कोरोना: 'लगता है कोरोना वायरस के पास सब कुछ तबाह कर देने की ताक़त है'

    • Author, प्रतीक्षा घिल्डियाल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

मैड्रिड के एक केयर होम मोंटे हरमोसो के गेट के बाहर हमारी मुलाक़ात कार्लोस से हुई. वो अपनी 89 साल की मां से मिलने की कोशिश कर रहे थे.

उन्होंने कहा, "मैं नहीं जानता कि वहां क्या चल रहा है. मैं बस अपनी मां का हाल-चाल जानना चाहता हूं."

वो केयर होम सील कर दिया गया था और यहां तक कि रिश्तेदारों को भी जाने की इजाज़त नहीं दी गई थी. भीतर मौजूद कोई भी शख़्स फोन कॉल का जवाब नहीं दे रहा था.

पिछले हफ़्ते 17 पेंशनभोगियों की मौत हो गई थी और ऐसी आशंका थी कि ये सिलसिला यहीं नहीं रुकने वाला है. इस केयर होम में फिलहाल 120 लोग रह रहे हैं.

वहां ऐंबुलेंसों और शव ले जाने वाली गाड़ियों का तांता लगा हुआ था. लेकिन कार्लोस केयर होम के भीतर दाख़िल होने में नाकाम रहे.

संक्रमण का डर

बाद के दिनों में ये साफ़ हो गया कि यूरोप के केयर होम्स का संकट गहराता जा रहा है. इसकी शुरुआत स्पेन के केयर होम्स से हुई थी, जहां बहुत तेज़ी से कई लोगों की जान चली गई थी.

मरने वालों के आंकड़े दिल दहला देने वाले थे. एक रिटायरमेंट होम में तो कई बुजुर्ग मरीज़ ऐसी अवस्था में पाए गए, मानो वहां उन्हें यूं ही छोड़ दिया गया हो.

और कुछ मामलों में तो बिस्तर पर उनकी लाश पड़ी हुई मिली. इस वाकये ने पूरे देश को हिला दिया.

ऐसा लगता है कि कोरोना वायरस के पास सब कुछ तबाह कर देने की ताक़त है. इन आश्रय स्थलों में रहने वाले साढ़े तीन लाख से भी ज़्यादा लोगों की ज़िंदगियां जहन्नुम में बदल गई हैं.

ये बुजुर्ग अपने परिवारवालों से कटकर रह गए हैं. उनके अपने लोग सिर्फ़ इसलिए उनसे नहीं मिल सकते क्योंकि केयर होम्स के बाशिंदों के संक्रमित हो जाने का डर है.

अस्पतालों की स्थिति उस नाजुक मोड़ पर पहुंच गई जहां लोग उम्मीद खो देते हैं.

गरिमापूर्ण अंतिम संस्कार

एक अनेस्थिटिस्ट (ऐनिस्थीसिया विशेषज्ञ) ने हमें बताया कि हालात इतने भयानक हो गए हैं कि उन्हें वेंटिलेटर की सुविधा देने के लिए बुजुर्गों के ऊपर नौजवानों को तरजीह देनी पड़ रही है.

मारिया एल्हानिओज़ ने बताया कि बहुत बूढ़े लोगों के ठीक होने की उम्मीद बहुत कम है. मरणासन्न लोगों की जिस तरह से देखभाल की जाती है, ये वैसा ही है ताकि उनकी तकलीफ़ कम हो सके. लेकिन शायद वे आईसीयू में न जा पाएं.

स्पेन में मैं 18 दिन रही. मैंने देखा कि एक देश किस तरह से लाचार हो गया है. इतनी बड़ी संख्या में मरीज़ आ रहे थे कि अस्पतालों में आईसीयू कम पड़ गए.

सबसे ज़्यादा तकलीफ़ तो उन लोगों की कहानियों से हुई जिनकी मौत आइसोलेशन में हुई थी- अपने लोगों से दूर.

यहां तक कि उन्हें गरिमापूर्ण अंतिम संस्कार तक नसीब नहीं हुआ. क्योंकि बहुत से देशों में महामारी से लड़ने की रणनीति के तौर पर लोगों का इकट्ठा होना प्रतिबंधित था.

चिंता की एक बड़ी वजह

स्पेन में स्वास्थ्य कर्मी जितनी बड़ी तादाद में संक्रमित हो रहे थे, वो भी चिंता की एक बड़ी वजह थी. उस वक़्त तक तो 12 हज़ार हेल्थ वर्कर्स संक्रमित हो चुके थे.

पेशे से ऐंबुलेंस ड्राइवर हिगिनियो डेलगाडो अल्वारेज़ ने हमें उस डर के बारे में बताया जो साये की तरह उनके साथ रहता है.

