अफ़ग़ान-तालिबान वार्ता से क्या चाहता है रूस जिसमें चीन और पाकिस्तान भी हैं शामिल

    • Author, कमलेश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

अफ़गानिस्तान शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए 18 मार्च को रूस की राजधानी मॉस्को में एक सम्मेलन हो रहा है.

इस सम्मेलन में अफ़ग़ान शांति प्रक्रिया के लिए अमेरिका के विशेष प्रतिनिधि ज़ल्मे ख़लीलज़ाद शामिल होंगे. साथ ही अफ़गानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ ग़नी भी इसमें उपस्थित होंगें. चीन और पाकिस्तान को भी सम्मेलन के लिए निमंत्रण दिया गया है.

इस सम्मेलन को दोहा में अमेरिका और तालिबान के बीच फरवरी 2020 को हुए शांति समझौते को आगे बढ़ाने की दिशा में एक कदम के तौर भी देखा जा रहा है.

अफ़ग़ान-तालिबान शांति वार्ता को लेकर रूस में पहले भी बैठक हो चुकी है. नवंबर 2018 में रूस में तालिबान को बातचीत के लिए बुलाया गया था.

इसके बाद फरवरी 2019 में भी मॉस्को में तालिबान के साथ बैठक हुई थी लेकिन इसमें अफ़ग़ान सरकार शामिल नहीं थी. इसमें अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने हिस्सा लिया था.

लेकिन, 2019 में ही हुई बैठक में अफ़ग़ानिस्तान के वरिष्ठ राजनेता शामिल हुए थे. इस बैठक के बाद एक तालिबान अधिकारी ने कहा था कि बातचीत में अच्छी प्रगति हुई है.

अफ़ग़ान-तालिबान शांति वार्ता में शामिल सभी देशों के अपने हित हैं. रूस में होने वाली वार्ताएँ और समझौते की कोशिशें उसकी गहरी दिलचस्पी की ओर इशारा करते हैं.

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अमेरिका के साथ एक ही मंच पर

अफ़ग़ानिस्तान एक ऐसा इलाक़ा है जहां सोवियत संघ और अमेरिका आमने-सामने रहे हैं. सोवियत संघ के विघटन के बाद भी अमेरिका और रूस के बीच दुश्मन देशों की स्थिति रही है. लेकिन, इसके बाद भी शांति वार्ता के लिए दोनों देश एक ही मंच पर आ गए हैं.

रूस अफ़ग़ान-तालिबान शांति वार्ता का हिस्सा बनकर नई व्यवस्था में अपने हितों को खोज रहा है. जिसे जानकार रूस की नई अफ़ग़ानिस्तान नीति भी कह रहे हैं.

इस इलाक़े को रूस के लिए रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा के नज़रिए से अहम माना जा रहा है.

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फ़ॉर साउथ एशियन स्टडीज़ के प्रोफेसर संजय के भारद्वाज कहते हैं, “अफ़ग़ान सरकार पर अमेरिका का प्रभाव रहा है और तालिबान अमेरिकी विरोधी माना जाता है. ऐसे में नई व्यवस्था के तहत रूस अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान को एक महत्वपूर्ण सहयोगी के तौर पर देख रहा है. वह तालिबान के साथ सामान्य रिश्ता रखना चाहता है जिससे उसके कई हित सधते नज़र आते हैं.”

“रूस नहीं चाहेगा कि अफ़ग़ानिस्तान में कोई भी नई व्यवस्था केवल अमेरिकी मध्यस्थता से बने. इससे अफ़ग़ान सरकार पर अमेरिकी प्रभाव बना रहेगा. यहां रूस अपनी मौजूदगी भी बनाए रखना चाहता है.”

मध्य एशिया में सुरक्षा और दबदबा

रूस की एक बड़ी रूचि मध्य एशियाई देशों में स्थितियां सामान्य रखने की है जिसमें तालिबान की अहम भूमिका हो सकती है.

किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उज़बेकिस्तान और कज़ाख़िस्तान जैसे देश अफ़ग़ानिस्तान के पड़ोसी देश हैं. इनमें से कुछ देश कलेक्टिव सिक्योरिटी ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन और यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन में रूस के सहयोगी भी हैं. इन देशों में चरमपंथी संगठन भी सक्रिय हैं जिनकी मजबूती से रूस की चिंताएं बढ़ सकती हैं.

पूर्व राजदूत अशोक सज्जनहार कहते हैं, “रूस के लिए अफ़ग़ानिस्तान में शांति होना बहुत ज़रूरी है क्योंकि वहां पर इस्लामिक स्टेट के लड़ाके बड़ी संख्या में आ गए हैं. जब से रूस ने ईराक और सीरिया में सितंबर 2005 में एंट्री की है इस्लामिक स्टेट के लड़ाके वहां से निकलकर अलग-अलग जगह चले गए हैं. अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व में नंगरहार प्रांत में उनका खासा दबदबा है.”

