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हॉन्ग कॉन्ग पर चीन की वादाख़िलाफ़ी पर राष्ट्रपति ट्रंप का एलान
हॉन्ग कॉन्ग का विशेष दर्जा ख़त्म करने के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फ़ैसले पर प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं. हॉन्ग कॉन्ग की सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने इसकी आलोचना की है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़ हॉन्ग कॉन्ग के सुरक्षा मंत्री जॉन ली ने संवाददाताओं से कहा कि उनकी सरकार को डराया नहीं जा सकता है और वे नए क़ानून को लेकर आगे बढ़ते रहेंगे.
जॉन ली ने कहा, "मुझे नहीं लगता है कि वे हॉन्ग कॉन्ग को डराने में कामयाब हो पाएंगे क्योंकि हम जो कर रहे हैं, हम उस पर यकीन रखते हैं."
हॉन्ग कॉन्ग में नया सुरक्षा क़ानून लागू करने को लेकर चीन को सबक सिखाने के इरादे से राष्ट्रपति ट्रंप ने इसका विशेष दर्जा ख़त्म करने की बात कही है.
इससे पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा था कि हॉन्ग कॉन्ग को दिए जा रहे आर्थिक विशेषाधिकारों का औचित्य ख़त्म हो गया है. इस फ़ैसले से कुछ अधिकारियों पर पाबंदी का ख़तरा भी मंडरा रहा है.
ट्रंप ने क्या कहा और हॉन्ग कॉन्ग में प्रतिक्रिया
हॉन्ग कॉन्ग के न्यायमंत्री टेरीज़ा चेंग का कहना है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने जिस आधार पर ये फ़ैसला लिया है, वो पूरी तरह से ग़लत है. उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून की ज़रूरत क़ानूनी थी और ऐसा करना ज़रूरी था.
हाल के दिनों में राष्ट्रपति ट्रंप चीन को लेकर इतने मुखर कभी नहीं देखे गए. उन्होंने कहा कि हॉन्ग कॉन्ग की स्वायत्ता को लेकर किया गया वादा चीन ने तोड़ दिया है और अब इस इलाके को अमरीका की तरफ़ से मिलने वाली आर्थिक सहूलियतों की कोई वजह नहीं रह गई है.
ट्रंप ने कहा, "हमने बाक़ी चीन की तुलना में हॉन्ग कॉन्ग को एक अलग यात्रा क्षेत्र के तौर पर मिलने वाले विशेष दर्जे को ख़त्म करने के लिए कदम उठाएंगे. हॉन्ग कॉन्ग की आज़ादी का गला घोंटने के लिए जिम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ भी अमरीका प्रतिबंध लगाएगा."
चीन से आने वाले छात्रों पर अमरीका का फ़ैसला
इस बीच, राष्ट्रपति ट्रंप ने चीन से आने वाले उन छात्रों और शोधकर्ताओं के अमरीका आने पर रोक लगा दी है जिनके संबंध पीपुल्स लिबरेशन आर्मी से हैं. इस फ़ैसले का मक़सद ये बताया जा रहा है कि ट्रंप प्रशासन अमरीका की बौद्धिक संपदा और टेक्नॉलॉजी छात्रों के जरिए हासिल करने की चीन की कोशिश को नाकाम करना चाहता है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ ट्रंप प्रशासन ने ये फ़ैसला ऐसे समय में लिया है, जब अमरीका और चीन के बीच कारोबार और कोरोना वायरस की शुरुआत कहां से हुई, हॉन्ग कॉन्ग में चीन के सख़्त रवैये और साउथ चाइना सी में चीन आक्रामक सैनिक गतिविधियों जैसे मुद्दों को लेकर विवाद बढ़ रहा है.
शुक्रवार को चीनी छात्रों के अमरीका आने पर लगाई गई रोक की घोषणा करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, "संवेदनशील अमरीकी तकनीक और बौद्धिक संपदा हासिल करने के लिए सुनियोजित तरीके से बड़े पैमाने पर चलाई जा रही गतिविधियों में चीन शामिल है. वो इसके जरिए अपनी सेना का आधुनिकीकरण करना चाहता है."
उन्होंने कहा कि चीन का ये कदम अमरीका के आर्थिक हितों और अमरीकी लोगों की सुरक्षा के लिए ख़तरा है.
क्रिस पैटन का बयान
हॉन्ग कॉन्ग में आख़िरी ब्रितानी गवर्नर रहे क्रिस पैटन का कहना है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग कम्युनिस्ट पार्टी में अपनी स्थिति को लेकर इस कदर नर्वस हैं कि वो एक नए शीत युद्ध का जोखिम उठा रहे हैं. इतना ही नहीं वे एशिया के महत्वपूर्ण आर्थिक केंद्र के तौर पर हॉन्ग कॉन्ग की हैसियत को भी ख़तरे में डाल रहे हैं.
क्रिस पैटन ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा कि शी जिनपिंग जिस तरह से हॉन्ग कॉन्ग को लेकर सख़्त रवैया अपना रहे हैं, उससे शहर में आने वाला विदेशी निवेश बाहर का रुख कर सकता है. हॉन्ग कॉन्ग चीन में बड़े पैमाने पर आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के दरवाज़े की तरह है.