उन्हें डर है कि अगर उनका प्रोटेक्टिव सूट कहीं फट जाए या कोई मरीज़ ग़लती से ही उन पर थूक दे या कुछ उगल दे तो वे संक्रमित हो जाएंगे.

अल्वारेज़ कहते हैं, "जब कोई मरीज़ क़रीब होता है तो ये वो घड़ी होती है जब आप सबसे ज़्यादा डरे हुए होते हैं."

अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं वाले किसी देश में ऐसे हालात भी आएंगे, इसके बारे में किसी ने भी सोचा नहीं होगा.

दुख, तकलीफ़, तनाव और बर्बादी के इन हालात के दरमियां हम कई ऐसे लोगों से भी मिले जो दरअसल किसी हीरो की तरह थे, वे संकट की घड़ी में अपने देश की मदद कर रहे थे.

ये वो लोग थे जो हेल्थ वर्कर्स के लिए मास्क और फेस शील्ड बना रहे थे. एक होटल मैनेजर ने तो हमें बताया कि वो हॉस्पिटल्स के लिए बिस्तर दान देने को तैयार हैं.

मैं ख़ुद भी नाटकीय उतार-चढ़ाव के दौर से गुज़र रही थी. स्पेन में हालात जैसे ही कुछ बेहतर होने लगे, मेरी यात्रा अंतिम पड़ाव पर पहुंच गई.

लेकिन मैं दिल्ली नहीं लौट पाई क्योंकि भारत में कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए सभी अंतरराष्ट्रीय विमान सेवाओं पर पाबंदी लगा दी गई थी.

घनी आबादी और नाकाफ़ी स्वास्थ्य सुविधाओं के मद्देनज़र सरकार ने देखा कि उनके पास ऐसा करने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है.

स्पेन का मंज़र ब्रिटेन में

मैं जहां जाना चाहती थी, वहां जा नहीं सकती थी, इसलिए मैंने वही किया जो मैं कर सकती थी. मैं ब्रिटेन चली आई जहां मेरे ऑर्गनाइज़ेशन का मुख्यालय है.

जब तक घर जाने के हालात न बन जाएं, मैं यहां इंतज़ार कर सकती थी. स्पेन से लौटकर मैं लंदन में अब आइसोलेशन में हूं.

यहां भी मैंने वही हालात बनते देखे, जो मंज़र मैंने स्पेन में देखा था.

हेल्थ वर्कर्स के लिए ज़रूरी इक्विपमेंट्स की कमी के इलज़ाम, देरी से लिया गया लॉकडाउन का फ़ैसला, टेस्ट किट्स की कमी, आधे-अधूरे इंतज़ामों के लिए राजनेताओं पर ग़ुस्सा. ये वो बातें थीं जो यूरोप के कई देशों में दोहराई जा रही थीं.

इस बीच भारत में लॉकडाउन को दूसरी बार बढ़ा दिया गया है. मुझे अंदाज़ा नहीं है कि मैं कब घर लौट पाऊंगी.

लंदन से शिकागो होते हुए कोलंबस

एक महीना गुज़र गया था. मुझे अपने पति की याद आ रही थी. भारत में लागू लॉकडाउन के साथ उन्होंने तालमेल बिठा लिया था.

बेघर लोगों और दिहाड़ी मज़दूरों पर इस लॉकडाउन का क्या असर होगा, इस पर वे रिसर्च कर रहे थे.

अपने काम में भले ख़ुद को हमने मसरूफ़ रखा पर ये अकेलापन हम दोनों को ही खाये जा रहा था. हम अब फिर एक साथ हैं लेकिन इसके लिए हमें ज़मीन-आसमान एक करना पड़ा.

अश्विन अमरीकी नागरिक हैं. इसलिए दिल्ली स्थित अमरीकी दूतावास से गुज़ारिश के बाद उन्हें स्वदेश लौटने के लिए स्पेशल फ़्लाइट की परमिशन मिली.

दिल्ली से सैनफ्रांसिस्को और डेनवर के रास्ते होते हुए वे कोलंबस पहुंचे जहां उनके माता-पिता रहते हैं. मैं लंदन से शिकागो होते हुए कोलंबस उनके पास पहुंची.

लेकिन डर का एक क़तरा यहां भी मुझे छूकर गुज़र गया. एक पल के लिए लगा कि मैं अमरीका नहीं जा पाऊंगी. क्योंकि अमरीका में यूरोप से आने वाले लोगों पर यात्रा प्रतिबंध लागू हैं.

अब हम साथ-साथ हैं. लेकिन कोविड-19 के ज़माने में दुनिया भर के देश, दरिया और समंदर पार कर तय हुए इस सफ़र ने हमें एक बात सिखलाई कि हम एक दूसरे के साथ होने को कभी हल्के में नहीं लेंगे.

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