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आयातुल्लाह अली ख़ामेनेई के बाद ईरान का सुप्रीम लीडर कौन होगा?
ईरान के सर्वोच्च नेता आयातुल्लाह अली ख़ामेनेई के स्वास्थ्य को लेकर उड़ रही अफ़वाहों से एक सवाल तो खड़ा हो गया है कि अगर वे बेहद बीमार पड़ गए या उनकी मौत हो गयी तो क्या होगा.
81 साल के ख़ामेनेई मध्य-पूर्व के सबसे शक्तिशाली देश ईरान के सर्वोच्च नेता हैं और उनके बाद ईरान का नेतृत्व कौन करेगा ये क्षेत्र के साथ-साथ बाक़ी दुनिया के लिए भी महत्वपूर्ण सवाल है.
सर्वोच्च नेता को चुना कैसे जाता है
इस पद के लिए 88 इस्लामिक जानकारों का एक समूह, एक नाम पर मुहर लगाता है. इस समूह को असेंबली ऑफ़ एक्स्पर्ट्स कहा जाता है. आयातुल्लाह ख़ामेनेई अब तक दूसरे ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें इस पद के लिए चुना गया है.
इस असेंबली के सदस्यों को हर आठ साल में ईरानी जनता चुनती है. लेकिन पहले उम्मीदवारों के नाम पर गार्जियन काउन्सिल नाम की समिति रज़ामंदी देती है.
गार्जियन काउन्सिल के सदस्यों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सर्वोच्च नेता ही चुनता है. इसका मतलब सर्वोच्च नेता का असेंबली और गार्जियन काउन्सिल दोनों पर प्रभाव होता है.
पिछले तीन दशकों में ख़ामेनेई ने असेंबली के लिए रूढ़िवादियों को चुना है ताकि वे उनके कहे अनुसार उनके उत्तराधिकारी को चुन सकें.
एक बार चुन लिए जाने के बाद सर्वोच्च नेता ताउम्र इस पद पर रह सकता है.
ईरान के संविधान के मुताबिक़, सर्वोच्च नेता को आयातुल्लाह होना ज़रूरी है यानी एक वरिष्ठ शिया धार्मिक नेता. लेकिन जब ख़ामेनेई को चुना गया था, तब वे आयातुल्लाह नहीं थे. इसलिए उन्हें सर्वोच्च नेता बनाने के लिए क़ानूनों में बदलाव किया गया.
इसलिए, ये सम्भव है कि क़ानून दोबारा बदले जाएँ लेकिन ये निर्भर करेगा कि नए नेता चुने जाने के वक़्त राजनीतिक माहौल क्या होगा.
ये क्यों महत्वपूर्ण है?
ईरान में सबसे ताक़तवर होते हैं सर्वोच्च नेता. किसी भी ज़रूरी मुद्दे पर उनका फ़ैसला आख़िरी माना जाता है और वही दुनिया के लिए ईरान की नीतियों और तरीक़ों का फ़ैसला करते हैं.
ईरान दुनिया का सबसे ताक़तवर शिया देश है और ख़ामेनेई के नेतृत्व में मध्य-पूर्व के अंदर ईरान का प्रभाव बढ़ा है.
उनकी मृत्यु ना सिर्फ़ क्षेत्र का भविष्य बदल सकती है बल्कि दुनिया पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है.
ईरान की अमेरिका और इसराइल के साथ दुश्मनी के बढ़ने के पीछे काफ़ी हद तक इन दोनों देशों को लेकर ख़ामेनेई की निजी नापसंदगी है. इसकी वजह से कई सालों तक तनाव और अस्थिरता का माहौल भी रहा.
हालाँकि, जो उत्तराधिकार मिलने की प्रक्रिया है, उससे तो यही लगता है कि उनके बाद आने वाले सर्वोच्च नेता उन्हीं के रास्ते पर चलेंगे.
कौन हो सकता है अगला सर्वोच्च नेता?
ईरान के राजनीतिज्ञों की दिलचस्पी नए उत्तराधिकारी को चुनने में है लेकिन ऐसा कोई ताक़तवर शख़्स फ़िलहाल नहीं है जो किंगमेकर की भूमिका निभा सके.
