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रोहिंग्या मुसलमान: 'मौत की नाव' में बर्मा से बांग्लादेश तक सफ़र
- Author, स्वामीनाथन नटराजन और मोअज़्ज़ेम हुसैन
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
खदीजा बेगम याद करती हैं, "किसी को पता नहीं था कि कितने लोग मरे हैं. ये पचास भी हो सकते हैं और ज्यादा भी हो सकते हैं."
55 साल की खदीजा उन 396 लोगों में से हैं जिन्हें बांग्लादेश के तट रक्षक बल ने बचाया है. जिस नाव पर वो थी, वो दो महीने से समुद्र में फंसा हुआ था.
नाव पर ही उनके बेटे की मौत हो गई थी और तभी उन्हें मरने वाले लोगों की संख्या का अंदाजा लगा था. मानव तस्कर उन्हें मलेशिया ले जाने वाले थे.
लेकिन वो वहाँ कभी नहीं पहुँचे. खदीजा म्यांमार में हिंसा भड़कने के बाद अपने घर से भाग गई थी.
म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के ऊपर हुए हिंसा को संयुक्त राष्ट्र ने 'नस्लीय नरसंहार' कहा है.
रात में लाशें फेंकी जाती थीं
बांग्लादेश ने अपने यहाँ म्यांमार में हिंसा झेल रहे रोहिंग्या मुसलमानों को शरण दी है. उन्होंने इसके लिए दुनिया का सबसे विशाल शरणार्थी कैंप लगाया है.
करीब दस लाख रोहिंग्या यहाँ शरण लिए हुए हैं. खदीजा जैसे कुछ लोगों ने मलेशिया में एक बेहतर ज़िंदगी का सपना देखा था लेकिन उनका सपना डरावना साबित हुआ है.
वो याद करती हैं कि कैसे नाव पर मानव तस्कर मरने वाले लोगों की मौत छिपा रहे थे.
वो बताती हैं, "वो दोनों इंजन चला देते थे ताकि पानी में लाश फेंकने की आवाज़ किसी को नहीं सुनाई दे. अक्सर रात के वक्त लाशों को फेंका जाता था. कम से कम 14 से 15 औरतें मरी होंगी."
डर जाती हैं...
वो अब भी अपने सामने बैठी उस औरत की मौत को याद कर के डर जाती हैं. उसे पानी की कमी हो गई थी.
शुरू में वो थोड़ा विचलित हुई और फिर उसके बाद अजीब-अजीब हरकतें करनी लगीं.
फिर क्रू के लोग उन्हें डेक के ऊपरी हिस्से में ले गए जहाँ खदीजा बताती हैं कि वो मर गईं.
खदीजा बताती हैं, "मैं अब तक उसकी मौत को याद करके डर जाती हूँ. वो मेरे आंखों के सामने मर गई."
उस महिला के चार बच्चे थे. मेरे बेटे ने उसकी 16 साल की सबसे बड़ी बेटी को बताया कि उसकी माँ मर चुकी है.."
अनाथ बच्चे
खदीजा खुद चार बच्चों की माँ हैं. वो बताती हैं, "उस औरत के तीन बच्चों को यह नहीं पता था कि उनकी माँ के साथ क्या हुआ है. यह दिल तोड़ देने वाला एहसास था."
खदीजा 2017 में बेघर हो गई थीं. उनके एक बेटे और पति को म्यांमार के राखिने राज्य में फ़ौजी कार्रवाई में मार दिया गया था.
उनके गांव में आग लगा दी गई और बांग्लादेश जाने पर उन्हें मजबूर कर दिया गया.
अपनी बड़ी बेटी की शादी करने के बाद अपने दूसरे बेटों और बेटियों के साथ एक बेहतर ज़िंदगी जीने का उनका सपना था.
समुद्र पार कर के मलेशिया पहुँचने वाले रोहिंग्या मुसलमानों की कहानी उन्हें आकर्षित करती थी.