"इसका मतलब ये हुआ कि एशिया के प्रमुख आर्थिक केंद्र की हैसियत के साथ-साथ एक मुक्त समाज की पहचान रखने वाले हॉन्ग कॉन्ग के भविष्य पर भी सवालिया निशान लग जाएगा. बहुत से लोग हॉन्ग कॉन्ग छोड़कर जाना चाहेंगे."
हॉन्ग कॉन्ग का नया सुरक्षा क़ानून क्या कहता है?
सबसे पहले तो चीन ने अपनी रबर स्टांप पार्लियामेंट में इस प्रस्तावित क़ानून का मसौदा पेश किया, जिस पर 28 मई को संसद में वोटिंग हुई और ये पारित कर दिया गया. इसके बाद ही ये प्रस्ताव क़ानून की शक्ल ले पाएगा.
हालांकि अभी तक इस प्रस्तावित क़ानून के बारे में पूरी जानकारी सामने नहीं आई है पर लोगों की कई चिंताएं हैं. जो बातें अभी तक हमें मालूम हैं, उसके अनुसार...
देश से रिश्ता तोड़ना, केंद्रीय सरकार की सत्ता या अधिकार को कमज़ोर करना अपराध माना जाएगा. लोगों को डराना धमकाना या उनके ख़िलाफ़ हिंसा का इस्तेमाल चरमपंथ के अपराध के तहत आएगा. हॉन्ग कॉन्ग के मामलों में दखलंदाज़ी करने वाली विदेशी ताक़तों की गतिविधियां भी अपराध की श्रेणी में आएंगी.
प्रस्तावित क़ानून के जिस प्रावधान को लेकर लोग ज़्यादा चिंतित हैं, वो ये है कि चीन हॉन्ग कॉन्ग में ऐसी एजेंसियों की गठन कर सकता है जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार होंगी. इसका मतलब ये हुआ कि हॉन्ग कॉन्ग में चीन की अपनी क़ानून लागू करने वाली एजेंसी होंगी जबकि शहर में पहले से ही ऐसी एजेंसियां मौजूद हैं.
चीन ऐसा क्यों कर रहा है?
साल 1997 में हॉन्ग कॉन्ग ब्रितानियों के नियंत्रण से निकलकर चीन के पास आया था. लेकिन इसके लिए दोनों देशों के बीच एक अनूठा समझौता हुआ था. हॉन्ग कॉन्ग के लिए एक छोटे से संविधान की नींव रखी गई थी जिसे 'बेसिक लॉ' यानी बुनियादी क़ानून भी कहते हैं.
इसके साथ ही चीन में 'एक देश, दो सिस्टम' की कथित अवधारणा का जन्म हुआ. माना गया कि इस बुनियादी क़ानून की वजह से हॉन्ग कॉन्ग के लोगों को कुछ ख़ास मुद्दों पर आज़ादी हासिल रहेगी. वे जनसभा कर सकेंगे, उन्हें अपनी बात कहने और रखने का हक़ होगा और वहां एक स्वतंत्र न्यायपालिका होगी.
साथ ही कुछ ऐसे लोकतांत्रिक अधिकार भी होंगे जो आम चीनी लोगों को मयस्सर नहीं हैं. इसी समझौते के तहत हॉन्ग कॉन्ग को अपना राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लागू करने का हक़ भी हासिल है. 'बेसिक लॉ' के अनुच्छेद 23 में इसके लिए प्रावधान किया गया है.
लेकिन ये प्रावधान इतना अलोकप्रिय था कि इसका कभी इस्तेमाल ही नहीं किया गया. सरकार ने एक बार पहले भी साल 2003 में कोशिश की थी. लेकिन तब पांच लाख लोग सड़कों पर उतर आए थे और सरकार को अपना क़दम वापस खींचना पड़ा था.
पिछले साल एक प्रत्यर्पण क़ानून को लेकर भी महीनों विरोध प्रदर्शन हुए और हिंसा भड़क गई. आगे चलकर इस विरोध प्रदर्शन ने भी चीन विरोधी और लोकतंत्र समर्थक स्वरूप ले लिया था. इसलिए चीन नहीं चाहता कि वहां दोबारा ऐसा हो.
हॉन्ग कॉन्ग के लोग डरे हुए क्यों हैं?
हालांकि अभी तक इस प्रस्तावित क़ानून को अमलीजामा नहीं पहनाया गया है, इसलिए इसके प्रावधानों को लेकर फ़िलहाल पक्के तौर पर कुछ कहना मुश्किल है. लेकिन फिर भी हॉन्ग कॉन्ग के लोगों को डर है प्रस्तावित क़ानून की वजह से उनके नागरिक अधिकार छिन सकते हैं.
चीन मामलों के जानकार विली लैम चिंता जताते हैं कि इस क़ानून के तहत लोगों को चीन की आलोचना के अपराध में सज़ा दी जा सकती है. चीन के मुख्य भूभाग में ऐसा होता है.