अपने पूर्व सर्वोच्च नेता की तरह ही ख़ामेनेई का भी अपने वफ़ादारों के नेटवर्क पर प्रभाव है. इस नेटवर्क में कई लोग ईरान की सबसे शक्तिशाली सेना रेवोल्यूशनरी गार्ड से हैं. संभव है कि रेवोल्यूशनरी गार्ड सेना किसी अनचाहे उम्मीदवार को सर्वोच्च नेता बनने से रोकने की कोशिश करेगी.
हालाँकि एक टॉप सीक्रेट लिस्ट की अफ़वाह उड़ रही है लेकिन इसमें किसका नाम है, ये अब तक किसी को नहीं पता और ना किसी ने पता होने का दावा किया है.
जो सुनी-सुनाई बातों से पता चला है, उसके मुताबिक़ ख़ामेनेई की पसंद उनके बेटे मुजतबा या न्यायपालिका प्रमुख इब्राहिम रैसी हो सकते हैं. अगर ये सच है तो इन दोनों उम्मीदवारों के नाम में दम है.
रैसी से पूर्व न्यायपालिका प्रमुख सादिक़ लारीजानी और मौजूदा राष्ट्रपति हसन रूहानी भी सर्वोच्च नेता की रेस में हो सकते हैं.
मुजतबा ख़ामेनेई कौन हैं?
सर्वोच्च नेता के 51 वर्षीय बेटे मुजतबा धार्मिक शहर मशहद में पैदा हुए और अपने पिता की तरह ही इस्लामिक मामलों के जानकार हैं.
मुजतबा तब स्पॉटलाइट में आए जब 2009 के विवादित राष्ट्रपति चुनाव के बाद ईरान में हो रहे विरोध प्रदर्शनों को हिंसक तरीक़े से रोका गया. ऐसा माना जाता है कि इसके पीछे वही थे.
हालाँकि ख़ामेनेई कोई राजा नहीं हैं और अपना ताज यूँही बेटे को नहीं सौंप सकते लेकिन मुजतबा का अपने पिता के नेटवर्क में काफ़ी प्रभाव है. उनके पास सर्वोच्च नेता का दफ़्तर भी है जो किसी संवैधानिक संस्था से ऊपर है.
अगर उन्हें रेवोल्यूशनरी गार्ड्स का समर्थन मिल जाता है तो वो क़ानूनी प्रक्रिया को भी अपने पक्ष में मोड़ सकते हैं.
इब्राहिम रैसी कौन हैं?
60 साल के इब्राहिम भी मशहद में पैदा हुए. उनके नाम पर सम्भावनाएँ ज़्यादा दिख रही हैं.
उन्होंने कभी उनके सर्वोच्च नेता बनने की अफ़वाहों का खंडन नहीं किया और उनके कुछ क़दमों से भी ये इशारा मिलता है कि उन्हें इस भूमिका के लिए ही तैयार किया गया है.
उन्होंने न्यायपालिका में कई पद सम्भाले हैं. फ़िलहाल वह असेंबली ऑफ़ एक्स्पर्ट्स के डिप्टी चेयरमेन हैं.
रैसी का मानवाधिकार को लेकर ट्रैक रिकॉर्ड अच्छा नहीं है, ख़ासकर 1988 में राजनीतिक क़ैदियों को मौत की सज़ा देने को लेकर. वे लोकप्रिय नहीं हैं. लेकिन 2017 के चुनाव हारने के बावजूद सर्वोच्च नेता ने उन्हें न्यायपालिका का प्रमुख बना दिया
इस भूमिका में आने के बाद वे मीडिया में भी काफ़ी देखे जाने लगे और उन्होंने भ्रष्टाचार को लेकर भी तथाकथित जंग छेड़ी.
ख़ामेनेई की तरह रैसी भी 2015 के परमाणु समझौते को शक की निगाह से देखते हैं. वे भी रेवोल्यूशनरी गार्ड्स के मज़बूत पक्षधर हैं.
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