाएं और अमेरिका अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करे.''
इस बीच यूरोपीय संघ के वार्ताकारों ने उम्मीद जताई है कि इस बातचीत में मई तक कुछ ठोस निकलकर आएगा. इसके एक महीने बाद ईरान में राष्ट्रपति चुनाव होने जा रहा है.
ईरान परमाणु समझौता
दुनिया की बड़ी शक्तियों में से ज्यादातर का मानना था कि ईरान परमाणु बम बनाने के लिए चुपचाप यूरेनियम का संवर्द्धन कर रहा है. हालांकि ईरान इसका खंडन करने के साथ यूरेनियम संवर्द्धन को अपना अधिकार कहता रहा है.
बहरहाल लंबे समय की बातचीत के बाद जुलाई 2015 में ईरान और दुनिया के छह देशों के बीच ईरान परमाणु समझौते को मंज़ूरी मिली. और इसे जनवरी 2016 से लागू किया गया.
वैसे औपचारिक तौर पर यह समझौता संयुक्त व्यापक कार्ययोजना (जेसीपीओए) के नाम से जाना जाता है. इस समझौते में शामिल छह देशों में सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्यों यानी पी5 (अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, फ्रांस और चीन) के अलावा जर्मनी भी शामिल था. यूरोपीय संघ भी इसका एक पक्ष था.
ट्रंप का समझौता मानने से इनकार
बाद में, 2018 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते से बाहर निकलने और ईरान पर फिर से प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया था. उस समय डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि यह समझौता एक कल्पना पर आधारित है. उनके मुताबिक़, प्रतिबंधों को हटाकर हत्यारे ईरान को आज़ादी दे दी गई है कि वह आने वाले समय में ख़ुद को ज़्यादा मोलभाव करने लायक़ बना ले.
समझौते की ख़ासियत यह थी कि ईरान को न्यूक्लियर इनर्जी से जुड़े कुछ कामों को बंद कर देना था.
इसके बदले में 'पी5+1' देशों ने ईरान पर से प्रतिबंधों को ख़त्म करने का ऐलान किया था. हालांकि अमेरिका के समझौते से बाहर निकल जाने के बाद ईरान ने फिर से प्रतिबंधित कामों को शुरू कर दिया.
अमेरिका की नई जो बाइडन सरकार पर दबाव डालने के लिए ईरान ने जनवरी से 20 फ़ीसद की शुद्धता तक यूरेनियम को संवर्द्धित करना शुरू कर दिया था.
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