नेपाल-भारत विवाद में ओली और प्रचंड के बीच मतभेद से बढ़ा तनाव

    • Author, तारेंद्र किशोर
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने आरोप लगाए हैं कि काठमांडू और नई दिल्ली में उन्हें हटाने की साज़िश रची जा रही है.

नेपाल के एक प्रमुख समाचार पत्र कठमांडू पोस्ट के मुताबिक़ प्रधानमंत्री ओली का कहना है, “अभी चल रहीं बौद्धिक चर्चाएँ, नई दिल्ली से आ रही मीडिया रिपोर्ट, काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास की गतिविधियाँ और अलग-अलग होटलों में चल रहीं बैठकों से समझना मुश्किल नहीं है कि कैसे सक्रिय तौर पर मुझे हटाने की कोशिशें हो रही हैं.”

ये अरोप उन्होंने तब लगाए हैं जब उनकी अपनी ही नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) में उन्हें प्रधानमंत्री के पद से हटाने की मांग ज़ोर पकड़ रही है.

हालाँकि हाल ही में नेपाल की संसद में नए नक़्शे को पास कराने के मुद्दे पर पार्टी और संसद में उन्हें पूरा समर्थन मिला था. इस नए नक़्शे में कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को नेपाल के भूभाग के अंदर दिखाया गया है जबकि ये इलाक़े पहले से भारत के नक़्शे में शामिल रहे हैं.

एनसीपी के चेयरमैन कमल दहल प्रचंड और प्रधानमंत्री केपी ओली के बीच हाल के दिनों में मतभेद होने की ख़बरें आई हैं. पार्टी की स्टैंडिंग कमेटी की दो बैठकों में शामिल नहीं होने की वजह से ओली को पार्टी सदस्यों की ओर से आलोचना झेलनी पड़ी.

साथ ही उनके इस्तीफ़े की भी मांग उठी. तो क्या नेपाल एक बार फिर अंदरूनी राजनीतिक संकट का सामना कर रहा है.

नेपाल में राजनीतिक स्थायित्व का संकट

नेपाल में लंबे संघर्ष की बदौलत राजशाही के बाद लोकतंत्र की स्थापना हुई है. नेपाल में 20 सितंबर 2015 के बाद नया संविधान लागू हुआ. हालाँकि 2007 में ही अंतरिम संविधान बनने के बाद नेपाल में राजतंत्र का ख़ात्मा हो गया था.

नेपाल में इस नई व्यवस्था के बाद से राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति कमोबेश बनी ही हुई है. केपी शर्मा ओली इस नई व्यवस्था के अंतर्गत सुशील कोईराला को हराकर अक्तूबर, 2015 में पहले चुने गए प्रधानमंत्री बने थे.

लेकिन इसके कुछ ही महीनों के बाद अगस्त 2016 में पुष्प कमल दहल प्रचंड नेपाल के प्रधानमंत्री बने. सिर्फ़ नौ महीने के बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया और नेपाली कांग्रेस पार्टी के शेर बहादुर देउबा प्रधानमंत्री बने. शेर बहादुर देउबा के बाद फिर से केपी शर्मा ओली फरवरी 2018 में नेपाल के प्रधानमंत्री चुने गए.

पिछले क़रीब साढ़े चार सालों में चार बार नेपाल के प्रधानमंत्री बदल चुके हैं.

नेपाल के इस राजनीतिक संकट पर पूर्व राजनयिक विष्णु प्रकाश कहते हैं, “ये उनकी अंदरूनी राजनीति है. नेपाल में कई पार्टियाँ हैं और उन पार्टियों के अंदर मतभेद हैं. विकास हो नहीं रहा है. नेपाल एक ऐसा देश है जिसके पास सोने की खान है. वो दक्षिण एशिया के समृद्ध देशों में से एक बन सकता है. नेपाल के पास ऊर्जा पैदा करने की जो क्षमता है, उसमें से 40 हज़ार मेगावाट का उत्पादन अब तक हो जाना चाहिए था लेकिन महज 1000 मेगावाट का ही उत्पादन हो पाया है. वहाँ इस बात पर राजनीति की जाती है कि भारत हमारा पानी चुरा लेगा या हमारा शोषण करेगा. पानी सदियों से समुद्र में जाकर बर्बाद हो रहा है तो उसे लेकर कोई फिक्र नहीं है. इस तरह की राजनीति को लेकर अफ़सोस होता है. कई नेता देश हित की बजाए अपना हित देखने में लगे हुए हैं तो यह एक नेपाल की अंदरूनी समस्या है. इसे नेपाली लोग ही ठीक कर सकते हैं और कोई नहीं.”

नेपाल में इस मौजूदा राजनीतिक संकट पर वरिष्ठ पत्रकार और नेपाल की राजनीति पर लंबे समय से नज़र रखने वाले आनंद स्वरूप वर्मा कहते हैं, “नेपाल में अभी बहुमत से चुनी हुई सरकार है. मौजूदा जो संकट नेपाल में पैदा हुआ है वो किसी विपक्षी दल की ओर से पैदा किया गया संकट नहीं है. यह पार्टी के अंदर पैदा हुआ संकट है. यह सत्ता की खींचतान का संकट है. नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के शीर्ष नेता स्वार्थ के दलदल में धंस चुके हैं. सारी लड़ाई अब इस बात को लेकर है कि पार्टी का अध्यक्ष कौन होगा और प्रधानमंत्री कौन होगा. केपी ओली अध्यक्ष भी हैं और प्रधानमंत्री भी हैं. हालाँकि पार्टी के संयुक्त अध्यक्ष प्रचंड हैं.”

