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बेलारूस: सड़क पर उतरे हज़ारों लोग, पुतिन को कहीं महंगी न पड़े मदद
बेलारूस के राष्ट्रपति एलेक्ज़ेंडर लुकाशेंको का विरोध कर रहे दसियों हज़ार लोग राजधानी मिंस्क की सड़कों पर जमा हैं. ये लोग विवादित चुनावों का विरोध कर रहे हैं.
प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की हिंसा और चुनावों में कथित धोखाधड़ी के ख़िलाफ़ बेलारूस में लोगों का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा है.
प्रदर्शनकारी राजधानी के केंद्रीय इलाक़े में 'मार्च फॉर फ्रीडम' या आज़ादी मार्च निकाल रहे हैं.
इसी बीच कुछ हज़ार लोगों की एक छोटी भीड़ को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति लुकाशेंको ने विरोधियों को 'चूहा' कहा है.
उन्होंने अपने समर्थकों से देश की आज़ादी की रक्षा करने की अपील की है.
इसी बीच पता चला है कि राष्ट्रपति लुकाशेंको ने इस सप्ताहांत में दो बार रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन से बात की है.
रूस ने बेलारूस को बाहरी सैन्य दख़ल की स्थिति में सुरक्षा मदद मुहैया कराने का भरोसा दिया है.
बेलारूस के दीर्घकालिक राष्ट्रपति लुकाशेंको ने पोलैंड और लीथूआनिया में चल रहे नेटो के सैन्य अभ्यास पर चिंता ज़ाहिर करते हुए पश्चिमी देशों के सैन्य गठबंधन की आलोचना भी की है.
वहीं नेटो ने क्षेत्र में सैन्य जमावड़े के आरोपों को खारिज किया है. जब रूस ने क्राइमिया पर क़ब्ज़ा कर लिया था तब नेटो ने ब्रिटेन, कनाडा, जर्मनी और अमरीकी बलों की चार टुकड़ियां बाल्टिक देशों में भेजी थीं.
बीते रविवार को हुए चुनावों में लूकाशेंको के इकतरफ़ा जीत हासिल करने का दावा करने के बाद से ही बेलारूस में ताज़ा तनाव शुरू हुआ है. आरोप हैं कि राष्ट्रपति ने चुनावों को प्रभावित किया.
केंद्रीय चुनाव आयोग का कहना है कि 1994 से बेलारूस की सत्ता पर काबिज़ लूकाशेंको ने 80.1 प्रतिशत मत हासिल किए जबकि मुख्य विपक्षी उम्मीदवार स्वेतलाना तीखानोवस्काया ने 10.12 प्रतिशत मत हासिल किए. लेकिन स्वेतलाना का आरोप है कि जिन इलाक़ों में गिनती सही से हुई है वहां उन्होंने 60-70 फ़ीसदी तक मत हासिल किए हैं.
यूरोप प्रदर्शनकारियों के साथ - जर्मनी
जर्मनी ने कहा है कि वो बेलारूस पर यूरोपीय यूनियन के प्रतिबंधों के विस्तार का समर्थन करने के लिए तैयार है. यूरोपीय यूनियन के नेताओं ने शुक्रवार को बेलारुस पर नए प्रतिबंधों की एक लिस्ट बनाने पर सहमति जताई थी. जर्मन सरकार के प्रवक्ता स्टीफ़ेन सीबर्ट ने कहा है कि इससे भी कठोर क़दम उठाए जाने चाहिए.
यूरोपीय यूनियन की रोटेटिंग प्रेसेडेंसी अभी जर्मनी के पास है. बेलारूस में विवादित राष्ट्रपति चुनाव के बाद सड़कों पर बड़ी संख्या में प्रदर्शन कर रहे लोगों को सीबर्ट ने "प्रभावशाली" और "बदलाव लाने वाला" बताया और हिंसा को तुरंत ख़त्म करने की मांग की और "राजनीतिक कैदियों" को छोड़ने की मांग की.
उन्होंने कहा, "इन लोगों को पता होना चाहिए कि यूरोप उनके साथ खड़ा है." सीबर्ट ने सरकार और विपक्ष के बीच के एक "राष्ट्रीय बातचीत" करने का आग्रह किया है ताकि "इस संकट को कम किया जा सके" उन्होंने कहा कि ऑर्गेनाइज़ेशन फॉर सेक्युरिटी एंड कोऑपरेशन इन यूरोप यानि ओएससीई "चुनाव की समीक्षा" करने में भूमिका निभा सकता है. ओएससीई ने साल 2001 में एक ऑबज़र्वर बेलारूस भेजा थे लेकिन उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति चुनाव को मॉनीटर करने के लिए उन्हें नहीं बुलाया गया था.
