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नस्लवाद के विरोध का सही तरीक़ा क्या है? क्या आप नस्लवाल विरोधी हैं?
- Author, पाब्लो उचोआ
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
नस्लवादी न होना या नस्लवाद विरोधी होना एक जैसे लग सकते हैं, लेकिन दोनों में बहुत फ़र्क है.
ज़रा कल्पना कीजिए कि किसी ऐसे व्यक्ति ने कोई नस्लवादी टिप्पणी की है जिसे आप जानते हैं. अगर आप नस्लवादी नहीं हैं तो आप उनसे सहमत नहीं होंगे, लेकिन सवाल ये है कि क्या आप उन्हें चुनौती देंगे?
पूर्व एनबीए खिलाड़ी और न्यू यॉर्क टाइम्स के बेस्ट सेलर लेखक और मनोवैज्ञानिक जॉन एमियाची कहते हैं कि ग़ैर नस्लवादी लोग मूक दर्शक की तरह होते हैं.
वो उस वक़्त ना कुछ कहते हैं और ना ही कुछ करते हैं. वो दरअसल नाव को डुबोना नहीं चाहते.
लेकिन, एक नस्लवाद विरोधी व्यक्ति ऐसे मौके पर आवाज़ उठाएगा. बीबीसी से बात करते हुए डॉक्टर एमियाची कहते हैं, क्योंकि एक नस्लवाद विरोधी व्यक्ति दुनिया को अपना पक्ष बताने का कोई मौका नहीं छोड़ता है, भले ही वो सबकुछ न बदल पाए.
ग़ैर नस्लवादी और नस्लवाद विरोधी लोगों के बीच का फ़र्क दशकों पुराना है. लेकिन ब्लैक लाइव्स मैटर प्रदर्शनों के दौरान ये फिर से ताज़ा हो गया है. शुरुआत में अफ़्रीकी अमरीकी मूल के लोगों के ख़िलाफ़ पुलिस की हिंसा के विरोध में खड़ा हुआ ये अभियान अब एक वैश्विक अभियान बन गया है.
तो आप एक नस्लवाद विरोधी व्यक्ति कैसे बन सकते हैं? लेकिन, पहले ये समझ लिया जाए कि नस्लवाद क्या होता है.
क्या होता है नस्लवाद?
डिस्मेंटलिंग रेसिज़्म वर्क्स (डीआरवर्क्स) अमरीका में नस्लवाद के ख़िलाफ़ काम कर रहा एक संगठन है. ये संगठन मानता है कि नस्लवादी पूर्वाग्रह, नफ़रत या फिर भेदभाव नस्लवाद से अलग हैं.
ये संगठन नस्लवाद के तीन आयाम मानता हैं. सांस्कृतिक, संस्थानिक और व्यक्तिगत.
इसलिए, हमारे व्यक्तिगत क़दम नस्लीय आधार पर हैं या नहीं, सिर्फ़ ये ही नस्लवाद नहीं है.
सांस्कृतिक नस्लवाद का एक उदाहरण ये भी है कि गोरे लोगों की मान्यताओं, मूल्यों और धारणाओं को ही आम धारणा मान लिया जाता है और काले लोगों की मान्यताओं को खारिज कर दिया जाता है.
डीआरवर्क्स का कहना है कि जब संस्थान इस तरह की सोच को बढ़ावा देने लगते हैं तो नस्लवाद संस्थानिक हो जाता है.
नस्लवाद का विरोध क्या है?
नस्लवाद के विरोध के विचार की शुरुआत एंगेला डेविस ने की थी. अश्वैत समलैंगिक राजनीतिक कार्यकर्ता डेविस ने एक बार कहा था, एक नस्लवादी समाज में, सिर्फ़ ग़ैर नस्लवादी होना पर्याप्त नहीं है, हमें नस्लवाद विरोधी होना ही होगा.
अमरीकन यूनिवर्सिटी में नस्लवाद के विरोध पर शोध कर रहीं और एंटीरेसिस्ट एंड रिसर्च सेंटर से जुड़ीं मालिनी रंगनानाथन कहती हैं, नस्लवाद विरोधी होना एक ऐसी परिस्थिति है जब व्यक्ति अपने विशेषाधिकार को स्वीकर करता है.
इसके बाद वो नस्लवाद को बढ़ावा देने वाली नीतियों, क़ानून और आर्थिक व्यवस्था में सुधार के लिए संघर्ष करते हैं.
