चीन में मीडिया का वो सच जिसकी वजह से मुझे बाहर जाना पड़ा: बीबीसी संवाददाता की ज़ुबानी

- Author, जॉन सडवर्थ
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
चीन में रिपोर्टिंग की भयंकर वास्तविकता अंत अंत तक मेरा पीछा करती रही.
मेरा परिवार जब बिना किसी तैयारी के जैसे तैसे पैकिंग कर झटपट वहाँ से जाने के लिए एयरपोर्ट निकला, तब सादे कपड़ों में पुलिस घर के बाहर से ही हमारी निगरानी कर रही थी और यह हमारे चेक-इन किए जाने तक जारी रहा.
उम्मीद के अनुसार ही अंत तक, चीन की प्रोपगैंडा मशीन अपने पूरे जोर पर रही, उसने इस बात को सिरे से ख़ारिज कर दिया कि चीन में मुझे किसी भी तरह के ख़तरे का सामना करना पड़ा, जबकि मैं उन ख़तरों को साथ के साथ पर्याप्त तरीके से स्पष्ट कर रहा था.
"विदेश मंत्री ने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी कि सडवर्थ की सुरक्षा को कोई ख़तरा है," कम्युनिस्ट पार्टी के नियंत्रण वाली ग्लोबल टाइम्स ने कहा, "सिवाए इसके कि 'फ़र्ज़ी ख़बरों' के लिए शिनजियांग के लोग शायद उन पर क़ानूनी कार्रवाई करते."
ऐसे बयान वहाँ अदालती प्रणाली की वास्तविकता को दर्शाते हैं. और कम्युनिस्ट पार्टी की समर्थक मीडिया, एक स्वतंत्र अदालत के रूप में इसे पश्चिम देशों की एक ग़लत धारणा के रूप में ख़ारिज कर देता है.
चीन के विदेश विभाग ने डेली प्रेस वार्ता के मंच से अपने हमले जारी रखते हुए गुरुवार को बीबीसी की ख़बरों को फ़र्जी बताते हुए इसकी आलोचना की.
इसने शिनजियांग से एक कार प्लांट संचालित करने के फॉक्सवैगन के निर्णय पर हाल में लिए गए हमारे एक इंटरव्यू की वीडियो क्लिप चलाई और कहा कि "क्या यह चीनी लोगों के गुस्से को भड़काने वाली रिपोर्ट नहीं है."
निश्चित तौर पर यह अविश्वसनीय दावा है, ऐसे में जबकि बड़ी संख्या में चीन के लोग हमारी रिपोर्ट को नहीं देख सकते क्योंकि लंबे वक्त से इसका प्रसारण यहाँ रोका गया हुआ है.
लेकिन, यह सब जब यहाँ की मेरी पोस्टिंग को एक भयावह और डरावने अंत तक ले आया है, तो यह याद रखने लायक है कि मेरा मामला बीते वर्षों में चीन से विदेशी मीडिया के चले जाने की एक लंबी फेहरिस्त में से एक है. और यह उस बड़ी लड़ाई का हिस्सा है जो चीन विचारों और सूचनाओं के ख़िलाफ़ चला रहा है.
मीडिया बना युद्धक्षेत्र
विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में चीन की स्वीकृत देने की मांग के दौरान पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने अपने भाषण में एक बार कहा था कि "आर्थिक आज़ादी से स्वतंत्रता की आदतें बनती हैं."
इसके बाद उन्होंने कहा था कि "और स्वतंत्रता की आदतें लोकतंत्र की उम्मीदें पैदा करती हैं."
वह खुली आंखों से किया गया कल्पना था, कि जैसे जैसे चीन आर्थिक रूप से मजबूत होता जाएगा यह मुक्त भी होता जाएगा, 2012 में जब मैंने यहाँ काम करना शुरू किया तो चीन के समाचार विश्लेषण और अकादमिक चर्चा में यह अक्सर सुना जाता था.
लेकिन उस वर्ष जब मैं यहाँ आया तो चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव के रूप में शी जिनपिंग की देश के सबसे शक्तिशाली पद पर नियुक्ति के रूप में वो घटना हुई जो उस अनुमान को पूरी तरह से अनुभवहीन साबित करने के लिए आया था.

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हालाँकि इसमें कोई शक नहीं कि वैश्विक व्यापार के पैटर्न में भारी बदलाव ने चीन को बदल दिया है- लेकिन आर्थिक और सामाजिक बदलाव के बवंडर को इसने और उजागर कर दिया है, और अब लोकतंत्र की वो उम्मीदें पहले से कहीं दूर दिखाई दे रही हैं.
राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पहले से ही कठोर यहाँ की राजनीतिक व्यवस्था का उपयोग समाज के लगभग हर पहलू पर नियंत्रण करने में किया और 10 साल के उनके कार्यकाल में मीडिया का मैदान एक स्पष्ट युद्धक्षेत्र के रूप में उभरा है.
दस्तावेज़ संख्या 9- को एक उच्चस्तरीय लीक के रूप में बताया गया- जल्द ही उस लड़ाई में पश्चिमी मूल्यों के साथ प्रेस की आज़ादी की मुख्य लक्ष्य के रूप में पहचान की गई.
और, जैसा कि बीबीसी के अनुभव से पता चलता है, कोई भी विदेशी मीडिया जो शिनजियांग की स्थिति के बारे में सच्चाई को उजागर करता है, कोरोना वायरस और यहाँ इसकी उत्पत्ति से निपटने पर सवाल करता है या हांगकांग के लिए इसकी योजनाओं के विरोधियों को स्वर देता है, निश्चित ही वह अब उनके निशाने पर है.
लोकतंत्र की बहस को कमज़ोर करना
लेकिन मेरे वहाँ से चले आने के बाद भी चीन प्रोपेगैंडा के तहत हमले जारी रखे है, यह भी उल्लेखनीय है कि इस संदेश के प्रसार के लिए विदेशी सोशल मीडिया नेटवर्क का वह धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहा है.

