कोरोना वायरस से औरतों पर बड़ा संकट, 25 साल तक पीछे जा सकती हैं

    • Author, सैंड्रिन लंगमबु और एमीली बटर्ली
    • पदनाम, बीबीसी 100 वुमन

यूएन वुमन के नए वैश्विक डेटा के मुताबिक़ कोरोना वायरस महामारी के कारण हम लैंगिक समानता में हुई बढ़ोतरी के मामले में 25 साल पुराने स्तर तक पिछड़ सकते हैं.

महामारी के प्रभाव के कारण महिलाएं पहले के मुक़ाबले घरेलू काम और परिवार की देखभाल ज़्यादा कर रही हैं.

यूएन वुमन में डिप्टी एक्ज़िक्यूटिव अनीता भाटिया कहती हैं, ''हमने पिछले 25 वर्षों में जो भी काम किया है, वो एक साल में खो सकता है.''

रोज़गार और शिक्षा के मौक़े ख़त्म सकते हैं. महिलाएं ख़राब मानसिक और शारीरिक स्वास्थ की शिकार हो सकती हैं.

अनीता भाटिया के मुताबिक़ इस समय महिलाओं पर देखभाल का जो भार बढ़ गया है, उससे 1950 के समय की लैंगिक रूढ़ियों के फिर से क़ायम होने का ख़तरा पैदा हो गया है.

महामारी से पहले भी, यह अनुमान लगाया गया था कि 16 अरब घंटे के अवैतनिक कामों में से लगभग तीन चौथाई काम महिलाएं ही कर रही थीं. ये पूरी दुनिया में हर दिन होता था.

दूसरे शब्दों में, करोना वायरस से पहले एक घंटे का अवैतनिक काम पुरुष और तीन घंटे का महिलाएं कर रही थीं. अब ये आंकड़े और बढ़ गए हैं.

अनीता भाटिया कहती हैं, ''अगर महामारी से पहले महिलाओं का अवैतनिक काम पुरुषों से तीन तीन गुना था तो मुझे यक़ीन है कि महिलाओं के अवैतनिक काम के घंटे अब दोगुने हो गए होंगे.''

हालाँकि, यूएन वुमन के 38 सर्वेक्षणों में मुख्य रूप से निम्न और मध्यम आय वाले देशों पर ध्यान केंद्रित किया गया है लेकिन अधिक औद्योगिक देशों के आंकड़े भी यही तस्वीर दिखाते हैं.

अनीता भाटिया कहती हैं, ''सबसे ज़्यादा चिंता की बात तो ये है कि अधिकतर महिलाएं अब काम पर वापस ही नहीं लौट रही हैं. सितंबर के ही महीने में अमेरिका में दो लाख पुरुषों के मुक़ाबले आठ लाख 65 हज़ार महिलाओं ने नौकरी छोड़ दी. इससे समझा जा सकता है कि उनके ऊपर देखभाल की ज़्यादा ज़िम्मेदारी थी और उसके लिए कोई नहीं था.''

यूनएन वुमन चेतावनी देता है कि कामकाजी महिलाएं कम होने से न सिर्फ़ उनकी सेहत पर बल्कि आर्थिक प्रगति और स्वतंत्रता पर भी असर पड़ेगा.

बीबीसी 100 वुमन की टीम ने तीन महिलाओं से बात की और यह जानने की कोशिश की कि कोरोना वायरस महामारी ने उनके काम पर कैसे असर डाला है.

तीनों महिलाओं को एक डायरी रखने के लिए कहा गय, जिसमें वो नोट करें कि उन्होंने एक दिन में घंटों का इस्तेमाल किस तरह किया. इस तरह उनके 24 घटों के काम का आकलन करने की कोशिश की गई.

'मैं रोज़ बहुत थक जाती हूं'

महामारी से पहले भी, जापान में महिलाएं अवैतनिक देखभाल के कामों में पुरुषों की तुलना में औसतन लगभग पाँच गुना अधिक समय ख़र्च करती थीं.

टेनी वाडा टोक्यो में एक ब्रैंड कंसल्टेंट हैं और लॉकडाउन शुरू होने से पहले एक नर्सरी टीचर के तौर पर पार्ट-टाइम काम करती थीं.

उन्होंने अपनी डायरी में लिखा, ''सुबह के पाँच बज चुके हैं और मैं किसी भी तरह इस लेख को पूरा करना चाहती हूं. इसकी समयसीमा नज़दीक नहीं है लेकिन मैं इसे समय से पहले करना चाहती हूं. 'मां की ज़िंदगी' का अनुमान नहीं लगाया जा सकता और मैं नहीं चाहती कि इसके कारण मुझे मेरा पे चैक (वेतन) खोना पड़े.''

