जो बाइडन के राष्ट्रपति बनने के बाद सऊदी अरब के सामने क्या होंगी चुनौतियाँ

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- Author, फ्रैंक गार्डनर
- पदनाम, बीबीसी रक्षा संवाददाता
सऊदी अरब के दिन आजकल कुछ अच्छे नहीं और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के लिए ख़ासकर फिलहाल बुरा वक्त है.
अपने देश में तो उनकी लोकप्रियता कम नहीं हुई लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह अब भी 2018 में हुई पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या को लेकर शक़ के घेरे में हैं.
अब अमेरिका में भी नई सरकार बनने जा रही है और नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन ने भी कहा है कि सऊदी अरब को लेकर वो पहले के राष्ट्रपति से ज़्यादा सख़्त स्टैंड लेंगे.
तो जानते हैं कि ऐसे कौन से मुद्दे हैं जो अमेरिका और सऊदी अरब दोनों के लिए मायने रखते हैं?
यमन का युद्ध
इस युद्ध से जुड़े सभी पक्षों के लिए ये एक मुसीबत साबित हुआ है. लेकिन यमन की कुपोषित जनता के लिए सबसे ज़्यादा तकलीफदेह रहा
सऊदी अरब ने ये युद्ध नहीं शुरू किया था बल्कि हूती विद्रोहियों ने 2014 में सरकार गिराने के लिए राजधानी सना की ओर मार्च कर इसकी शुरुआत की.
मार्च 2015 में मोहम्मद बिन सलमान (जिन्हें एमबीएस भी कहा जाता है) ने सऊदी अरब के रक्षा मंत्री होने के नाते ख़ुफ़िया तरीक़े से अरब देशों का गठजोड़ बनाया और एयर फोर्स के साथ युद्ध में शामिल हो गए. उनका मानना था कि हूती विद्रोही कुछ महीनों में ही आत्मसमर्पण कर देंगे.
लेकिन छह साल बाद, हज़ारों लोगों के मरने और विस्थापित होने के बाद और दोनों तरफ से कई युद्ध अपराधों के बाद भी सऊदी अरब के नेतृत्व वाला गठबंधन हूती विद्रोहियों को सना से नहीं निकाल पाया.

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ईरान की मदद से हूती विद्रोही भी मिसाइलें और विस्फोटक ड्रोन सऊदी अरब भेजते रहे, जो उसके तेल खज़ानों को नुकसान पहुंचाते रहे.
एक के बाद एक सभी शांति योजनाएं नाकाम होती रही और ये एक महंगे गतिरोध के रूप में सबके सामने है. इस युद्ध के कारण एक तरफ यमन के लोगों की जान जा रही है तो दूसरी तरफ सऊदी अरब का पैसा भी बर्बाद हो रहा है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे इसके लिए आलोचना भी झेलनी पड़ रही है.
सऊदी अरब अब इससे बचने के लिए किसी सम्मानजनक रास्ते की तलाश में है. लेकिन सऊदी अरब के शब्दों में ही कहा जाए तो वो अपनी दक्षिणी सीमा पर ईरान को पैर जमाने से रोकना चाहता है और ईरान समर्थित किसी हथियारबंद सेना की यमन में सत्ता स्वीकार नहीं कर सकता.
हालांकि, उसके हाथ से वक़्त निकला जा रहा है.
साल 2016 आते-आते, अपने कार्यकाल के अंत में राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सऊदी अरब का सहयोग कम कर दिया था. लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता में आकर इस नीति को बदल दिया और सऊदी को इंटेलिजेंस से लेकर हथियारों की मदद शुरू कर दी. अब बाइडन ने इशारा किया है कि ये सब आगे नहीं चलेगा.
अब सऊदी अरब पर किसी भी तरीक़े से इस युद्ध को ख़त्म करने का दबाव है.

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कैदी महिलाएं
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सऊदी अरब के लिए महिला अधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी ने बदनामी लाने का काम किया है.
शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने वाली 13 महिला कार्यकर्ताओं को सऊदी अरब प्रसासन ने कैद कर लिया. कुछ महिला कैदियों को शोषण भी झेलना पड़ा और सिर्फ़ इसलिए कि वे ड्राइविंग के अधिकार और पुरुष सरंक्षक वाले नियम को ख़त्म करने की मांग कर रही थी.