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निश्चित ही, विडंबना यह है कि, इसके साथ ही चीन में विदेशी पत्रकारिता के लिए जगह कम होती जा रही है, कम्युनिस्ट पार्टी अपने मीडिया रणनीति में भारी निवेश कर रही है, वह ओपन मीडिया तक आसान पहुँच का भरपूर फायदा उठा रही है.

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ऑस्ट्रेलियाई सामरिक नीति संस्थान के अंतरराष्ट्रीय साइबर नीति केंद्र के शोधकर्ताओं के मुताबिक इस रिपोर्ट के दस्तावेज़ों को एक रणनीति के तहत कई प्लेटफॉर्म पर साझा किया गया, आक्रामक शैली अपनाते हुए एक साथ कई ट्वीट डाल कर विदेशी रिपोर्टिंग की आलोचना की, जबकि खुद वहाँ के लोगों इस विदेशी सोशल मीडिया के इस्तेमाल से वंचित हैं.
स्टेट-मीडिया के प्रचारक बिना किसी प्रतिबंध के अपने कंटेंट विदेशों प्रकाशित और पोस्ट करते हैं जबकि देश के भीतर चीन मीडिया की आज़ादी को बेरहमी से रोकता है, विदेशी प्रसारणों, वेबसाइट्स और विदेशी पत्रकारों को अपने सोशल मीडिया नेटवर्क पर ब्लॉक कर देता है.
ऐसी स्थिति में, वहाँ से मेरे प्रस्थान को उभरते विचारों के असंयमित लड़ाई के एक छोटे से हिस्से के रूप में देखा जा सकता है.
यह सटीक जानकारी के मुक्त बहाव के लिए अच्छी संभावना नहीं है.
वहाँ पहुँच कम होने से यह समझने की हमारी क्षमता कम हो जाएगी कि चीन में वास्तव में हो क्या रहा है, जबकि इसके साथ ही वह लगभग हर जगह लोकतांत्रिक बहस को कम करने के लिए फ़्री प्रेस संस्थानों की शक्ति का उपयोग कर रहा है.
सच्चाई की ओर ले जाते फुटप्रिंट
हालाँकि यह कोई आसान जवाब नहीं है, और जबकि राष्ट्रपति बुश की आदर्शवाद भविष्यवाणी की बातें यहाँ बहुत पहले ही गायब हो चुकी हैं, फिर भी कुछ उम्मीदे हैं.
चीन के बार बार इसे झूठा बताकर ख़ारिज करने के बावजूद, शिनजियांग में जो कुछ हो रहा है, हाल के दिनों में उसकी सच्चाई से जुड़ी कई जानकारियाँ सामने आई हैं- जो खुद उनके अपने आंतरिक दस्तावेज़ों और प्रौपेगेंडा रिपोर्ट पर आधारित हैं
बड़ी संख्या में लोगों को कैद करने के बारे में एक आधुनिक डिजिटल महाशक्ति मदद नहीं कर सकती लेकिन कुछ ऑनलाइन फुटप्रिंट ज़रूर छोड़ सकती है और उन्हें उजागर करने की महत्वपूर्ण पत्रकारिता के प्रयास दूर रहते हुए भी जारी रहेंगे.
अब मैं विदेशी पत्रकारों की उस बढ़ती हुई कतार में शामिल हूं जिन्हें चीन की कहानियों को ताइपे या एशिया के अन्य शहरों में रहते हुए कवर करने के लिए मजबूर किया गया है.

भले ही चीन में विदेशी प्रेस की संख्या में कमी आई है लेकिन जो हैं वो बहादुर और दृढ़ सदस्य हैं जो वहाँ की कहानी बताने के लिए प्रतिबद्ध हैं.
यह भी उल्लेखनीय है कि, राजनीतिक नियंत्रणों के कड़े दायरे के बीच कुछ ऐसे असाधारण चीनी नागरिक भी हैं जो व्यक्तिगत जोखिम उठा कर सेंसरशिप के बीच कहीं महत्वपूर्ण सिटीजन जर्नलिज्म करने के तरीक़े खोज लेते हैं और अपने देश की कहानी अपने शब्दों में बताते हैं.
वुहान लॉकडाउन के शुरुआती दिनों के बारे में हम जो जानते हैं उनमें से अधिकांश इन्हीं सिटीजन जर्नलिस्ट से आए थे, जो आज उस बहादुरी की कीमत चुका रहे हैं.
बीजिंग हवाई अड्डे के डिपार्चर हॉल में बैठे ये उम्मीद कर रहा हूं कि मैंने सादे लिबास वाले पुलिवालों को आखिरी बार पीछे छोड़ दिया है.
विचारों की नई वैश्विक लड़ाई में, हमें कभी यह नहीं भूलना चाहिए कि चीन के नागरिक वहाँ की सच्चाई बताने में लगातार सबसे बड़े जोखिम का सामना करते हैं.
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