रोहिंग्या मुसलमानों के लिए नई मुसीबत बना बांग्लादेश का यह द्वीप

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, अकबर हुसैन
- पदनाम, बीबीसी बंगाली सेवा, कॉक्स बाज़ार, बांग्लादेश
हज़ारों की संख्या में रोहिंग्याओं ने म्यांमार छोड़ने के बाद जहाँ शरण ली वहाँ एक बार फिर उन पर ख़तरा मंडरा रहा है. बांग्लादेश के कॉक्स बाज़ार में एक बड़ा शरणार्थी कैंप है जहाँ से रोहिंग्याओं के भागने, हिंसा, ड्रग्स और मानव तस्करी के मामलों में इज़ाफ़ा देखा जा रहा है.
बांग्लादेश की सरकार ने सैकड़ों की संख्या में इन शरणार्थियों को उनकी मर्ज़ी के बिना यहाँ से दूर एक द्वीप 'भाषन चौर' भेजना शुरू कर दिया है.
एक अनिश्चित ज़िंदगी जी रहे हज़ारों रोहिंग्याओं का इस द्वीप पर भविष्य क्या होगा यह जानने के लिए बीबीसी इस द्वीप पर पहुंचा.
55 साल की राशिदा ख़ातून को अपने बच्चों के बारे में सुने हुए छह महीने हो गए हैं. ख़ातून और उनका परिवार कॉक्स बाज़ार में रहता है. फ़रवरी में कोरोना वायरस का संक्रमण पूरी तरह से फैलने से पहले उनके दो बच्चे बेहतर भविष्य की तलाश में एक जोखिम भरी यात्रा पर निकल पड़े थे. उनकी 17 साल की बेटी और 22 साल का बेटा मछली मारने वाली नाव में मलेशिया के लिए 10 दिनों की यात्रा पर निकल पड़े थे.
ख़ातून 2017 में फ़ौजी हमले के बाद म्यांमार छोड़कर आने का क़िस्सा सुनाती हैं कि कैसे उनके गांव मंगडाव पर हमला किया गया था और कैसे उनका घर जलाया गया था. तीन साल पहले म्यांमार में हुए फ़ौजी कार्रवाई में रोहिंग्या मुसलमानों के पूरे गांव तबाह कर दिए गए थे.

इमेज स्रोत, Getty Images
संयुक्त राष्ट्र के जांचकर्ताओं का कहना है कि इस दौरान क़रीब 10,000 लोग मारे गए थे और 7,30,000 से ज़्यादा वहाँ से इस नरसंहार के बाद बांग्लादेश के लिए भाग खड़े हुए थे.
संयुक्त राष्ट्र ने इसे 'नस्लीय सफ़ाई' बताया है. अपने देश नहीं लौटने की उम्मीद को देखते हुए और हताशा और निराशा में जीते हुए ख़ातून के बेटे और बेटी ने कैंप छोड़कर मुस्लिम बहुल देश मलेशिया का रुख़ करने का फ़ैसला लिया.
ख़ातून बताती हैं कि, "मलेशिया में मौजूद मेरे एक रिश्तेदार ने पिछले साल फ़ोन किया और बताया कि कई मलेशियाई मर्द रोहिंग्या औरतों से शादी करना चाहते हैं. उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि मेरी बेटी की शादी वहाँ हो जाएगी और मेरे बेटे को नौकरी भी मिल जाएगी."
नाव से यात्रा करके बांग्लादेश से मलेशिया जाना नौजवान रोहिंग्याओं के लिए एक आम रास्ता है लेकिन यह एक बोझिल और जोखिम भरी यात्रा है. जिस हफ़्ते ख़ातून के बच्चे मछली मारने वाली नाव में सवार होकर निकले थे उसी हफ़्ते दर्जनों शरणार्थियों को ले जा रही एक नाव को बांग्लादेश के तट पर ज़ब्त किया गया था. इस घटना में 14 बच्चे मारे गए थे.

