क़तर में विदेशी कामगारों को सैलरी नहीं देने का विवाद गहराया

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क़तर ने मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच की उस रिपोर्ट को ख़ारिज किया है जिसमें दावा किया गया है कि क़तर में प्रवासी मज़दूरों का शोषण किया जा रहा है और उन्हें वेतन तक नहीं मिल रहा है.
अपनी प्रतिक्रिया में क़तर ने कहा है कि रिपोर्ट में तथ्यात्मक ग़लतियां हैं और ये क़तर के मौजूदा हालात को नहीं दर्शाती है. क़तर ने ये भी कहा है कि काम करने के लिए आने वाले अधिकतर प्रवासियों में से किसी ने शोषण की बात नहीं कही है.
क़तर ने माना है कि कुछ चुनिंदा मामलों में कर्मचारियों ने समस्याओं का सामना किया है जिसके बाद क़ानूनों में बदलाव किया गया है.
वहीं ह्यूमन राइट्स वॉच ने 24 अगस्त को जारी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि क़तर में प्रवासी कामगारों का शोषण किया जा रहा है. ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट के अनुसार कामगारों को सैलरी नहीं दी जा रही है और उन्हें नौकरी से निकालने की भी धमकियां मिल रही हैं.
इस रिपोर्ट के अनुसार लोगों की सैलरी भी काट ली गई है, जिससे प्रवासी मज़दूर खाने-पीने के संकट से जूझ रहे हैं.
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क़तर में 27 लाख से ज़्यादा विदेशी कामगार हैं. ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, ''निजी कंपनियां सैलरी देने में अक्सर देरी करती हैं या सैलरी कम करके देती हैं.'' मानवाधिकार संस्था ने कहा है कि उसने 93 प्रवासी मज़दूरों से बात की है जो 60 अलग-अलग कंपनियों में काम करते हैं.
एचआरडब्ल्यू ने अपनी रिपोर्ट में कहा है नियोक्ता कामगारों के ओवरटाइम का पैसा दबा लेते हैं और कई सुविधाओं से महरूम रखते हैं. ये अक्सर कॉन्ट्रैक्ट का उल्लंघन करती हैं.
क़तर की सरकार ने ऐसी प्रताड़नाओं को रोकने के लिए कई क़दम उठाए हैं. जैसे एक इलेक्ट्रॉनिक वेज प्रोटेक्शन सिस्टम बनाया गया है जिसमें सैलरी नहीं देने की तहक़ीक़ात की जाती है. लेकिन एचआरडब्ल्यू की रिपोर्ट के अनुसार यह सिस्टम बहुत प्रभावी साबित नहीं हुआ है.

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क़तर उन धनी देशों में शामिल है जिनके बारे में 2020 में अनुमान लगाया गया था कि उसका बजट सरप्लस रहेगा. लेकिन कोरोना वायरस की महामारी ने क़तर के कई सेक्टरों को बुरी तरह से प्रभावित किया है और विदेशी कामगार भी इसके शिकार हो रहे हैं.
कहा जा रहा है कि कई नियोक्ताओं के पास सैलरी देने के लिए पैसे नहीं हैं. समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार 16 मार्च को क़तर ने 20.6 अरब डॉलर का बिज़नेस पैकेज जारी किया था.
इनमें से तीन अरब रियाल कामगारों की सैलरी के लिए था. एचआरडब्ल्यू का कहना है कि कोरोना वायरस की महामारी आने के बाद से विदेशी कामगारों का शोषण बढ़ा है. एचआरडब्ल्यू से प्रवासियों ने कहा है कि उनके नियोक्ताओं ने सैलरी देना बंद कर दिया है और उनके पास खाने-पीने का भी सामान नहीं बचा है.
एचआरडब्ल्यू का कहना है कि नियोक्ताओं के ख़िलाफ़ शिकायत का निपटारा बहुत मुश्किल काम है और इसे अंजाम तक पहुंचाना महंगा भी है.
कोरोना के कारण क़तर के ऊर्जा उत्पादन, हॉस्पिटैलिटी और एविएशन सेक्टर बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं.
क़तर एयरवेज़ और क़तर पेट्रोलियम ने तो नौकरियों में भारी कटौती भी की है. एचआरडब्ल्यू ने क़तर से कहा है कि वो संयुक्त राष्ट्र के श्रम संगठन की सिफ़ारिशों को लागू करे. क़तर में 2022 का फीफा विश्व कप होना है और उससे पहले वहां श्रम क़ानूनों में सुधार की मांग की जा रही है.
एचआरडब्ल्यू से बात करने वाले 59 कर्मचारियों का कहना है कि या तो उन्हें वेतन नहीं मिला, या देर से मिला या वेतन रोक लिया गया. नौ कर्मचारियों का कहना है कि उनके नियोक्ताओं का तर्क है कि काम नहीं है इसलिए वेतन नहीं मिलेगा. जबकि 55 का कहना है कि उन्होंने ओवरटाइम काम किया लेकिन ओवरटाइम के पैसे नहीं मिले.
13 कर्मचारियों का कहना है कि उनके नियोक्ताओं ने नियुक्ती की शर्तें बदल दी हैं. 20 का कहना है कि उन्हें सेवा समाप्त होने के बाद मिलने वाले फ़ायदे नहीं दिए गए जबकि 12 का कहना है कि नियोक्ताओं ने वेतन में कटौती की.

