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चीन में वीगर मुसलमान: मॉडल के वीडियो से मिली नज़रबंदी के हालात की झलक
- Author, जॉन सडवर्थ
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
मरदान घापर कैमरा के लिए पोज़ देने के अभ्यस्त थे.
31 वर्षीय मरदान चीन के बड़े रिटेलर टाओबाओ के लिए मॉडलिंग करते थे. उन्हें बढ़िया वेतन मिलता था और वो कपड़ों के ब्रांड के प्रोमोशनल वीडियो में अपने गुड लुक्स को खूब दिखाते थे.
लेकिन उनके एक वीडियो में ऐसी चमक-धमक नहीं है. किसी चमकदरा स्टूडियो या तड़क भड़क वाले बाज़ार के बजाए वो एक खाली कमरे में हैं जिसकी दीवारे सीलन से भरी हैं और खिड़की पर लोहे की जाली है.
मरदान पोज़ देने के बजाए चुपचाप बैठे हैं. उनके चेहरे पर डर के भाव साफ़ नज़र आ रहे हैं.
उनके सीधे हाथ में कैमरा है. वो वीडियो में अपने गंदे कपड़े, सूजे हुए घुटने और एक हाथ में बेड से बंधी हथकड़ी दिखाते हैं. ये बेड उनके कमरे में रखा एकमात्र फर्नीचर है.
मरदान का ये वीडियो और इसके साथ भेजे गए कुछ टेक्स्ट संदेश बीबीसी को भी मिले हैं.
ये वीडियो चीन की हिरासत व्यवस्था की दुर्लभ झलक दिखाता है.
हिरासत केंद्र के भीतर से भेजा गया ये वीडियो बताता है कि चीन की इस व्यवस्था के तहत रह रहे लोग कितने मुश्किल हालात में हैं.
मरदान के भेजे दस्तावेज़ और वीडियो
चीन के शब्दों में कहा जाए तो चीन देश के पश्चिमी प्रांत शिनजियांग में तीन बुरी ताक़तों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहा है. ये हैं अलगाववाद, आतंकवाद और चरमपंथ.
इस लड़ाई का शिनजियांग प्रांत पर गहरा प्रभाव पड़ा है. इसे दर्शाने के लिए जो सबूत इकट्ठा किए जा रहे हैं उनमें हिरासत केंद्र से आई ये सामग्री और सबूत जोड़ती है.
बीते कुछ सालों में इकट्ठा किए गए भरोसेमंद सबूतों से पता चलता है कि चीन में दस लाख से अधिक वीगर मुसलमान और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को ऐसे अति सुरक्षित कैंपों में रहने के लिए मजबूर किया गया है. चीन का कहना है कि ये चरमपंथ विरोधी शिक्षा और प्रशिक्षण के केंद्र हैं जहां लोग अपनी मर्ज़ी से आते हैं.
हज़ारों बच्चों को उनके अभिभावकों से अलग कर दिया गया है और ताज़ा शोध से पता चला है कि महिलाओं को ज़बरदस्ती बच्चे पैदा करने से रोका जा रहा है.
यातना और शोषण के स्पष्ट आरोपों के साथ-साथ मरदान का वीडियो इस बात का सबूत भी देता है कि चीन के इन दावों के विपरीत कि अधिकतर कैंप बंद कर दिए गए हैं, अभी भी बड़ी तादाद में वीगर मुसलमानों को बिना किसी आरोप के हिरासत में लिया जा रहा है.
मरदान ने जो दस्तावेज़ और वीडियो भेजे हैं वो वीगर समुदाय पर डाले जा रहे मनोवैज्ञानिक दबाव की झलक भी दिखाते हैं.
उन्होंने एक दस्तावेज़ का फोटो लिया है जो बताता है कि तेरह साल तक की उम्र के बच्चों से माफ़ी मांगने और आत्मसमर्पण करने के लिए कहा जा रहा है.
शिनजियांग में इन दिनों कोरोना संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं. जिन गंदे और भीड़भाड़ वाले कैंपों का उन्होंने ज़िक्र किया है वो इस बात को रेखांकित करते हैं कि इन कैंपों में वायरस के फ़ैलने का ख़तरा बहुत ज़्यादा है.
बीबीसी ने इस प्रतिक्रिया के लिए चीन के विदेश मंत्रालय और शिनजियांग प्रांत के अधिकारियों को विस्तृत निवेदन भेजा था लेकिन किसी ने कोई जवाब नहीं दिया.
