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भारत और ईरान का चाबहार प्रोजेक्ट क्या खटाई में गया?
- Author, गुरप्रीत सैनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मंगलवार को ये ख़बर आई कि ईरान ने चाबहार रेल प्रोजेक्ट से भारत को अलग कर दिया है और इसकी वजह है भारत से फंड मिलने में देरी. ईरान और भारत के बीच चार साल पहले चाबहार पोर्ट से अफ़ग़ानिस्तान सीमा पर ज़ाहेदान तक रेल लाइन बिछाने को लेकर समझौता हुआ था.
अख़बार द हिंदू की एक ख़बर के मुताबिक़ ईरान ने अपने आप ही इस प्रोजेक्ट को पूरा करने का फ़ैसला लिया है और इस पर काम शुरू भी कर दिया है. 628 किलोमीटर लंबे इस रेल मार्ग को बिछाने का काम बीते हफ्ते शुरू हो गया है.
ईरान के यातायात और शहरी विकास मंत्री मोहम्मद इस्लामी ने इसका उद्घाटन किया है. ईरानी अधिकारियों ने द हिंदू अख़बार को बताया है कि ये पूरा प्रोजेक्ट मार्च 2022 तक पूरा कर लिया जाएगा. इसके लिए अब ईरान के नेशनल डेवलपमेंट फंड का इस्तेमाल किया जाएगा.
चाबहार परियोजना भारत के लिए रणनीतिक तौर पर एक महत्वपूर्ण परियोजना रही है जिसके तहत भारत, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के साथ मिलकर एक अंतरराष्ट्रीय यातायात मार्ग स्थापित करना चाहता है.
भारत इस रास्ते का इस्तेमाल अफ़ग़ानिस्तान तक पहुंचने के लिए करना चाहता है, लेकिन पाकिस्तान इस परियोजना को लेकर चिंतित रहा है.
ईरान के परियोजना से हाथ खींजने की ख़बर ऐसे समय आई है जब भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ा हुआ है और हाल ही में चीन और ईरान के बीच चार सौ अरब डॉलर के रणनीतिक निवेश को लेकर समझौता हुआ है.
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ईरान करता रहा इंतज़ार
चार साल पहले जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान का दौरा किया था तब इस रेल परियोजना को लेकर समझौता हुआ था, भारत की ओर से इंडियन रेलवेज़ कंस्ट्रक्शन लिमिटेड (इरकॉन) को इस रेल ट्रेक के निर्माण में शामिल होना था. ये भारत-अफ़ग़ानिस्तान और ईरान के बीच हुआ समझौता था.
इरकॉन ने ईरानी रेल मंत्रालय के साथ एमओयू साइन किया था. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, इरकॉन ने इस रेल प्रोजेक्ट के लिए सभी सेवाएं, सुपरस्ट्रक्टर वर्क और आर्थिक सहयोग (करीब $1.6 अरब) देने का वादा किया था.
जानकारों के मुताबिक़ इरकॉन के इंजीनियर कई बार साइट पर गए और ईरानी रेलवे ने तैयारी भी कर ली थी, लेकिन भारत ने कभी काम शुरू नहीं किया. जानकारों का मानना है कि इसके पीछे ज़ाहिर तौर पर अमरीका की ओर से प्रतिबंध लगाए जाने का डर था.
हालांकि अमरीका ने चाबहार बंदरगाह और ज़ाहेदान तक रेल लाइन के काम को लेकर प्रतिबंधों में छूट दे दी थी, लेकिन जानकारों के मुताबिक़, इक्विपमेंट सप्लायर और पार्टनर मिलने में दिक्कत आ रही थी क्योंकि अमरीकी प्रतिबंधों के डर से कोई भी इस काम में जुड़ना नहीं चाहता था.
मध्य पूर्व मामलों के जानकार क़मर आग़ा कहते हैं कि ईरान की चीन से बढ़ती हुई दोस्ती भी भारत के इस प्रोजेक्ट के अलग होने का एक कारण बना.
क़मर आग़ा ने कहा," पहले ही लग रहा था कि ये प्रोजेक्ट हाथ से निकल जाएगा, क्योंकि भारत की तरफ से काफी देरी हो रही थी, ईरान बार-बार इसकी शिकायत कर रहा था."
भारत का बड़ा रणनीतिक नुकसान
दिल्ली के जवाहर लाल विश्वविद्यालय में इंटरनेशनल स्टडीज़ के डीन प्रोफेसर अश्विनी मोहापात्रा कहते हैं कि भारत के लिए ये बड़ा नुकसान है, क्योंकि ये प्रोजेक्ट रणनीतिक रूप से काफी अहम था.
भारत, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान ने मई 2016 में एक अंतरराष्ट्रीय यातायात मार्ग बनाने का निर्णय लिया था, और तब से चाबहार बंदरगाह पर काम चल रहा है.
भारत के लिए यह मध्य एशिया, रूस और यहां तक कि यूरोप तक पहुंचने का प्रयास था. चाबहार बंदरगाह को रेल नेटवर्क से भी जोड़ने का प्रस्ताव था और इसमें भारत भी मदद करने वाला था. साथ ही चाबहार बंदरगाह की क्षमता भी बढ़ाए जाने की बात थी.