दस दिनों तक समुद्र में रहने के बाद ख़ातून के बच्चों को मलेशिया का तट दिखाई पड़ा. सुरक्षा के मद्देनज़र हम यहाँ उनके नाम का उल्लेख नहीं कर रहे हैं. उनकी नाव को मलेशियाई नेवी ने देख लिया था और उन्होंने उसे तट पर उतरने की इजाज़त नहीं दी.
उनकी छोटी सी नाव एक महीने तक अंडमान के सागर में यूं ही भटकती रही. आख़िरकार बांग्लादेश के तट रक्षक दल ने स्थानीय मीडिया और मानव अधिकार समूहों के दबाव में आकर दख़ल दिया.
सैकड़ों दूसरे शरणार्थियों के साथ जिन्हें मलेशिया में प्रवेश की इजाज़त नहीं मिली थी ख़ातून के बच्चों को भी कॉक्स बाज़ार के कैम्प में नहीं आने दिया गया.
इसके बजाए उन्हें बंगाल की खाड़ी में स्थति भाषन चौर द्वीप ले जाया गया.

इमेज स्रोत, Getty Images
ख़ातून को एक अनजान नंबर से कॉल आया जिसके बारे में वो बताती हैं, "मेरी बेटी बहुत परेशान लग रही थी. वो रोते हुए बता रही थी उसे भाषन चौर द्वीप पर ले जाया जा रहा है."
यह आख़िरी बार था जब उनकी बात अपनी बेटी से हुई थी.
भाषन चौर द्वीप

इमेज स्रोत, Getty Images
बांग्लादेश के तट से 60 किलोमीटर की दूरी पर भाषन चौर द्वीप मौजूद है. बीस साल भी नहीं हुए इस द्वीप के अस्तित्व के बारे में पता चले हुए. यह समुद्र तल से छह फ़ीट से भी कम की ऊंचाई पर स्थित है. यह द्वीप पूरी तरह से गाद से बना हुआ है.
पिछले तीन सालों से यहाँ सरकार 350 मिलियन डॉलर की लागत से नया शहर बना रही है. उनका मक़सद 100,000 से ज़्यादा शरणार्थियों को यहाँ शिफ़्ट करने का है ताकि कैंप पर दबाव कम किया जा सके.
बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना बार-बार अपनी इस योजना का बचाव करती नज़र आई हैं. अंतरराष्ट्रीय समुदाय से वो अपील करती रही हैं कि वो हालात को समझें कि कॉक्स बाज़ार के शरणार्थी कैंप में लाखों शरणार्थी रहते हैं और वहाँ बढ़ने वाली हिंसा, ड्रग और मानव तस्करी ये दिखाते हैं कि कैंप सुरक्षित नहीं रह गया है.
उन्होंने पिछले साल संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में कहा कि "मौजूदा संकट क्षेत्रीय ख़तरा बनता जा रहा है. बढ़ती भीड़ और पर्यावरण में आई गिरावट के अलावा यह क्षेत्र में स्वास्थ्य और सुरक्षा के मोर्चे पर भी चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है."

लेकिन कई रोहिंग्याओं के लिए भाषन चौर किसी शरणार्थी शिविर से अधिक जेल की तरह है. यहाँ सभी को उनकी मर्ज़ी के बिना लाया गया है और उन्हें यहाँ से जाने की इजाज़त नहीं है.
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार परिषद की तरफ़ से इस बात का दबाव पड़ने के बाद कि आप शरणार्थियों को उनकी मर्ज़ी के बिना भाषन चौर ले जाना बंद करें, अब बांग्लादेशी सरकार इस अभियान में लग गई है कि वो शरणार्थियों को इसके लिए लुभा रही है. वो द्वीप को ज़्यादा खुला और कैंप की तुलना में आधुनिक सुविधाओं से पूर्ण बताने में लगी हुई है.
इसी कोशिश के तहत कुछ पत्रकारों का द्वीप पर एक मीडिया टूर आयोजित करवाया गया जिसमें बीबीसी की टीम भी शामिल थी. तीन घंटे के सफ़र के बाद जब पत्रकारों का दल यहाँ पहुँचा तो कॉमोडोर अब्दुल्लाह अल मामुम चौधरी उन्हें नवनिर्मित स्थल पर ले गए. यहाँ सैकड़ों लाल छत वाले घर बने हुए थे. वो सब अभी हज़ारों शरणार्थियों के इंतज़ार में खाली पड़े हुए थे. सभी घरों के ऊपर और कॉर्नर पर नज़र रखने के लिए सुरक्षा कैमरे भी लगे हुए थे.