मरदान घापर के परिवार को बीते पांच महीनों से उनके बारे में कुछ नहीं पता चला है. वो समझते हैं कि चार मिनट 38 सेकंड का वीडियो जारी करने के बाद उन पर दबाव और यातनाएं बढ़ीं होंगी.
लेकिन वो कहते हैं कि ये वीडियो मरदान और वीगर मुसलमानों पर हो रहे उत्पीड़न के मामले को उठाने की आख़िरी उम्मीद है.
उनके चाचा अब्दुलहकीम घापर जो अब नीदरलैंड्स में रहते हैं, मानते हैं कि ये वीडियो वीगर मुसलमानों के शोषण के बारे में जनता की राय को उसी तरह प्रभावित कर सकता है जिस तरह जॉर्ड फ्लॉयड की मौत का वीडियो नस्लीय भेदभाव के ख़िलाफ़ एक ताक़तवर प्रतीक बन गया है.
वो कहते हैं, दोनों ने ही अपनी नस्ल की वजह से बर्बरता का सामना किया है.
वो कहते हैं, लेकिन अमरीका में लोग आवाज़ उठा रहे हैं लेकिन हमारे मामले में शांति हैं.
2009 में मरदान घापर, बहुत से वीगर मुसलमान नौजवानों की तरह, बेहतर ज़िंदगी की तलाश में चीन के बड़े और अमीर शहरों की ओर गए थे.
उन्होंने शिनजियांग ऑर्ट्स यूनीवर्सिटी में डांस की पढ़ाई की है. शुरुआत में उन्हें डांसर के तौर पर काम मिला और कुछ साल बाद उन्हें मॉडल के तौर पर काम मिलने लगा. वो चीन के शहर फोशान में काम कर रहे थे. उनके दोस्त बताते हैं कि मरदान घापर की एक दिन की कमाई एक लाख रुपए के बराबर तक हो गई थी.
उनकी कहानी चीन की बढ़ती अर्थव्यवस्था और राष्ट्रपती शी जिनपिंग के चाइना ड्रीम के विज्ञापन की तरह लगती है. लेकिन तुर्की भाषा बोलने वाले, इस्लाम धर्म के अनुयायी और सांस्कृतिक रूप से मध्य एशिया के अधिक करीब होने वाले वीगर मुसलमानों को चीन के समाज में शक की निगाह से ही देखा जाता है. उन्हें समाज में भेदभाव का सामना भी करना पड़ता है.
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वीगर पहचान छुपाने की नसीहत
घापर के रिश्तेदार बताते हैं कि उनसे कहा गया कि उनके करियर के लिए ये अच्छा होगा कि वो अपनी वीगर पहचान को छुपाएं और अपने चेहरे को यूरोपीय लोगों की तरह दिखाएं.
उनके रिश्तेदार बताते हैं कि उन्होंने इनता पैसा कमा लिया था कि वो अपने लिए एक शानदार घर ख़रीद पाते. लेकिन वो इसे अपने नाम पर पंजीकृत नहीं करा सके और घर को उन्हें अपने हान चीनी दोस्त के नाम पर ख़रीदना पड़ा.
लेकिन ये अन्याय अब उसी हक़ीक़त के सामने बहुत कम लगते हैं जो आगे चलकर उनके सामने आने वाली थी.
बीजींग में साल 2013 और कुनमिंग में साल 2014 में पदयात्रियों पर हुए हिंसक चाकू हमलों के बाद चीन वीगर संस्कृति को ना सिर्फ़ शक़ की निगाह से देख रहा है बल्कि इसे देशद्रोही भी मान रहा है. इन हमलों का आरोप वीगर अलगाववादियों पर लगा था.
साल 2018 में जब चीन शिनजियांग प्रांत में वीगर लोगों को हिरासत में रखने के लिए बड़े-बड़े कैंप बना रहा था, मरदान फुशान में ही रह रहे थे. लेकिन उनकी जिंदगी में एक बड़ा बुरा बदलाव बस होने ही वाला था.
अगस्त 2018 में उन्हें गांजा बेचने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया और 18 महीनों के लिए जेल भेज दिया गया. उनके दोस्त कहते हैं कि उन पर ये आरोप झूठे लगाए गए थे.