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कोविड महामारी के दौरान वेतन में कटौती बढ़ी है. कुछ नियोक्ताओं ने महामारी का बहाना बनाकर कर्मचारियों का वेतन रोका है. उन कर्मचारियों को वेतन नहीं दिया गया है जिन्हें ज़बर्दस्ती उनके देश वापस भेजा गया. कुछ कर्मचारियों का तो ये तक कहना है कि उनके पास खाना खाने के भी पैसे नहीं है जबकि अन्य का कहना है कि उन पर क़र्ज़ का बोझ बढ़ता ही जा रहा है.
ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि शोषण के पीछे कफ़ाला व्यवस्था है. 2017 में क़तर ने कफ़ाला व्यवस्था को ख़त्म करने का वादा किया था. अब इस व्यवस्था को कुछ हिस्सों को हटा दिया गया है लेकिन ये व्यवस्था अब भी नियोक्ताओं को कर्मचारियों पर नियंत्रण देती है.
रियल एस्टेट सेक्टर में काम करने वाले 38 साल के एक एचरआर मैनेजर ने एचआरडब्ल्यू से कहा, ''वेतन देर से मिलने की वजह से मैं क्रेडिट कार्ड का बिल नहीं चुका पा रहा हूं, किराया और बच्चों की फ़ीस नहीं दे पा रहा हूं. अब भी मुझे दो महीनों का वेतन नहीं मिला है. मेरे स्तर के हर कर्मचारी की यही हालत है. श्रमिकों की हालत और भी ख़राब है, वो जिस हालात में रह रहे हैं उसकी कल्पना करना भी मुश्किल है. मैं तो बैंक से लोन ले सकता हूं, वो तो लोन भी नहीं ले सकते हैं.''

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खाड़ी के देशों और क़तर में श्रमिकों को वेतन न देना सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है. क़तर और खाड़ी देशों में अलग-अलग तरह की कफ़ाला व्यवस्था है. श्रमिकों के वेतन शोषण को रोकने के लिए क़तर ने साल 2015 में वेज प्रोटेक्शन सिस्टम (डब्ल्यूपीएस) लागू किया था. साल 2017 में श्रमिक विवाद निस्तारन समितियां बनाई गई थीं और साल 2018 में वर्कर्स सपोर्ट एंड इंश्यूरेंश फंड स्थापित किया था.
रिपोर्ट के प्रकाशन के बाद क़तर सरकार ने कहा है कि ह्यूमन राइट्स वॉच ने रिपोर्ट के प्रकाशन से कुछ दिन पहले ही सरकार से संपर्क किया और सरकार को लोगों के साथ काम करते हुए इस तरह की शिकायतें पहले नहीं मिली हैं.
सरकार ने कहा, जो मुद्दे उठाए गए हैं, सरकार वेतन के शोषण के मामलों में ग़ैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर काम करने को तैयार है. क़तर की सरकार ने कहा है कि वह जल्द ही न्यूनमत वेतन लागू करने जा रही है जो मध्य पूर्व के किसी देश में पहली बार होगा.
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