रुस क्या प्रतिक्रिया दे सकता है?
बीबीसी के मॉस्को संवाददाता स्टीव रोज़ेनबर्ग के मुताबिक रूस के समाचार चैनलों में बेलारूस 2020 और यूक्रेन 2014 की तुलना की जा रही है.
यूक्रेन में हुई पश्चिम समर्थित क्रांति के बाद रूस ने अपने विशेष सैन्य बलों को क्राइमिया पर क़ब्ज़ा करने के लिए भेजा था. रूस की सेना ने भी पूर्वी यूक्रेन में दख़ल दिया था.
अब सवाल ये है कि क्या छह साल बाद रूस बेलारूस में भी सैन्य दख़ल दे सकता है?
कम से कम काग़ज़ों पर तो ये लगता है कि रूस का ये क़दम उसके लिए ही नुक़सानदेह साबित हो सकता है. बेलारूस में विपक्ष का जो आंदोलन है वो पश्चिम समर्थक या रूस विरोधी नहीं है. ये राष्ट्रपति लुकाशेंको के ख़िलाफ़ है.
यदि रूस बेलारूस के राष्ट्रपति के समर्थन में सेना भेजता है तो ख़तरा ये है कि इससे बेलारूस के आम लोग रूस के ख़िलाफ़ हो सकते हैं.
ये सच है कि रूस बेलारूस को अपने प्रभाव क्षेत्र में ही रखना चाहता है. रूस का अंतिम मक़सद तो यही है कि पड़ोसी बेलारूस से उसके संबंध और गहरे हों. रूस अपने आप को फिर से संघीय राष्ट्र के तौर पर स्थापित करना चाहता है जिसके केंद्र में राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन हों. रूस राजनीतिक प्रभाव से भी ऐसा हासिल कर सकता है.
रूस को डर ये है कि उसके दरवाज़े पर कहीं एक और क्रांति दस्तक न दे दे. लेकिन मिंस्क 2020 कीएफ़ 2014 नहीं है. बेलारूस पश्चिम और पूर्व के बीच में से किसी एक को नहीं चुन रहा है.
बेलारूस के लोग अपने ही लोगों पर सुरक्षाबलों की बर्बरता के ख़िलाफ़ है. लोगों में ग़ुस्सा इतना ज़्यादा है कि पारंपरिक तौर पर उनके समर्थक रहे यूनियन वर्कर भी अब उनका साथ छोड़ने लगे हैं.
मिंस्क में हो क्या रहा है?
स्थानीय मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक राष्ट्रपति के समर्थन में हुई रैली में क़रीब 31 हज़ार लोगों ने हिस्सा लिया जबकि सरकार का अनुमान है कि इसमें 65 हज़ार के क़रीब लोग शामिल थे.
समर्थकों को संबोधित करते हुए लुकाशेंको ने कहा कि उन्हें रैलियां पसंद नहीं है और अपना बचाव करने के लिए उन्हें रैलियों की ज़रूरत भी नहीं है. उन्होंने कहा कि ये उनकी ग़लती नहीं है कि उन्हें लोगों की मदद मांगनी पड़ रही है.
दोबारा राष्ट्रपति चुनाव कराने की मांग को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि अगर ऐसा हुआ तो एक देश के तौर पर बेलारूस की मौत हो जाएगी.
उन्होंने कहा, आप यहां आए हो क्योंकि पच्चीस सालों में पहली बार आपको अपने देश, अपनी आज़ादी, अपनी बीवियों और अपने बच्चों की रक्षा करनी पड़ रही है.
लुकाशेंको ने कहा कि यदि अभी विपक्षियों का दमन नहीं किया गया तो वो ऐसे बाहर निकलेंगे जैसे बिल से चूहे निकलते हैं.
'ये आपके अंत की शुरुआत है, आप ऐसे अपने घुटनों पर आओगे जैसे यूक्रेन आया है और दूसरे देश आए हैं, और दुआ करो, ईश्वर जानता है किससे.'
रिपोर्टों में दावा किया गया है कि सरकारी कर्मचारियों को रैली में शामिल होने के लिए कहा गया था और नौकरी से निकालने की धमकी दी गई थी. कई दिनों से सरकारी फैक्ट्रियों के कर्मचारी काम छोड़कर राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों में जा रहे हैं.
न्यूज़ वेबसाइट tut.by के मुताबिक राष्ट्रपति की रैली के समय है मिंस्क के केंद्रीय इलाक़े में दो लाख बीस हज़ार लोग जमा थे और राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ रैली कर रहे थे.
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