वो दोषी थे या नहीं, इससे उनके रिहा होने की संभावना पर बहुत ज़्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला था. आंकड़ें बताते हैं की चीन की अदालतों में पेश होने वाले 99 प्रतिशत मुजरिमों को सज़ा हो जाती है.
लेकिन नवंबर 2019 में जब वो रिहा हुए तो जो राहत उन्होंने महसूस की वो बहुत ज़्यादा दिन नहीं रही. एक महीने बाद पुलिस उनके घर आई और कहा कि उन्हें शिनजियांग जाना है और रूटीन पंजीकृत प्रक्रिया पूरी करनी है.
बीबीसी ने जो सबूत देखे हैं वो दर्शाते हैं कि मरदान के किसी और अपराध में शामिल होने का शक़ नहीं था. अधिकारियों ने उनसे कहा था कि वो अपने स्थानीय समुदाय के साथ कुछ दिन रहेंगे और शिक्षा हासिल करेंगे.
चीन का प्रशासन हिरासत केंद्रों को शिक्षा केंद्र ही बताता है.
15 जनवरी को जब उन्हें फोशान से शिनयिजांग में उनके गृहनगर कूचा की उड़ान पर बिठाया जा रहा था तो उनके परिजनों ने उन्हें उनका मोबाइल फ़ोन और कुछ गर्म कपड़े सौंपे थे.
अन्य वीगर मुसलमानों को दूसरे शहरों से जबरन लाने और हिरासत केंद्रों में रखने के सबूत हैं. बहुत से वीगर मुसलमानों को विदेशों से भी वापस बुलााय गया है.
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भयावह तस्वीर
मरदान के परिवार को इस बात का पक्का यकीन हो गया था कि उन्हें पुनर्शिक्षा कैंप में भेज दिया गया है.
लेकिन एक महीने बाद उन्हें एक अप्रत्याशित ख़बर मिली.
किसी तरह, मरदान को अपना फ़ोन मिल गया था और वो इसका इस्तेमाल बाहर की दुनिया से संपर्क करने के लिए कर पा रहे थे.
मरदान ने टेक्स्ट मैसेज उसी कमरे से भेजे हैं जिसमें उन्होंने वीडियो रिकॉर्ड किया है.
ये संदेश उनके शिनजियांग पहुंचने के बाद के अनुभव की भयावह तस्वीर पेश करते हैं.
चीन की सोशल मीडिया एप वीचैट के ज़रिए भेजे गए इन संदेशों में मरदान बताते हैं कि पहले उन्हें कूचा की पुलिस जेल में रखा गया था.
वो लिखते हैं, "मैंने 50-60 लोगों को पचास वर्ग मीटर के कमरे में बंद देखा. पुरुष दाईं ओर थे और महिलाएं बाईं ओर थीं."
"सभी लोगों ने एक तथाकथित फ़ोर पीस सूट पहन रखा था. सर पर एक काला बोरा, हाथ में हथकड़ी, टांगों में बेड़ियां और हथकड़ी को बेड़ियों से बांधती एक जंजीर."
मानवाधिकार समूह पहले भी चीन में इस तरह की हथकड़ियों और बेड़ियों के इस्तेमाल की आलोचना कर चुके हैं.
घापर को भी ये सूट पहनाया गया और बाकी बंदियों के साथ छोड़ दिया गया. इस कमरे में लेटने या सोने के लिए कोई जगह नहीं थी.
एक टेक्स्ट मैसेज में वो लिखते हैं, 'मैंने अपने सिर पर रखे बोरे को उठाया और सुरक्षा अधिकारी से कहा कि मेरी हथकड़ी बहुत कसकर बांधी गई है और मेरे हाथ में दर्द हो रहा है.'
'उसने चिल्लाते हुए कहा कि अगर तुमने अब अपने सर से बोरा हटाया तो मैं मार-मारकर तुम्हारा दम निकाल दूंगा. और इसके बाद मैंने कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं की.'
"यहां मरना वो आख़िरी चीज़ होगी जो मैं चाहूंगा."
वो जेल के दूसरे हिस्से से लगातार आने वाली चीखने की आवाज़ों के बारे में भी लिखते हैं. वो संकेत देते हैं कि ये पूछताछ कक्ष होंगे.
उन्होंने हिरासत केंद्र के बेहद गंदे और अमानवीय हालातों का ज़िक्र करते हुए लिखा है कि यहां लोगों के सिरों में जुएं पड़ गई हैं और कुछ ही चम्मच और प्याले हैं जिन्हें सभी क़ैदी एक साथ इस्तेमाल करते हैं.
