चीन ने तनाव के बीच कहा- ब्रिक्स की मेज़बानी में हम भारत के साथ

चीन ने कहा कि ब्रिक्स सम्मेलन के आयोजन में वो भारत का साथ देगा.

चीन का ये बयान दोनों देशों के बीच सीमा पर 10वें दौर की बातचीत के बाद आया है. सीमा पर दोनों ही देश तनाव को कम करने को लेकर सहमति बना चुके हैं और पैंगोंग झील इलाके में दोनों सेनाओं के पीछ हटने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है. हालाँकि अब भी ऐसे कई इलाक़े हैं जहाँ दोनों देशों के बीच सहमति नहीं बन पाई है.

इस साल ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के पास है और इस साल का समिट भारत में ही होना है.

क्या सीमा विवाद और हिंसक संघर्ष का असर ब्रिक्स समिट पर भी पड़ेगा? इस सवाल के जवाब में चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेनबिन ने कहा, "चीन ब्रिक्स को बहुत महत्व देता है. हम रणनीतिक साझेदारी और ब्रिक्स की एकजुटता और सहयोग में सकारात्मक गति को मज़बूत करने के लिए प्रतिबद्ध है. हम इस वर्ष की ब्रिक्स बैठकों की मेज़बानी में भारत का समर्थन करते हैं और विभिन्न क्षेत्रों में संचार और सहयोग को मज़बूत करने के लिए और अन्य सदस्यों के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार खड़े हैं."

हालांकि अभी ये तय नहीं है कि इस दौरान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच कोई द्विपक्षीय वार्ता होगी या नही. भारत ने अभी ब्रिक्स की तारीख़ों का ऐलान नहीं किया है.

ये सम्मेलन वर्चुअल होगा या नेताओं की भारत में एक-दूसरे से आमने-सामने मुलाक़ात होगी, ये भी अभी तय नहीं है.

पहले भी ब्रिक्स में मिले हैं मोदी-जिनपिंग

पिछले साल सीमा विवाद के शुरू होने के बाद नवंबर में ब्रिक्स सम्मेलन वर्चुअली हुआ था और दोनों देशों के बीच कोई द्विपक्षीय वार्ता नहीं हुई थी.

चीनी प्रवक्ता ने कहा कि वो "आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों के तीनों स्तंभ के साथ इस सहयोग को और "ब्रिक्स प्लस" के सहयोग को बढ़ाते रहेंगे ताकि अतंर्राष्ट्रीय समुदाय को एक ठोस संदेश जाए कि हम कोविड-19 को हराने के अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के प्रयासों में योगदान करने, आर्थिक विकास को फिर से शुरू करने और वैश्विक शासन में सुधार करने के लिए सहयोग करेंगे."

साल 2014 की जुलाई में 'ब्रिक्स सम्मलेन' के दौरान दोनों नेताओं के बीच हुई बातचीत के फ़ौरन बाद यानी सितंबर महीने में ही चीनी फ़ौजों ने 'एलएसी' के चुमार सेक्टर में घुसपैठ की थी.

2014 सितंबर में ही शी जिनपिंग भारत के दौरे पर आए. ये पहला मौक़ा था जब भारत के किसी प्रधानमंत्री ने दिल्ली के अलावा किसी भी राष्ट्राध्यक्ष का स्वागत किसी दूसरे राज्य में किया हो.

फिर वर्ष 2016 में चीनी प्रधानमंत्री गोवा में हुए 'ब्रिक्स' देशों के सम्मेलन में शिरकत करने भारत आए. इस सम्मेलन के दौरान भी दोनों नेताओं के बीच व्यापार और रक्षा के मुद्दों पर बातचीत हुई.

साल 2017 में डोकलाम में दोनों देशों के बीच 70 दिनों से अधिक समय तक चले तनाव के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने चीन द्वारा आयोजिन ब्रिक्स समिट में हिस्सा लिया था.