नेवी के अधिकारियों की दिलचस्पी हमें दो स्कूल, एक मस्जिद और दो 40 बिस्तर वाले अस्पतालों को दिखाने में अधिक थी. इसके अलावा दो सामुदायिक क्लीनिक भी थे जो निर्माणाधीन थे.
अब्दुल्लाह अल मामुम चौधरी बताते हैं, "आधारभूत संरचना इको फ्रेंडली है. बहुत सारी खुली हुई जगह है. यहाँ बिजली की भी सुविधा होगी जो कि कॉक्स बाज़ार वाले कैंप में नहीं है. सबसे ज़रूरी चीज़ जो है वो है शिक्षा. हमने रोहिंग्या बच्चों के लिए स्कूल बनाए हैं जहाँ उन्हें बेहतर स्कूली शिक्षा मिलेगी."
इस साल की शुरुआत में एमनेस्टी इंटरनेशनल ने यहाँ रह रहे 306 रोहिंग्याओं की स्थिति पर एक रिपोर्ट रिलीज़ की थी. इस रिपोर्ट में तंग और अस्वस्थकारी वातावरण में रहने के आरोप लगाए गए थे. इसके अलावा पर्याप्त खाने और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी की भी बात कही गई है. रिपोर्ट में इस बात का भी ज़िक्र किया गया है कि शरणार्थियों को उनके घर वालों से बात नहीं करने दिया जाता है. नेवी और स्थानीय मज़दूरों द्वारा वसूली और यौन उत्पीड़न की भी बात रिपोर्ट में कही गई है.
हालांकि चौधरी इन आरोपों से इंकार करते हैं. वो कहते हैं, "हम उनका ख़याल अपने मेहमान की तरह रख रहे हैं. उन्हें पर्याप्त खाना और सुविधाएँ दी जा रही हैं."
जब उनसे उन 306 शरणार्थियों के बारे में पत्रकारों ने पूछा कि वो कहाँ रह रहे हैं. तब उन्होंने कहाँ कि कोई भी पत्रकारों से मिलने के लिए उस वक़्त उपलब्ध नहीं है.
वहाँ सैकड़ों भैंस और भेड़ें चर रही थीं. उन पर नज़र रखने वाले 50 साल के ताजुल हक़ पांच साल से ज़्यादा वक़्त से यहाँ द्वीप पर भैंसों की देखरेख कर रहे हैं.
वो बताते हैं, "मैं मालिक की तरफ़ से क़रीब 100 भैंसों की देखभाल के लिए रखा गया हूँ. द्वीप पर बहुत घास मौजूद है जो भैंसों के लिए उपयुक्त है. ज़मीन भी काफ़ी उपजाऊ है. यहाँ आप कुछ भी ऊगा सकते हैं."

बांग्लादेशी सरकार ने संयुक्त राष्ट्र से लंबे समय से यह वायदा किया हुआ है कि वो द्वीप की आधिकारिक यात्रा कर यहाँ की सुरक्षा और सुविधाओं का मूल्यांकन कर सकता है लेकिन अब तक बांग्लादेशी अधिकारियों ने संयुक्त राष्ट्र को रोक ही रखा है. इसलिए इस बात का जवाब अब भी अधूरा है कि क्या वाकई में भाषन चौर पर मौजूद सुविधाएँ 100,000 शरणार्थियों के लिए पर्याप्त हैं.
शरणार्थी मामलों पर संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त ने बीबीसी से कहा है कि 306 शरणार्थियों के द्वीप पर पहुंचने के बाद संयुक्त राष्ट्र का मौक़े का मुआयना करना और द्वीप पर लोग किन हालातों में रह रहे हैं इसका जायज़ा लेना और भी महत्वपूर्ण हो गया है. उनका कहना है कि उन्होंने सरकार को अपनी मांग भेज दी है लेकिन अभी तक जवाब नहीं मिला है.
रोहिंग्या लोगों का कहना है कि द्वीप के समुद्र तल से मात्र छह फ़ीट ऊपर होने के कारण यहां चक्रवात, ज्वार-भाटा और भारी बारिश का ख़तरा अधिक है.