"लेकिन अगर आप पहले खाना खाना चाहते हैं तो आप को शांत रहते हैं, ये एक नैतिक मसला है. क्या आप ये समझते हैं?"
22 जनवरी को, जब चीन में कोरोना वायरस सर्वोच्च स्तर पर था, देश में वायरस को रोकने के सरकार के राष्ट्रव्यापी प्रयास की ख़बर हिरासत कैंप तक पहुंची.
वो लिखते हैं, 'महामारी के दौरान उन्हें बाहर बेसबॉल जैसा खेल खेलते हुए पकड़ लिया गया था. उन्हें पुलिस स्टेशन लाया गया और तब तक पीटा गया जब तक उनकी खाल नहीं उधड़ गई. वो बच्चों की तरह रो रहे थे.'
पुलिसवालों ने सब बंदियों को मास्क पहनाए. हालांकि इस दौरान भी उन्हें सिर ढंका रखने के लिए ही कहा गया. वो सब भीड़भाड़ वाले सेल में बंद थे.
वो लिखते हैं, 'सिर पर हुड और चेहरे पर मास्क. और हवा तो बहुत ही कम थी.'
जब बाद में अधिकारी थर्मामीटर लेकर आए, मरदान घापर समेत कई क़ैदियों का तापमान सामान्य से ज़्यादा पाया गया.
अभी भी वो अपना फोर पीस सूट ही पहने हुए थे. उन्हें ऊपरी तल पर दूसरे कमरे में ले जाया गया. यहां गार्ड ने रात में खिड़की खोल दी. हवा इतनी सर्द थी कि वो सारी रात सो नहीं पाए.
वो लिखते हैं कि यहां वो टॉर्चर किए जा रहे लोगों की आवाज़ों को और साफ़ सुन सकते थे.
वो कहते हैं, 'एक बार मैंने एक व्यक्ति को सुबह से लेकर शाम तक रोते-चिल्लाते सुना.'
कुछ दिन बाद बंदियों को मिनी बसों में भरकर दूसरे स्थान पर ले जाया गया. मरदान घापर की नाक बह रही थी और वो बीमार लग रहे थे. उन्हें बाकी बंदियों से अलग कर दिया गया और दूसरी जगह ले जाया गया. यहां से ही उन्होंने वीडियो बनाकर भेजा है.
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फिर संदेश आना बंद हो गए
इस जगह को महामारी नियंत्रण केंत्र बताया गया था. वहां उन्हें बिस्तर से बांधकर रखा गया.
वो लिखते हैं, मेरे पूरे शरीर पर जुएं हैं, मैं हर दिन उन्हें अपने शरीर से हटाता हूं. बहुत खुजली होती है.
यहां का वातावरण पुलिस स्टेशन से बहुत अच्छा है. यहां मैं अकेला रह रहा हूं और दो लोग मेरी सुरक्षा कर रहे हैं.
यहां के कुछ हल्के माहौल ने उन्हें बाहरी दुनिया से संपर्क करने और अपनी बात साझा करने का मौका दे दिया. उनका फ़ोन जो उनके सामान में था, उस पर किसी गार्ड की नज़र नहीं पड़ी थी.
पुलिस की जेल में 18 दिन बिताने के बाद वो गुपचुप तरीके से बाहरी दुनिया के संपर्क में आ गए थे.
कुछ दिन तक उन्होंने अपने अनुभव साझा किए. फिर संदेश आना बंद हो गए.
उसके बाद से उनके बारे में कुछ पता नहीं चल सका है. अधिकारियों ने उनके बारे में कोई भी जानकारी नहीं दी है. ना ही उन्हें हिरासत में रखे जाने का कोई कारण बताया है.
मरदान के भेजे गए संदेशों की सत्यता को स्वतंत्र रूप से जांचना असंभव है. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि वीडियो फुटेज असली लग रही है, ख़ासकर बैकग्राउंड में सुनाई दे रहे प्रोपागेंडा संदेश इसकी सत्यता को मज़बूत करते हैं.
उनकी खिड़की के बाहर लगे लाउडस्पीकर पर उद्घोषणा की जा रही है कि शिनजियांग कभी भी पूर्वी तुर्किस्तान का हिस्सा नहीं रहा है.