आनंद स्वरूप बताते हैं कि पार्टी के अंदर इस अंदरूनी खींचतान की एक वजह यह भी है कि प्रचंड के मुताबिक़ पार्टी के अंदर एक समझ थी कि ढाई साल केपी शर्मा ओली प्रधानमंत्री रहेंगे और ढाई साल वो प्रधानमंत्री पद पर रहेंगे. तो उस हिसाब से अब प्रचंड को प्रधानमंत्री बनाया जाना चाहिए.

वो आगे कहते हैं नेपाल की जनता लंबे समय से सत्ता का यह खींचतान देख रही है. अब वहाँ की जनता में अंदर ही अंदर खलबलाहट पैदा हो रही है जिसका किसी भी समय एक आंदोलन के रूप में विस्फोट हो सकता है.

भारत और चीन की भूमिका

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने उनकी सत्ता को अस्थिर करने के लिए भारत पर निशाना साधा है. उनके इस बयान को नेपाल में चीन के बढ़ते हुए प्रभाव के तौर पर भी देखा जा रहा है.

इस पर पूर्व राजनयिक विष्णु प्रकाश कहते हैं, “यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर काफ़ी मतभेद हैं. तो वैसी स्थिति में भारत का हौवा खड़ा करना एक भावनात्मक चीज़ है. ये उन्होंने किया है. ये बहुत स्पष्ट है कि पिछले कई हफ़्तों से यह बात सामने आ रही थी कि चीन के राजदूत काफ़ी सक्रिय हैं. केपी ओली का रुझान भी मालूम है तो यह समझना कोई रॉकेट साइंस नहीं है कि बाहरी कारक भी हैं. लेकिन यह अच्छा नहीं हुआ है."

वो आगे कहते हैं, “उन्हें छींक भी आती होगी तो वो शायद भारत की तरफ़ से ही उन्हें जुकाम भेजा जाता होगा. इसमें कुछ नहीं किया जा सकता है. अब देखिए कि उन्होंने सदियों से सुलझे हुए मामले को संविधान संशोधन करके विवादित बनाया. किसी को दोष देने के मक़सद से यह सब किया जाता है. पाकिस्तान में भी ऐसा ही है कुछ भी हो तो भारत का किया हुआ है. तो यह उनकी राजनीति है. लेकिन नुक़सान तो उनके अपने देश और उनके लोगों का ही होता है.”

आनंद स्वरूप वर्मा इस बारे में कहते हैं, “नेपाल की राजनीति में भारत की 1950 से भूमिका रही है लेकिन हाल के सालों में चीन ने भारत को नेपाल में थोड़ा दरकिनार करना शुरू कर दिया है. इसके लिए कुछ हद भारत की ज़िम्मेदारी बनती है. 2015 में भारत ने नेपाल को लेकर आर्थिक नाकेबंदी नहीं की होती और उनके संविधान को लेकर नाराज़गी जाहिर नहीं की होती तो शायद चीन को नेपाल में यह मौक़ा नहीं मिलता. यह भारत की ओर से एक कूटनीतिक ग़लती थी.”

ओली की भारत विरोधी छवि

इस आर्थिक नाकेबंदी के बाद केपी शर्मा ओली की सरकार ने चीन के साथ समझौता किया था. इसके बाद उनकी नौ महीने पुरानी सरकार गिर गई थी और प्रचंड की सरकार सत्ता में आई थी. उस वक़्त भारत पर ये आरोप लगाए गए थे कि ओली को प्रधानमंत्री पद से हटाने में भारत की भूमिका रही है.

इस पर आनंद स्वरूप कहते हैं, “भारत और खासतौर पर नेपाल की मीडिया में उस वक़्त यह बात खुलकर कही गई थी.”

वो आगे बताते हैं, “हालाँकि नेपाल की कांग्रेस पार्टी को ही भारत का समर्थक माना जाता रहा है लेकिन पिछले कुछ सालों से देखा जा रहा है कि प्रचंड का रुझान भारत की ओर है. प्रचंड जो पहले घोर भारत विरोधी माने जाते थे अब उनकी छवि भारत समर्थक की हो गई है और ओली जो भारत समर्थक माने जाते थे उनकी छवि भारत विरोधी हो गई है. ये वहाँ की राजनीतिक परिस्थतियाँ हैं, जिनसे इस तरह की धारणा पैदा हुई है."

2018 में दोबारा से प्रधानमंत्री बनने के बाद टाइम्स ऑफ़ इंडिया को दिए एक इंटरव्यू में केपी ओली ने कहा था कि वो अतीत में फँसे रहने की बजाए भविष्य के लिए सबक लेंगे लेकिन लगता है कि भारत के साथ उनका यह तनावपूर्ण संबंध फ़िलहाल जारी रहने वाला है.

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