दोनों के बीच दो अनौपचारिक बैठकें भी हुई थीं. कई जानकारों का मानना था कि दोनों देशों के बीच गतिरोध ख़त्म होने के पीछे सम्मेलन की टाइमिंग भी एक मुख्य वजह थी.

डोकलाम से बड़ा है एलएसी पर संकट

हालांकि पिछले साल एलएसी पर पैदा हुआ संकट बड़ा था. 1975 के बाद पहली बार सीमा पर जवानों की मौत हुई. इसके अलावा डोकलाम की तरह यह संकट एक जगह तक सीमित नहीं है. एलएसी पर कई जगहों पर हज़ारों सैनिक तैनात हैं.

पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास वर्तमान में सेना पीछे हट चुकी है लेकिन दूसरे इलाक़ों से सैनिक अभी पीछे नहीं हटे हैं.

10वें दौर की बातचीत के बाद भारत और चीन के रक्षा मंत्रालयों ने एक साझा बयान जारी कर कहा, "दोनों देशों ने पैंगोंग झील इलाक़े में तैनात सैनिकों के पीछे हटने की प्रक्रिया का स्वागत किया है और इससे एलएसी के वेस्टर्न सेक्टर के मुद्दों को सुलझाने में मदद मिलेगी. दोनों ही पक्षों ने अपने नेताओं के बीच बनी सहमति के अनुसार काम करने और बातचीत को जारी रखने पर सहमति जताई.

साझा बयान में कहा गया कि दोनों देश "बॉर्डर पर शांति और स्थिरता के लिए साथ मिलकर काम करेंगे."

क्या हैं इस बयान के मायने

चीनी विदेश मंत्रालय द्वारा चलाए जाने वाले चेंगदू इंस्टिट्यूट ऑफ़ वर्ल्ड अफेयर्स के प्रमुख लॉन्ग शिंगचुम ने साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट से बात करते हुए कहा कि ये मौक़ा दोनों देशों के लिए ये साबित करने का है उनके रिश्ते सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.

उन्होंने कहा, "अगर भारत कोविड-19 पर काबू पाने में कामयाब होता है, तो ये एक अच्छा मौक़ा होगा कि देश में ये सम्मेलन आयोजित किया जाए. इससे संबंध बेहतर करने में मदद होगी."

उन्होंने कहा कि अभी के हालात देख कर लग रहे हैं कि अगले कुछ महीनों में सीमा विवाद ख़त्म हो जाएगा. उनके मुताबिक़, "अगर ऐसा नहीं हुआ तो बातचीत के लिए सही माहौल तैयार नहीं हो पाएगा. एक सही माहौल चीनी डिप्लोमैसी के लिए अहम है."

उन्होंने कहा कि ब्रिक्स को चीन की नज़र में ब्रिक्स पुराने औद्योगिक देशों और पारंपरिक विश्व व्यवस्था के प्रभाव को संतुलित करने में विकासशील देशों की सौदेबाजी की शक्ति को बढ़ाने का एक सामूहिक प्रयास है.

उनके मुताबिक़, वर्तमान के मतभेदों के बावजूद, ब्रिक्स के प्रति चीन का नज़रिया नहीं बदला है."

क्या है ब्रिक्स?

अंग्रेज़ी अक्षरों बी.आर.आई.सी.एस. से बना शब्द 'ब्रिक्स' दुनिया की पाँच उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह है.

भारत के अलावा ब्रिक्स के दूसरे सदस्य स्देश चीन, रूस, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका हैं.

ब्रिक्स की स्थापना इसके सदस्य देशों की उभरती अर्थव्यवस्था को देखते हुए की गई थी.

ब्रिक्स देशों में दुनिया की 44 फ़ीसदी आबादी रहती है. इन देशों के पास दुनिया की जीडीपी का 30 फ़ीसदी और दुनिया भर के व्यापार का 18 फ़ीसदी हिस्सा है.

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