लोगों को डर है कि इससे उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विरोध प्रदर्शन के अधिकार का हनन होगा. आज के हॉन्ग कॉन्ग में ये क़ानूनी हक़ है. चीन में इस तरह की गतिविधियां केंद्रीय सरकार की सत्ता या अधिकार को कमज़ोर करने के दायरे में आती हैं.
जोशुआ वॉन्ग के जैसे अहम एक्टिविस्ट विदेशी सरकारों के सामने हॉन्ग कॉन्ग में लोकतंत्र समर्थक मुहिम की मदद करने का मुद्दा उठाते रहे हैं. सालों की पैरवी और कोशिश के बाद अमरीका ने हॉन्ग कॉन्ग ह्यूमन राइट्स एंड डेमोक्रेसी एक्ट पास किया था. कुछ लोगों को डर है कि आने वाले समय में ऐसे आंदोलन अपराध की श्रेणी में आ जाएंगे.
डर की और वजहें भी हैं. कई लोगों की आशंका है कि हॉन्ग कॉन्ग की न्याय व्यवस्था भी चीन जैसी हो जाएगी.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ हॉन्ग कॉन्ग में लॉ के प्रोफ़ेसर जोहानेस चान कहते हैं, "राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े लगभग सभी मामलों में बंद दरवाज़ों के पीछे सुनवाई होती है. ये कभी नहीं बताया जाता है कि क्या इलज़ाम हैं और क्या सबूत हैं. और राष्ट्रीय सुरक्षा की संकल्पना भी इतनी अस्पष्ट है कि आप किसी भी गतिविधि को इसके दायरे में ला सकते हैं."
लोगों के डर की एक और वजह भी है. बहुत से लोगों को ये लगता है कि हॉन्ग कॉन्ग में जिस किस्म की आज़ादी आज की तारीख में हासिल हैं, अगर उसमें कटौती की जाती है तो एक आर्थिक और व्यापारिक केंद्र के रूप में हॉन्ग कॉन्ग का आकर्षण कमज़ोर पड़ जाएगा.
पर्यवेक्षकों का कहना है कि हॉन्ग कॉन्ग में न केवल राजनीतिक भविष्य बल्कि आर्थिक भविष्य भी दांव पर लगा हुआ है.
चीन के पास क्या रास्ता है?
'बेसिक लॉ' के अनुसार चीन में लागू क़ानून जब तक कि तीसरी अनुसूची में दर्ज न हो जाएं, हॉन्ग क़ान्ग में नहीं लागू हो सकते हैं. वहां पहले से कुछ क़ानून दर्ज हैं लेकिन उनमें ज़्यादातर प्रावधान ग़ैर-विवादास्पद थे और विदेशी नीति के विषयों से जुड़े हुए हैं.
हालांकि चीन के पास और भी रास्ते हैं. चीन के मुख्य भूभाग में लागू क़ानून हॉन्ग कॉन्ग में 'डिक्री' यानी क़ानून का दर्जा रखने वाले आधिकारिक आदेश के ज़रिए लागू किए जा सकते हैं. इसका मतलब हुआ कि ऐसा करने की सूरत में हॉन्ग कॉन्ग की संसद के अधिकार को नज़रअंदाज़ कर दिया जाएगा.
हॉन्ग कॉन्ग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी कैरी लैम ने पहले ही कह रखा है कि वो इस क़ानून को जल्द से जल्द पारित कराने के लिए चीन की सरकार का सहयोग करेंगी. आलोचकों का कहना है कि ये 'एक देश, दो सिस्टम' की अवधारणा का सरासर उल्लंघन है जो हॉन्ग कॉन्ग के लिए काफी अहमियत रखता है.
प्रोफ़ेसर चान का कहना है कि प्रस्तावित क़ानून हॉन्ग कॉन्ग के 'बेसिक लॉ' के अनुच्छेद 23 का भी उल्लंघन करता है. वो कहते हैं, "ऐसा लगता है कि चीन 'बेसिक लॉ' को अपनी मर्जी से पारिभाषित कर सकता है और ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं."
चीन जिस क़ानून को हॉन्ग कॉन्ग में लागू करना चाह रहा है, उसके मसौदे से ये संकेत मिलते हैं कि हॉन्ग कॉन्ग की सरकार को अनुच्छेद 23 के तहत अभी भी अलग से एक राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लाने की ज़रूरत है.
प्रोफ़ेसर चान कहते हैं कि अगर किसी राष्ट्रीय क़ानून में किसी बात पर कोई रोक लगाई जाती है तो उसे पहले तीसरी अनुसूची में जोड़ा जाना चाहिए और ये रास्ता हॉन्ग कॉन्ग की संसद से होकर जाता है क्योंकि दोनों की न्याय व्यवस्थाएं अलग-अलग हैं.
वे कहते हैं, "दोनों जगहों पर जो क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम लागू हैं, वो अलग मूल्यों पर आधारित हैं. इसलिए किसी बात को अपराध करार देने का फ़ैसला केवल हॉन्ग कॉन्ग को करना चाहिए न कि चीन की केंद्रीय सरकार को."
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