टेनी कहती हैं कि उनके लिए समय एक 'लग्ज़री' की तरह है जो उन्हें बच्चों को पढ़ाने, खाना बनाने और घर के दूसरे कामों के बीच बिल्कुल भी नहीं मिल पाता है.

लॉकडाउन के दौरान टेनी और उनके पति दोनों घर से काम कर रहे हैं लेकिन उनका दिन बहुत अलग-अलग तरीक़े से बीतता है.

टेनी बताती हैं, ''वह सुबह 9:30 बजे से शाम के क़रीब पाँच या 6:30 बजे तक काम करते हैं. मुझे लगता है कि उनके पास कमरे के अंदर रहकर काम पर ध्यान देने की सुविधा है लेकिन मेरे पास ये सुविधा नहीं हैं. मुझे ये थोड़ा ग़लत लगता है.''

टेनी कहती हैं कि वो घर पर 80 प्रतिशत अवैतिनक काम करती हैं जिसमें उनकी तीन साल की बेटी को घर में पढ़ाना भी शामिल है.

वो याद करती हैं, ''पहले दो-तीन महीने बहुत डरावने थे, मैं हर दिन मानसिक तौर पर बहुत थक जाती थी. मेरी बेटी रो रही होती थी और फिर मैं रोती थी.''

यूएन वुमन के चीफ़ स्टैटस्टिशियन पापा सैक कहते हैं, ''हम इसके चिंताजनक प्रभाव देख रहे हैं. इसमें बढ़ते तनाव और मानसिक सेहत को लेकर आ रही चुनौतियाँ शामिल हैं, ख़ासतौर पर महिलाओं के लिए. इसकी एक वजह उन पर बढ़ता काम का बोझ भी है.''

'मुझे सबकुछ अकेले करना होता था'

डलिना वेलासकेथ एक किसान हैं और बोलिविया के दक्षिणी शहर टरिजा में सेरकादो प्रांत में रहती हैं.

अमूमन उनका दिन सुबह पाँच बजे शुरू होता है और वो अपना अधिकतर समय ग्रीनहाउस और घर के कामों में बिताती हैं. लेकिन, हर दो महीने में वो अपनी उगाई सब्ज़ियों को बेचने के लिए शहर के बाज़ार जाती हैं.

वो कहती हैं, ''खेतों में काम करने वाले दिन बहुत थकान भरे होते हैं. कम से कम मेरे लिए तो ऐसा ही होता है. क्योंकि मुझे घर पर भी बहुत से काम करने होते हैं. लेकिन, अब मेरी बेटी मेरी मदद करती है, वो मेरा दाहिना हाथ है. वो घर में, खेत में और ग्रीनहाउस में मेरी मदद करती है.''

पारंपरिक तौर पर ये माना जाता है कि पुरुष कमाने वाले होते हैं जबकि महिलाएँ घर संभालती हैं. इसीलिए लड़कियों से घर का काम सीखने की उम्मीद की जाती है.

पापा सैक कहते हैं, ''जब बच्चों से मदद लेने की बात आती है (अवैतनिक काम में), तो माता-पिता बेटे की बजाय बेटी की मदद लेना पसंद करते हैं.''

लेकिन डलिना ख़ुश हैं कि उन्हें लॉकडाउन के दौरान अपने परिवार के साथ ज़्यादा समय बिताने का मौक़ा मिला.

वो कहती हैं, ''इससे पहले मुझे नर्सरी, बीज ख़रीदने, उन्हें रखने, उगाने, पानी देने, खाना पकाने और सफ़ाई जैसे काम अकेले ही करने पड़ते थे. लेकिन, अब स्कूल बंद हो गए हैं. मेरी बेटी साफ़-सफ़ाई, खाना पकाने और कपड़े धोने में मेरा हाथ बँटाती है. मेरा छोटा बेटा नर्सरी में मेरी मदद करता है, मेरे पति हमारे साथ ज़्यादा समय बिताते हैं और कामों में हमारी मदद करते हैं. इससे मुझे आराम मिला है.''

'एक महीने में हुई बुरी हालत'

डॉक्टर इजोमा कोला एक नाइजीरियाई-अमेरिकी हैं और केन्या की राजधानी नैरोबी में रहती हैं.

वो कहती हैं कि वो माँ बनने की और अपनी नौकरी की ज़िम्मेदारियाँ इसलिए संभाल पा रही हैं क्योंकि उनके पति बहुत मददगार हैं और वो अपने घर पर किसी को मदद के लिए रख सकते हैं.

वो कहती हैं, ''सभी महिलाओं के पास ये सुविधा नहीं होती और न ही आर्थिक स्थिति ऐसी होती है कि वो किसी को मदद के लिए रख सकें. लेकिन मैं फिर भी हमारे बेटे की देखभाल के लिए रोज़ छह या सात बजे उठती हूं.''