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महिलाओं को ड्राइविंग का अधिकार देने से कुछ दिन पहले ही एक जानी-मानी महिला कार्यकर्ता लुजैन अल हथलोल को क़ैद कर लिया गया.
सऊदी के अधिकारी कहते हैं कि वह विदेशी ताकतों से फंडिंग ले रही थी और देशद्रोह के आरोप में कैद की गई हैं लेकिन सरकार अब तक कोई सबूत पेश नहीं कर पाई है.
उनके दोस्तों का कहना है कि लुजैन ने विदेश में एक मानवाधिकार कांफ्रेंस अटेंड करने और संयुक्त राष्ट्र में नौकरी के लिए आवेदन करने के अलावा कुछ नहीं किया है.
उनके परिवार का आरोप है कि उन्हें हिरासत में मारा गया, बिजली के झटके दिए गए और बलात्कार की धमकी भी दी गई. परिवार का कहना है कि जब उनसे आख़िरी बार मिले तो वह बुरी तरह कांप रही थी.
यमन युद्ध की तरह ही ये भी वो गड्ढा है जो सऊदी अरब ने अपने लिए खोदा है और अब चेहरा बचाने के लिए रास्ते खोजे जा रहे हैं.
किसी महिला को इतने वक्त तक बिना किसी सबूत के कैद रखना और वो भी स्वतंत्र न्यायपालिका वाले देश में, वहां इससे बचने का एक ही रास्ता दिख रहा है कि सरकार उन्हें माफ़ी दे दे. आने वाली बाइडन सरकार इस मुद्दे को भी उठा सकती है.

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क़तर का बहिष्कार
बाहरी तौर पर तो इस मुद्दे को परदे के पीछे से क़ुवैत हल करने की कोशिश कर रहा है लेकिन समस्या असल में बहुत गहरी है.
2017 में ट्रंप के सऊदी दौरे के कुछ दिन बाद, सऊदी अरब ने यूएई, बहरीन और मिस्र के साथ मिलकर क़तर के बहिष्कार का फ़ैसला किया. वजह उन्होंने बताई कि क़तर आतंकवादी इस्लामिक समूहों को समर्थन देता है.
यूएई ने एक दस्तावेज़ पेश किया जिसमें बताया गया कि कथित आतंकवादी क़तर में रह रहे थे लेकिन क़तर ने आतंकवाद को समर्थन देने के आरोप को खारिज किया और इन देशों की मांग मानने से भी इनकार कर दिया. इसमें क़तर के सरकारी न्यूज़ चैनल अल-जज़ीरा को नियंत्रित करने की मांग भी शामिल थी.
सऊदी को लग रहा था कि क़तर भी घुटनों के बल आ जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ और इसकी एक वजह क़तर की अपनी अताह संपत्ति भी है. क़तर के पास बड़े गैस फील्ड हैं और अकेले क़तर ने यूके की अर्थव्यवस्था में 53 अरब डॉलर निवेश कर रखा है. क़तर को तुर्की और ईरान का भी समर्थन है.
इसका एक मतलब ये भी है कि हाल के सालों में मध्य-पूर्व में एक गहरी दरार आ चुकी है.
एक तरफ़ तीन रूढ़िवादी सुन्नी खाड़ी अरब देश हैं- सऊदी अरब, यूएई और बहरीन, जिनके साथ है मिस्र.
दूसरी तरफ हैं- क़तर, तुर्की और विभिन्न इस्लामिक आंदोलन, मुस्लिम ब्रदरहुड और गाज़ा में हमास जिनका दोनों देश समर्थन देते हैं.

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इन आंदोलनों के सऊदी अरब, यूएई, बहरीन और मिस्र के नेता अपनी सत्ता के वजूद के लिए ख़तरा मानते हैं.
इसमें कोई दो राय नहीं कि साढ़े तीन साल के क़तर के बहिष्कार से दोनों पक्षों को आर्थिक और राजनीतिक नुक़सान हुआ है.
ईरान के परमाणु और मिसाइल योजनाओं को लेकर पहले से ही चिंतित खाड़ी के देशों की एकता का मज़ाक भी बना.
राष्ट्रपति ट्रंप के दूत जैरेड कुशनर ने इस विवाद को ख़त्म करने के इरादे से खाड़ी देशों का दौरा किया. बाइडन भी इस विवाद का अंत चाहते ही होंगे. क़तर में अमेरिका का सबसे बड़ा ओवरसीज़ बेस है.
लेकिन मध्यस्थता में जिस बात पर भी सहमति बने, उसका असल में लागू किया जाना ज़रूरी है.
क़तर को अपने पड़ोसियों को माफ़ करने में कई साल लगेंगे, तो पड़ोसियों को क़तर पर दोबारा भरोसा करने में भी अभी कई साल लगेंगे.
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