“अफ़ग़ानिस्तान की तीन मध्य एशियाई देशों से सीमाएं भी मिलती हैं. ताजिक्स्तान के साथ करीब 1300 किमी., उज़बेकिस्तान के साथ 137 किमी. और तुर्कमेनिस्तान के साथ 700-800 किमी. की सामी है. तालिबान के साथ रिश्ते खराब होना रूस की सुरक्षा के लिए ख़तरानाक हो सकता है. यहां मौजूद आंतकी समूह सक्रीय हो जाएंगे और इस्लामिक स्टेट भी पैर पसार सकता है.”

रूस के साथ अन्य मसला अफ़ग़ानिस्तान में आर्थिक निवेश और उसके ज़रिए मध्य पूर्वी देशों तक अपनी पहुंच और बढ़ाना भी है. जानकार कहते हैं कि रूस का अफ़ग़ानिस्तान में निवेश बहुत कम रहा है जिसे वो तालिबान के साथ बेहतर संबंधों से आगे बढ़ा सकता है.

शांति वार्ता में रूस की भूमिका की बात करें तो तालिबान का अमेरिका से ज़्यादा भरोसा रूस पर होना स्वाभाविक है. संजय भारद्वाज कहते हैं कि इस वार्ता में अफ़ग़ान सरकार और तालिबान को अलग-अलग देशों का समर्थन है और तालिबान को रूस से वो समर्थन हासिल है. ऐसे में तालिबान को समझौते में बनाए रखने में रूस एक भूमिका अदा कर सकता है.

अफ़ग़ान-तालिबान वार्ता में अगर अमेरिका की बात करें तो संजय के भारद्वाज कहते हैं कि इसमें बाहरी तौर पर सबसे अहम भूमिका में अमेरिका है जो मौजूदा अफ़ग़ान सरकार और तालिबान के बीच एक रास्ता निकालने की कोशिश में लगा है.

अमेरिका को अफ़ग़ानिस्तान में लड़ते हुए 20 साल हो गए हैं और अब वहां युद्ध में उलझे रहने के लिए कुछ नहीं बचा है. देश के अंदर भी इसके लिए आलोचना होती रहती है. इसलिए अमेरिका भी वहां से निकलना चाहता है.

अमेरिका के जनवरी 2021 तक अफ़ग़ानिस्तान में 2500 सैनिक ही बचे हैं और पूर्ण सैन्य वापसी के लिए इस साल मई की समयसीमा तय है.

सम्मेलन से क्या होगा हासिल

अमेरिका ने इस महीने एक प्रस्ताव दिया था जिसके मुताबिक अफ़ग़ानिस्तान में अशरफ गनी सरकार की जगह एक अंतरिम सरकार का गठन किया जाएगा. जिसके लिए तालिबान और मौजूदा सरकार सदस्यों को नामित करेंगे और देशभर में संघर्षविराम लागू किया जाएगा.

इसके तहत नए संविधान को अपनाने के बाद राष्ट्रपति और संसदीय चुनाव आयोजित किए जाएंगे.

रूस ने भी शांति समझौते के एक हिस्से के तौर पर अंतरिम सरकार के विचार का समर्थन किया है. लेकिन, अशरफ गनी ने अंतरिम सरकार के गठन से इनकार करते हुए चुनाव के ज़रिए सरकार चुने जाने पर जोर दिया है.

वहीं, तालिबान ने संघर्षविराम और चुनाव कराने का विरोध किया है.

मॉस्को में होने वाला सम्मेलन टकराव के इन्हीं मसलों पर बातचीत को आगे बढ़ाएगा. लेकिन, यहां से बात कहां तक पहुंचेगी इसे लेकर जानकारों को बहुत ज़्यादा उम्मीद नहीं है.

संजय के भारद्वाज मानते हैं, “अफ़ग़ान सरकार और तालिबान में विचारधारा के स्तर पर ही एक बड़ा विरोधाभास है. तालिबान इस्लामिक शासन चाहता है और शरीया क़ानून को मानता है. लेकिन, अफ़ग़ान सरकार उदारवादी इस्लामिक गणतंत्र चाहता है. अल्पसंख्यकों और महिलाओं के अधिकारों की बात करती है.

“लगता नहीं है कि दोनों के बीच कोई समझौता हो सकता है. अफ़ग़ानिस्तान के अंदर ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देश बंटे हुए हैं. अमेरिका और भारत समझौते में मौजूदा सरकार को ऊपर रखना चाहते हैं जबकि चीन और पाकिस्तान तालिबान के करीब हैं.”

हालांकि, अशोक सज्जनहार कहते हैं कि ये सभी वार्ताएं एक-दूसरे को मज़बूत करेंगी और आगे का रास्ता बनाएंगी.

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