गहने बेच डाले
खदीजा ने अपने गहने बेचकर करीब 60 हज़ार रुपये जमा किए और उसे तस्करों को नाव का इंतजाम करने को सौंप दिए.
फरवरी की एक रात उनके पास एक कॉल आया जिसका वो इंतजार कर रही थीं. "जो दूसरी तरफ आदमी था उसने मुझे तेकनाफ बस स्टैंड आने को कहा"
उन्होंने किसी को भी इस बारे में नहीं बताया और एक छोटे से बैग में कपड़े और बचे हुए गहने रखे और चल दिया.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "मैंने अपने दोस्तों और पड़ोसियों से कहा कि मैं इलाज के लिए बाहर जा रही हूँ."
दबे पांव रात के अंधेरे में वो अपने बेटे और बेटी के साथ घर से निकल गई. बस स्टैंड पर उन्हें एक आदमी मिला जो उन्हें एक फार्म हाउस तक ले गया.
नई ज़िंदगी का सपना
वहाँ पर खदीजा ने सैकड़ों दूसरे लोगों को देखा. वहाँ से वो एक छोटे से जहाज में बैठकर बंगाल की खाड़ी में निकल पड़े.
उन्हें बांग्लादेश के सेंट मैरिन द्वीप और म्यांमार के अकिआब के बीच वो समुद्र में निकल पड़े. वो कहती हैं, "महीनों से मैंने एक नए देश में एक नई ज़िंदगी का सपना देखा था."
पैर फैलाने तक की जगह नहीं थी. दो दिनों के बाद उन्हें एक दूसरे नाव में शिफ्ट कर दिया गया जिसमें खचाखच लोग भरे पड़े थे. उसमें पैर फैलाने तक की जगह नहीं थी.
खदीजा बताती हैं, "औरतों और बच्चे के साथ परिवार वाले उसमें थे. मुझे लगता है कि पांच सौ से ज्यादा लोग उसमें रहे होंगे.
येनाव अमूमन दक्षिण एशिया में इस्तेमाल में आने वाली ट्रॉलर से थोड़ी बड़ी थी लेकिन निश्चित रूप से इतनी बड़ी नहीं थी कि इतने लोग उस पर आ सके.
टॉयलेट में मौत
विडंबना देखिए कि इसे चलाने वाले म्यांमार के बर्मी लोग ही थे.
खदीजा बताती हैं, "शुरू में तो मैं डर गई थी. मुझे नहीं पता था कि आगे क्या होने वाला है. हमारी किस्मत हमारे साथ क्या करने वाली है. लेकिन एक बार जब सब कुछ ठीक हो गया तो मैं फिर से सपने देखने लगी. मुझे लगा कि मैं एक बेहतर ज़िंदगी हासिल कर लूंगी."
नाव पर बुनियादी सुविधाओं जैसे पानी और साफ-सफाई की कमी थी. खदीजा ने अपने आप को दो महीनों में सिर्फ दो बार ही साफ कर पाई थीं.
वो भी समुद्र से पानी खींचकर सबके सामने. लकड़ी के दो पाटों को घेरकर टॉयलेट बनाया गया था जिसके बीचोंबीच नीचे छेद था.
खदीजा बताती हैं, "जब हमने सफर की शुरुआत की तो उसके कुछ ही दिनों के बाद एक लड़का उस छेद से नीचे समुद्र में जा गिरा और मर गया. यह उन कई मौतों में से पहली मौत थी जो उन्होंने नाव पर देखी थी.
कोरोना वायरस
सात दिनों के सफर के बाद वे आख़िरकार मलेशियाई तट पर पहुँच सके थे.
यहाँ वो छोटे नावों की उम्मीद कर रहे थे जो उन्हें लेकर जमीनी भाग में ले जाता लेकिन कोई नहीं पहुँचा.
कोरोना वायरस के संक्रमण की वजह से मलेशियाई सुरक्षा बल ने सख्ती कर दी थी. कैप्टन ने शरणार्थियों को बताया कि वे मलेशिया में नहीं उतर सकते हैं.