भारत इस रास्ते का इस्तेमाल अफ़ग़ानिस्तान तक पहुंचने के लिए भी करना चाहता था. वैसे भारत से अफ़ग़ानिस्तान पहुंचने का आसान तरीका तो पाकिस्तान के रास्ते है, लेकिन दोनों देशों के बीच संबंध लंबे दौर से अच्छे नहीं हैं और दोनों के दरवाज़े एक-दूसरे के लिए एक तरह से बंद हैं. इसलिए अरब सागर के किनारे बाईपास लेने की कोशिश की जा रही थी.
इस चाबहार पोर्ट को पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट का जवाब भी माना जा रहा था. ग्वादर पोर्ट चाबहार से 70 किलोमीटर ही दूर है.
चीन के हाथ जान की आशंका
ये आशंका भी है कि चीन के साथ नज़दीकी बढ़ने के चलते ईरान चाबहार बंदरगाह चीन को लीज़ पर दे सकता है. यानी डर है कि चाबहार बंदरगाह पूरी तरह से भारत के हाथ से जा सकता है.
हालांकि ईरानी अधिकारियों ने मीडिया से बातचीत में इस तरह की खबरों को खारिज किया है.
लेकिन ईरान ने खुद ही पिछले साल चीनी द्वारा चलाए जा रहे पाकिस्तानी ग्वादर पोर्ट और चाबहार के बीच टाई-अप का प्रस्ताव दिया था. साथ ही चाबहार ड्यूटी फ्री ज़ोन के लिए भी ऑफर दिया था.
अश्विनी मोहपात्रा का मानना है कि भारत को पैसा खर्च कर तुरंत रेल लाइन बनानी चाहिए थी लेकिन उसने अमरीका का साथ देकर ऐसा नहीं किया.
ईरान के लिए पूर्व राजदूत के सी सिंह कहते हैं, ईरान सोच रहा है कि जब वो फंसा हुआ है, उसकी अर्थव्यवस्था को अमरीका ने पूरी तरह जकड़ा हुआ है, तब आप उसकी मदद नहीं कर रहे. फिर वो कैसे आपको चाबहार का सेफ़ खोलकर दे दे. अब अगर चीन उसके साथ लंबा समझौता कर रहा है, उसे पैसे दे रहा है तो वो चीन के साथ क्यों नहीं जाएगा."
उनका कहना है कि "ऐसे प्रोजेक्ट तभी बनते हैं जब दोनों के बीच रिश्ते सही हों. अगर ईरान महसूस करता है कि आप अमरीका से डरकर उससे बात नहीं कर रहे तो वो आपके साथ प्रोजेक्ट क्यों करेंगे. अगर उनको चीन का पैसा मिल गया है, तो चीन के पैसे से पूरा कर लेंगे प्रोजेक्ट."
अब क्या करेगा भारत
अश्विनी मोहपात्रा का मानना है कि अब अमरीका को भारत का साथ देना चाहिए.
वो कहते हैं,"भारत को अमरीका को पूछना चाहिए कि अब वो क्या करे. कहना चाहिए कि अब हम फंस गए हैं, आपके चलते हमने इस प्रोजेक्ट के लिए पैसा नहीं दिया."
माना जा रहा है कि अब भारत के लिए आगे की राह और चुनौती भरी होगी.
अश्विनी मोहपात्रा कहते हैं कि चीन ने अब जिस तरह से मध्य पूर्व में ईरान के ज़रिए एंट्री मारी है, उस चुनौती से भारत अकेला नहीं लड़ सकता. उसको अब अमरीका, भारत, इसराइल, सऊदी अरब जैसे देशों को मिलकर काउंटर करना चाहिए. उनका मानना है कि ये सामूहिक रणनीति होनी चाहिए.
वहीं कमर आग़ा का मानना है कि ये सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि अमरीका समेत पश्चिमी देशों के लिए भी चिंता का विषय है क्योंकि अब पूरा ग्वादर से लेकर चाबहार और बंदर-ए-जस्क पोर्ट, जो चाबहार क़रीब 350 किलोमीटर दूर है, उन सब पर धीरे-धीरे चीन का कब्ज़ा होता रहेगा.
अश्विनी मोहपात्रा का मानना है कि एक उम्मीद ये हो सकती है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन से इस रुख में कोई बदलाव आए. उनका कहना है कि ईरान में सर्वोच्च नेता आयतुल्ला ख़मेनेई की सेहत ठीक नहीं रहती है और वहां इस बात को लेकर बहस छिड़ी रहती है कि ईरान में पश्चिम के जैसा लोकतंत्र आना चाहिए या पुराना धार्मिक नेताओं की सत्ता बनी रहनी चाहिए. अगर वहां ये बदलाव होते हैं तो चीन के प्रति रुख बदल सकता है.
वहीं कमर आग़ा का मानना है कि भारत अब भी ईरान को अपने एक मित्र देश के रूप में देखता है.
वो कहते हैं, "भारत के साथ ईरान के ऐतिहासिक रिश्ते हैं. भारत की कोशिश होगी कि वो अच्छे रिश्ते बने रहें और चाबहार बंदरगाह का काम चलता रहे और वो आगे इस प्रोजेक्ट के साथ जुड़ा रहे."
उनका मानना है कि हो सकता है इरकॉन कंपनी बाद में किसी वक्त इस प्रोजेक्ट को ज्वाइन कर ले.
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