उद्घोषक कहता है, 'देश के भीतर और बाहर सक्रिय अलगाववादी ताक़तों ने इस भौगोलिक शब्द का राजनीतिकरण कर दिया है और तुर्की भाषा बोलने वाले और इस्लाम को मानने वालों के एकजुट होने का आह्वान किया है.'
जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफ़ेसर और शिनजियांग में चीन की नीतियों के एक्सपर्ट जेम्स मिलवार्ड ने बीबीसी के लिए मरदान घापर के संदेशों का अनुवाद और विश्लेषण किया.
वो कहते हैं कि ये संदेश दूसरे मामलों की ही तरह हैं जिनके दस्तावेज़ तैयार किए गए हैं. उन्हें शिनजियांग लाने की प्रक्रिया, और शुरुआत में भीड़भाड़ वाली जेल में उनका रखा जाना ऐसा ही जैसा दूसरे लोगों के साथ भी हुआ है.
प्रोफ़ेसर मिलवर्ड कहते हैं कि पुलिस स्टेशन का जो वर्णन मरदान ने दिया है वो बहुत ही विस्तृत है.
वो कहते हैं, 'उन्होंने बहुत अच्छी चीनी भाषा में अपनी बात रखी है, लोगों को किस तरह रखा जाता है इसका उन्होंने डरावना विवरण दिया है. वो जानकारी का एक मज़बूत स्रोत हैं.'
विक्टिम्स ऑफ़ कम्यूनिज़्म मेमोरियल फाउंडेशन के साथ जुड़े वरिष्ठ शोधकर्ता और शिनजियांग मामलों के विशेषज्ञ डॉ. एडरियान जेंज़ कहते हैं कि वीडियो की असली क़ीमत ये है कि ये चीन की सरकार के कैंपों की संख्या कम करने के दावे को खारिज करता है.
डॉ. जेंज़ कहते हैं, ये बेहद महत्वपूर्ण है. ये बताता है कि लोगों को हिरासत में लेने, उन्हें अलग-अलग करने, और फिर उन्हें ग़ैर न्यायिक नज़रबंदी में भेजने का प्रक्रिया पहले की ही तरह चल रही है.
मरदान घापर ने महामारी नियंत्रण केंद्र की टॉयलेट में मिले एक दस्तावेज़ का फोटो भी भेजा है. ये फोटो उनकी विश्वस्नीयता को और भी बढ़ाता है.
इस दस्तावेज़ में आक्सू परफ़ेक्चर में कम्यूनिस्ट पार्टी के सेक्रेट्री के भाषण का ज़िक्र है. इसकी तारीख़ और जगह बताती है कि ये दस्तावेज़ मरदान घापर की नज़रबंदी के दौरान कूचा शहर के आसपास अधिकारियों में बांटा गया होगा.
इस दस्तावेज़ में कहा गया है कि तेरह साल तक के बच्चों को माफ़ी मांगने और सरेंडर करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए.
इससे ये भी पता चलता है कि चीन किस हद तक वीगर मुसलमानों और दूसरे अल्पसंख्यकों के विचारों और व्यवहार को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ कोलेराडो में मानव विज्ञानी डॉ. डेरेन बायलर कहते हैं, मुझे लगता है ये पहली बार है जब चीन के बच्चों को धार्मिक गतिविधियों के लिए ज़िम्मेदार ठहराने का अधिकारिक दस्तावेज़ मैंने देखा है. डॉ. डेरेन ने वीगर मुसलमानों पर गहरा शोध किया है और उनके बारे में विस्तार से लिखा है.
मरदान घापर के संदेशों और वीडियो को सार्वजनिक करने से उनकी सज़ाओं के और भी सख़्त होने का ख़तरा है. लेकिन उनके क़रीबी लोगों का कहना है कि उन्होंने ये क़दम उठाया है क्योंकि उनके पास और कोई विकल्प नहीं है.
अमस्टर्डम में रहने वाले मरदान के चाचा अब्दुलहाकिम घापर कहते हैं, शांत रहने से भी उसकी बहुत मदद नहीं होने वाली है.
अब्दुलहकीम कहते हैं कि हिरासत में लिए जाने से पहले तक वो अपने भतीजे के नियमित संपर्क में थे. वो मानते हैं कि उनका अपने भतीजे से संपर्क रखना ही उसकी हिरासत की वजह हो सकता है. बहुत से मामलों में ऐसे लोगों को हिरासत में रखा गया है जिनके विदेश में रह रहे लोगों से संपर्क थे.