नस्लवाद के मनोविज्ञान पर किताब लिखने वाले डॉ. बीवर्ले टाटूम नस्लवादी समाज की तुलना एक ऐसे चलने के रास्ते से करते हैं जो अपनी ही मान्यताओं, व्यवहार और सांस्कृतिक संदेशों से संचालित हो रहा है.
डॉ. टाटूम बीबीसी से कहते हैं, 'आपको ऐसे बल प्रभावित करते हैं जो आपके नियंत्रण में नहीं होते हैं, लेकिन आप नस्लवाद की प्रक्रिया में हिस्सा ले रहे होते हैं.'
'कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इस व्यवस्था को नस्लवादी के तौर पर देखते हैं और इसके किनारे पर खड़े हो जाते हैं. यही लोग ग़ैर नस्लवादी हैं.'
डॉ. टाटूम कहते हैं, "भले ही उन्हें पता न चल रहा हो लेकिन निष्क्रिय तौर पर वो भी उसी रास्ते पर चल रहे होते हैं. अगर वो घूम भी जाएं और ठहर जाएं, वो फिर भी उसी दिशा में चल रहे होते हैं."
इस प्रक्रिया को सिर्फ़ वही व्यक्ति रोक सकता है या इसमें व्यवधान डाल सकता है जो सक्रिय तौर पर उल्टी दिशा में चलने का प्रयास करे. आप निष्क्रिय रहकर नस्लवाद विरोधी नहीं हो सकते हैं, इसके लिए आपको क़दम उठाने ही होंगे. आपको ये विकल्प चुनना ही होगा.
नस्लवाद विरोधी होने के लिए आपका नस्लवाद के ख़िलाफ़ बोलना ज़रूरी है.
डॉ. एमियाची कहते हैं, आप ये कर सकते हैं कि आप जहां भी जाएं, लोगों को आपका स्टैंड स्पष्ट पता हो. उन्हें पता होना चाहिए कि आप नस्लवाद के विरोधी हैं. एक तरह से आप रास्ते में रोशनी में दिखाने वाले बन जाते हैं.
वहीं डॉ. टाटूम कहती हैं कि हम सबका एक प्रभाव क्षेत्र होता है और हमें वहां चीज़ों को बदलना चाहिए.
वो ये सलाह देती हैं-
'जब कभी आपके घर में से कोई सदस्य या कोई दोस्त नस्लवादी भाषा का इस्तेमाल करे, या नस्लवादी मज़ाक करे या किसी के प्रति भेदभावपूर्ण भाषा का इस्तेमाल करे तो उसके ख़िलाफ़ बोलें.
अगर आप एक शिक्षक हैं तो अपने छात्रों में नस्लवाद के ख़िलाफ़ आलोचनात्कम सोच विकसित करें.
अगर आप एक अभिभावक हैं तो अपने बच्चों से नस्लीय बराबरी के बारे में बात करें. तीन चार साल की उम्र से ही बच्चे नस्लवाद के बारे में सोच विकसित करना शुरू कर सकते हैं.
अगर आप एक पादरी हैं तो अपने अनुयायियों को नस्लवाद के बारे में जागरुक करें और ज़रूरत पड़े तो हस्तक्षेप करके नस्लवाद रोकें.
अगर आप एक रियल एस्टेट एजेंट हैं तो अपने क्लायंट को को अलग-अलग आबादी वाले इलाक़े में न लेकर जाएं.
अपने आप को शिक्षित करें
डॉ. टाटूम कहती हैं कि आप नस्लवाद की प्रक्रिया को तब तक नहीं रोक सकते जब तक आप अपने आप को इस बारे में शिक्षित नहीं करते.
हाल ही में विशेषज्ञों ने सोशल मीडिया पर ऐसी किताबों की सूची जारी की है जो नस्लवाद के ख़िलाफ़ सोच विकसित करती हैं.
अमरीका में किताबों की बेस्ट सेलिंग लिस्ट में नस्लवाद के ख़िलाफ़ लिखी गईं किताबें पहले कभी इतनी बड़ी संख्या में शामिल नहीं हुई थीं. इतिहासकार इब्राहिम एक्स केंडी की लिखी किताब 'हाऊ टू बी एंटी रेसिस्ट' चर्चित हो रही है. रोबिन डी एंजेलो की लिखी किताब 'व्हाइट फ्रेजीलिटी' भी इस सूची में है.