इस महमारी ने खदीजा की उम्मीदों को चकचनाचूर कर दिया. समुद्र का पानी पीना पड़ा. नाव पर खाने-पीने की दिक्क़त होने लगी.
मलेशिया के रास्ते में तो उन्हें दो वक्त चावल मिलता खाने को और एक मग पानी भी. कभी-कभी तो दाल भी मिल जाता था.
लेकिन जब परेशानी शुरू हुई तब खदीजा बताती हैं कि, "पहले तो एक दिन में सिर्फ एक बार खाना मिलने लगा फिर दो दिनों पर एक खाना मिलने लगा. खाने में सिर्फ चावल होता था और कुछ नहीं."
थाईलैंड के तट पर
पानी की कमी बर्दाश्त से बाहर होने लगी थी. खदीजा बताती हैं कि हताशा में तो कई लोग समुद्र का पानी पी लेते थे.
"लोग पानी में अपने कपड़े गीले करके उसे निचोड़कर पानी के कुछ बूंदों से अपनी प्यास बुझाने की कोशिश करते थे."
दिनों के बाद थाईलैंड के तट पर एक छोटे से नाव का बंदोबस्त हो पाया था जिसे जरूरत के सामान लाने में इस्तेमाल किया गया.
लेकिन जब वो मलेशिया जाने की दूसरी कोशिश में लगे हुए थे तब बर्मी नेवी ने उनका रास्ता रोक लिया.
"उन्होंने कैप्टन और चालक दल के दूसरे तीन लोगों को गिरफ्तार कर लिया. हालांकि बाद में उन्हें छोड़ दिया गया. मुझे लगता है कि उन लोगों ने कोई डील की होगी."
मलेशिया जाने की उनकी दूसरी कोशिश भी बेकार जा चुकी थी.
नाव पर विद्रोह
किसी को नहीं पता था कि अब हम कहाँ जा रहे हैं. "हम समुद्र के चारो तरफ बस बहे चले जा रहे थे. हम लोगों ने खुद से पूछना शुरू कर दिया था कि इस तरह से कितने दिनों तक जी पाएंगे."
शरणार्थियों का एक दल चालक दल के पास गया और उनसे उतारने की गुजारिश की फिर चाहे बांग्लादेश उतार दो या फिर म्यांमार ही. लेकिन चालक दल ने मना कर दिया.
उन्होंने कहा कि यह जोखिम भरा होगा. उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है और उनकी नाव जब्त की जा सकती है.
एक तरफ नाव समुद्र में यूं ही तैर रही थी तो दूसरी तरफ चालक दल के लोगों पर बलात्कार और उत्पीड़न के इल्जाम लगने शुरू हो गए थे.
खदीजा बताती हैं, "हालात बेकाबू हो रहे थे. मैंने सुना कि चालक दल के एक सदस्य पर मार कर समुद्र में फेंक दिया गया है." चार सौ शरणार्थियों के बीच वो दस बर्मी थे.
"उनके लिए लड़ना और जीतना बहुत मुश्किल था." चालक दल ने छोटे नाव भाड़े पर लेने के लिए और पैसे की मांग की जो तट तक छोड़ पाए.
शरणार्थी कैंप
कुछ दिनों के बाद एक छोटी नाव आई और कैप्टन और दूसरे चालक दल के सदस्य उस पर कूदकर भाग खड़े हुए.
चालक दल के दो बचे हुए सदस्यों की मदद से बांग्लादेश के तट तक पहुँच पाई. सबकुछ खत्म हो चुका था
खदीजा याद करती हैं, "मैं बहुत खुश थी जब मैंने आखिरकार दो महीने में पहली बार ज़मीन देखी थी."
क्वारंटीन में दो हफ़्ते गुजारने के बाद खदीजा शरणार्थी कैंप में वापस आ गई थी. उनकी जगह वहाँ किसी और ने ले ली थी.
वो पूरी तरह से शांत होकर कहती हैं, "मैंने अपने सपनों के लिए सबकुछ गंवा दिया. अब कभी ऐसी ग़लती नहीं करूंगी."
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