अब्दुलहकीम कहते हैं, मैं इस बारे में सौ प्रतिशत निश्चिंत हूं. उसे हिरासत में लिया गया है क्योंकि मैं विदेश में हूं और मैंने चीन में मानवाधिकारों के उल्लंघन के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों में हिस्सा लिया है.
अब्दुलहकीम ने साल 2009 में उरूमक़ी में बड़े प्रदर्शनों का आह्वान करते हुए पर्चे बांटे थे और इसके बाद वो भाग कर नीदरलैंड्स आ गए थे.
2009 में उरूमक़ी में हुए प्रदर्शन दंगों में बदल गए थे और इस दौरान कम से कम दो सौ लोग मारे गए थे. चीन के शिनजियांग में नियंत्रण सख़्त करने की वजह इन्हें ही माना जाता है.
चीन के अधिकारी अब्दुलहकीम को गिरफ़्तार करने की कोशिश कर रहे थे. उन्हें इस बारे में पता चला तो उन्होंने पासपोर्ट बनवाया और देश छोड़ दिया. तब से वो कभी वापस नहीं गए हैं.
अब्दुलहकीम कहते हैं कि उनकी चीन के भीतर और बाहर राजनीतिक गतिविधियां शांतिपूर्ण रही हैं और उनके भतीजी ने कभी भी राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है.
बीबीसी ने चीन के अधिकारियों को जो सवाल भेजे थे उनमें ये भी पूछा गया था कि क्या मरदान घापर या उनके चाचा पर चीन में किसी अपराध में शामिल होने का कोई शक़ है.
ये भी पूछा गया था कि मरदान को बिस्तर से बांधकर क्यों रखा गया है. उनके टॉर्चर और दुर्व्यवहार के आरोपों पर सवाल भी पूछे गए थे.
लेकिन चीन की ओर से किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया गया. मरदान घापर अब जहां भी हैं, एक चीज़ स्पष्ट है.
उनकी ड्रग संबंधित अपराध में पहले हुई गिरफ़्तारी सही थी या ग़लत, उनकी मौजूदा हिरासत इस बात का सबूत है कि चीन में पढ़े लिखे कामयाब वीगर मुसलमान भी नज़रबंदी की व्यवस्था का शिकार बन सकते हैं.
प्रोफ़ेसर मिलवर्ड कहते हैं, ' ये नौजवान एक फेशनेबल मॉडल है, उसका करियर कामयाब रहा है, वो बेहतरीन चाइनीज़ बोलता है, चीनी भाषा में अच्छा लिखता है और अच्छे वाक्यांश इस्तेमाल करता है, ऐसे में वो कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसे शिक्षा की ज़रूरत है.'
डॉ. एडरियान जेंज़ कहते हैं कि इस पूरी व्यवस्था का मतलब ही ये है कि कोई कितना शिक्षित है या उसकी पृष्ठभूमि क्या है ये बहुत मायने नहीं रखता है.
वो कहते हैं, 'मायने सिर्फ़ ये रखता है कि सिस्टम के प्रति उनकी निष्ठा परखी जा रही है. कभी न कभी, हर किसी को किसी न किसी तरह की पुनर्शिक्षा या नज़रबंदी का सामना करना ही है. हर किसी को इस सिस्टम को भोगना है.'
चीन की सरकार वीगर मुसलमानों की आबादी के उत्पीड़न के आरोपों को खारिज करती है. हाल के दिनों में इस मुद्दे पर अमरीका की ओर से तीखी आलोचना के बाद चीन की प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने अमरीका में जॉर्ज फ्लॉयड की मौत का ज़िक्र करते हुए कहा है कि चीन में वीगर मुसलमान अमरीका में अफ्रीकी मूल के काले लोगों से ज़्यादा स्वतंत्र हैं.
लेकिन मरदान का परिवार जो उन्हें किसी अज्ञात स्थान पर बिस्तर से बंधा देखने के बाद बेहद परेशान है, के लिए दोनों ही मामलों में एक समानता है.
अब्दुलहकीम कहते हैं, जब मैं जॉर्ज का वीडियो देखता हूं तो मुझे अपने भतीजे का वीडियो याद आता है.
वो कहते हैं, 'समूची वीगर आबादी जॉर्ज फ़्लॉयड की तरह ही जी रही है. हम सांस नहीं ले पा रहे हैं.'
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