इमेज स्रोत, Getty Images
पत्रकारों को पॉवरप्वाइंट प्रेज़ेंटेशन देते हुए कोमोडोर चौधरी ने कहा कि इस द्वीप के इर्द-गिर्द 14 किलोमीटर लंबी समुद्री दीवार बनाई जा रही है. उनका कहना था कि विशेषज्ञों की राय है कि यहां चक्रवात आने का ख़तरा बेहद कम है.
चौधरी ने कहा, "बीते 172 सालों में ये इलाक़ा कभी भी चक्रवात के केंद्र में नहीं रहा है. उन्होंने 120 चक्रवात शेल्टर भी दिखाए जो 260 किलोमीटर की रफ़्तार तक की हवाओं को झेल सकते हैं."
लेकिन चौधरी के दावों के उलट ऐसे सबूत हैं जो संकेत देते हैं कि साल 1991 और 1997 में चक्रवात ठीक उस इलाक़े से गुज़रे हैं जहां भाषन चौर द्वीप है. और इस बात के भी सुबूत हैं कि चक्रवात से बर्बादी सिर्फ़ उसके केंद्र में ही नहीं होती है बल्कि केंद्र से मीलों दूर भी होती है.
बांग्लादेश में हर साल औसतन एक चक्रवाती तूफ़ान आता है और बीबीसी के मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि भाषन चौर में भविष्य में चक्रवात के आने की संभावनाएं प्रबल हैं. यहां की स्थलाकृति और निचले इलाक़े को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि भारी बारिश और तटीय चक्रवात की वजह से यहां प्रलयकारी बाढ़ आ सकती है.
रोहिंग्या लोगों को भाषन चौर के अलग-थलग होने की वजह से भी डर है. कोमोडोर के साथ जहाज़ पर दौरे के बाद भी बांग्लादेश की मुख्य भूमि तक पहुंचने में तीन और घंटे का समय लगता है.
रोहिंग्या कैंप में रहने वाले नूर हुसैन ने भाषन चौर की तस्वीरें देखी हैं और यहां का दौरा करने वाले रोहिंग्या बुज़ुर्गों से बात भी की है. वो कहते हैं, "भाषन चौर में घर तो बहुत अच्छे हैं लेकिन ये किसी जेल की तरह लगते हैं."
वो कहते हैं, "कॉक्स बाज़ार में हम एक समुदाय की तरह रह रहे हैं. लेकिन द्वीप पर हमारी आज़ादी सीमित होगी. हमें नौसेना की निगरानी में रहना होगा."
लेकिन कैंप के बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्हें बांग्लादेश और म्यांमार की सीमा के पास में रहने से इस बात की शांति मिलती है कि वो अपने देश के क़रीब होंगे. द्वीप पर जाने के विकल्प ने उन्हें अपने देश वापस लौटने के सपने से और भी दूर कर दिया है.

सितंबर में जिन 40 रोहिंग्या लोगों ने द्वीप का दौरा किया था उनमें शामिल रहे एक बुज़ुर्ग कैंपों के म्यांमार और बांग्लादेश की सीमा के पास होने का महत्व बताते हुए कहते हैं, "बांग्लादेश की सरकार चाहती है कि हम कैंपों में द्वीप के समर्थन में खुलकर बोलें. लेकिन जब हम द्वीप पर जाने की बात करते हैं तो यहां रहने वाले आमलोग हमें देशद्रोही बताते हैं."
वो लोग द्वीप पर जाने के सख़्त ख़िलाफ़ हैं, भले ही वहां कितनी ही ख़ूबसूरत इमारतें क्यों ना हों. रोहिंग्या लोग कॉक्स बाज़ार में रहते हुए म्यांमार की अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं.
ख़ातून भी कैंप को छोड़कर द्वीप पर जाकर अपने बच्चों से मिलने के विचार को ख़तरनाक मानती हैं. क्योंकि उनके लिए कैंप एक अस्थायी ठिकाना ही है. तीन साल बाद भी वो म्यांमार लौटने के सपने देखती हैं.
"मैं चाहती हूं कि मेरा बेटा और बेटी वापस यहां आ जाएं. मैं वहां क्यों जाऊं. यहां से म्यांमार पास है. अगर हमें न्याय मिला तो हम शीघ्र ही म्यांमार जा सकेंगे. मैं भाषन चौर नहीं जाऊंगी."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