इजोमा कहती हैं कि समाज आर्थिक रूप से महिलाओं के पक्ष में नहीं बनाया गया है और महिलाओं को लेकर ऐसे नियम बनाए गए हैं कि औसत महिलाओं के लिए नौकरी, परिवार और बच्चा सबकुछ एकसाथ मिल पाना असंभव हो जाता है.

वो कहती हैं, ''महिलाओं को ये सब मिल सकता है लेकिन एकसाथ नहीं और बड़े त्याग किए बिना तो बिल्कुल नहीं. मुझे लगता है कि ये सब पाने वालीं बहुत कम महिलाएं होती हैं. मैं खु़द को बहुत क़िस्मत वाली मानती हूं कि मेरे पास सबकुछ न सही लेकिन ज़्यादातर चीज़ें हैं.''

किसी को मदद के लिए बुलाने से इजोमा और उनके परिवार के लिए लॉकडाउन का समय थोड़ा आसान हो गया.

वो बताती हैं, ''क़रीब महीने तक घर पर सिर्फ़ हम दोनों थे, कोई मदद के लिए नहीं था. तब मेरी हालत बहुत बुरी हो गई थी. मुझे लगा कि मेरे पास बहुत ज़्यादा काम है और घर के काम के कारण मैं अपनी नौकरी का काम नहीं कर पा रही थी.''

हालाँकि उनके पति, बच्चे को संभालने में उनकी पूरी तरह मदद करते हैं. वो बर्तन और कपड़े धोने के काम में भी हाथ बँटाते हैं. लेकिन, इजोमा कहती हैं कि उन्हें अक्सर लगता है कि घर को संभालने की ज़िम्मेदारी उनके ही ऊपर आ गई है.

वो कहती हैं, ''मेरे दिमाग़ में हमेशा काम चल रहा होता है. वो इन सब चीज़ों के बारे में नहीं सोचते जैसे घर के सामान की लिस्ट, बच्चे का पहला जन्मदिन और दोस्तों के साथ बातें करने के लिए ज़ूम पर समय तय करना.''

डॉक्टर से समय लेना, खाना बनाना और घर ठीक करना जैसे कामों के बीच उलझते रहने से महिलाओं पर मानसिक दबाव बढ़ जाता है. इससे उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है.

घर के काम के लिए न पैसे और न इज़्ज़त

महिलाओं के अवैतनिक काम से अक्सर देखभाल में होने वाला ख़र्च बच जाता है और परिवार के अन्य लोग घरेलू काम से भारमुक्त रहते हैं. लेकिन, उनकी इस मेहनत को कभी सम्मान के साथ स्वीकार नहीं किया जाता.

अनीता भाटिया कहती हैं, ''महत्वपूर्ण बात ये है कि महिलाओं के काम की कभी सराहना नहीं होती और इसे हमेशा इस तरह देखा जाता है जिसकी कोई अहमियत ही नहीं है क्योंकि उसके लिए आपको भुगतान नहीं करना पड़ता.''

''महामारी ने दिखाया है कि अवैतनिक काम असल में दुनिया के लिए एक सामाजिक सुरक्षा की तरह है. ये दूसरों के लिए बाहर जाकर कमाना संभव बनाता है जबकि इससे घरेलू महिलाओं के लिए ख़ुद के आगे बढ़ने और रोज़गार पाने के मौक़ो मे रुकावट आ जाती है.''

जो महिलाएं ज़्यादा अवैतनिक काम करती हैं उनके पास नौकरी करने के लिए समय नहीं बच पाता. नतीजन, वो आर्थिक रूप से असुरक्षित हो जाती हैं.

अनीता भाटिया कहती हैं, ''यह बता पाना भी मुश्किल है कि ये कितनी बड़ी समस्या है और अगर सरकारें और कॉर्पोरेट जगत इसमें कुछ नहीं करते तो इसका बड़ा प्रभाव पड़ने वाला है.''

संयुक्त राष्ट्र सरकारों और कॉर्पोरेट्स को ये स्वीकार करने के लिए कह रहा है कि अवैतनिक कार्य अहमियत रखता है और इसके लिए वो अतिरिक्त पारिवारिक छुट्टियाँ, अतिरिक्त भुगतान, छुट्टियां, और बच्चों की देखभाल के लिए केंद्रों (क्रेच) जैसे उपायों को लागू करें.

अनीता भाटिया कहती हैं, ''ये सिर्फ़ अधिकारों का सवाल नहीं है, इसके आर्थिक मायने भी हैं कि महिलाएँ भी अर्थव्यवस्था में पूरी तरह भाग लेती हैं.''

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