डॉ. टाटूम की 1997 में लिखी किताब 'व्हाइ आर ऑल द ब्लैक किड्स सिटिंग टुगेदर इन कैफ़ेटेरिया? एंड अदर कंवरसेसंस अबाउट रेस' भी इन किताबों में शामिल है.
नस्लवाद के पीड़ितों को सुनें
नस्लवाद पर लिखी कई किताबों की लेखिका हैरी मूर कहती हैं कि जो लोग अपने विशेषाधिकार को पहचानते हैं उन्हें उन लोगों को भी सुनना चाहिए जो नस्लवाद के पीड़ित हैं. मूर नस्लवाद के ख़िलाफ़ बनी टीम शोइंग अप फॉर रेसियल जस्टिस के साथ भी जुड़ी हैं.
बीबीसी से बात करते हुए मूर कहती हैं, कुछ देर के लिए अपने डर को किनारे रखकर उन लोगों को सुने जिन पर नस्लवादी हमले हुए हैं और ऐसी दुनिया की कल्पना करें जैसी दुनिया वो चाहते हैं.
वो दरअसल अच्छी शिक्षा, रहने के लिए अच्छी जगह, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं चाहते हैं.
मूर का संगठन गोरे लोगों को नस्लवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में शामिल करता है. वो अपने आप को श्रेष्ठता के ख़िलाफ़ एक बड़े अभियान का हिस्सा मानती हैं.
मूर कहती हैं कि आमतौर पर विशेष तबके से ताल्लुक रखने वाले लोग अपने आप को समस्या का हिस्सा नहीं मानते हैं. वो कहती हैं कि ऐसी सोच हमें अपने आप को समाधान का हिस्सा बनने से भी दूर रखती है.
मूर कहती हैं, ''हमें इस सोच को पैदा करना है कि गोरे लोग मदद कर रहे हैं. हम ऐसा अपने लिए एक बेहतर दुनिया बनाने के लिए कर रहे हैं.''
अकेले रहकर ये लड़ाई ना लड़ें
मूर कहती हैं कि दूसरों की आवाज़ से आवाज़ मिलाकर आप नस्लवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई को मज़बूत कर सकते हैं. फिर चाहें ये किसी प्रदर्शन का हिस्सा होकर हो या किसी संस्था के साथ जुड़कर.
वो कहती हैं, ''हमें व्यक्तिगत प्रयासों से अधिक काम करना होगा और संस्थागत प्रयास ही असली बदलाव ला सकते हैं. किसी नस्लवादी समुदाय से जुड़ें जो रोज़ाना के नस्लवाद के ख़िलाफ़ लड़ रहा हो.'
प्रोफ़ेसर रंगनाथन कहती हैं, 'विशेषाधिकार रखने वाले समूहों के लिए ये बहद ज़रूरी है कि वो नस्लवाद के बारे में मुश्किल सवालों और विषयों पर चर्चा में शामिल हों.'
वो कहती हैं कि नस्लवादी तनाव अमरीका के बाहर भी है और ये सिर्फ गोरे और काले रंग तक सीमित नहीं हैं.
वो तर्क देती हैं, 'भारत में ऊंचे वर्ण के लोग अमरीका में नस्लवाद को तो बहुत जल्दी खारिज कर देते हैं लेकिन अपनी जाति व्यवस्था में व्याप्त भेदभाव पर बात नहीं करते हैं. '
प्रोफ़ेसर रंगनाथन कहती हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग नस्लवाद के ख़िलाफ़ उठी लहर को और मज़बूत कर सकता है.
वो कहती हैं कि अगर इतिहास पर गौर करें तो अफ़्रीका में फॉलिस्ट अभियान के दौरान छात्रों ने रंगभेद से जुड़े प्रतीकों को गिरा दिया था. हाल ही में अमरीका, ब्रिटेन, बेल्ज़ियम और अन्य यूरोपीय देशों में ओपनिवेशिक काल का जश्न मनाने वाले पुतलों को गिराए जाने से पहले भी ऐसा हो चुका है.'
जैसे-जैसे ब्लैक लाइव्स मैटर अभियान दुनियाभर में गूंजा, लोग एकजुट हुए और विदेशों में आवाजें उठीं वैसे-वैसे अमरीका समेत कई देशों में नस्लवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई मज़बूत हुई है.
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