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कोरोना वायरस: ईरान मरने वालों की सच्चाई छिपा रहा है?
- Author, बहरंग ताजदीन और लुईस ऐडेमॉ
- पदनाम, बीबीसी फ़ारसी सेवा
ईरान से आए एक वीडियो में दिखता है, एक क़ब्रिस्तान के मुर्दाघर में एक कर्मचारी दर्जनों लाशों से घिरा है.
कुछ लाशें सफ़ेद कफ़न में लिपटी हैं – वो कहता है ये वो लाशें हैं जिन्हें ‘सुबह’ में निपटा दिया गया. वो फिर काली बॉडी बैग्स में लिपटी लाशों की कतार दिखाता है जो फ़र्श पर बेतरतीब रखी हैं और जिन्हें दफ़नाया जाना है,
फिर वो अपना कैमरा फ़ोन निकालता है और हमें एक-के-बाद एक कमरों में ले जाता है. हर ओर वही वीभत्स दृश्य है – लाशों का अंबार लगा हुआ है.
ये वीडियो ईरान के एक पवित्र धार्मिक शहर क़ुम के मुख्य क़ब्रिस्तान में फ़िल्माया गया. ये वही जगह है जहाँ से ईरान में कोरोना वायरस फैलना शुरु हुआ.
इसमें मुर्दाघर का कर्मचारी कहता है कि ये सारी लाशें कोरोना के शिकार लोगों की हैं, मगर बीबीसी इस दावे की पुष्टि नहीं करता.
लेकिन इसके बाद जो बात उसने कही, उसने इंटरनेट पर लोगों का ध्यान खींचा. वो बातचीत के दौरान कहता है कि इनमें से कुछ लाशें पाँच या छह दिन से रखी हुई हैं.
ये वीडियो और उसकी बातों से एक बड़ी सच्चाई का संकेत मिलता हैः कि ईरान अपने यहाँ मारे गए लोगों की लाशों को संभाल नहीं पा रहा, और ये संख्या उसकी बताई संख्या से बहुत ज़्यादा हो सकती है.
ये वीडियो 2 मार्च को आया और फिर वायरल हो गया. और तब से लेकर आज तक ईरान के अधिकारियों ने जिस तरह की प्रतिक्रिया दी है, उससे इस बात की झलक मिलती है कि ईरान कैसे कोरोना वायरस को लेकर बताई जा रही बातों को नियंत्रित करने के लिए जद्दोजहद कर रहा है.
लाशों को नहलाने वालों की कमी
मध्य पूर्व के देशों में कोरोना से सबसे ज़्यादा असर ईरान पर पड़ा है.
ईरान से असलियत का बाहर आ पाना बहुत मुश्किल है, मगर कई ऑनलाइन पोस्ट्स से पता चलत है कि वहाँ मुर्दाघरों की हालत पस्त है.
कुछ हद तक ऐसा इसलिए है क्योंकि लाशों को नहलाने वाले बहुत सारे लोगों ने डर से लाशों को हाथ लगाने से इनकार कर दिया.
बल्कि कई मुर्दाघरों में इस्लामिक रीति से अंत्येष्टि के तहत लाशों को नहलाने का ये काम मदरसा छात्रों को करना पड़ा.
हालाँकि अभी ये नहीं समझा जाता कि कोरोना संक्रमण लाशों से भी हो सकता है, मगर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने लोगों को इस मामले में भारी सावधानी रखने की सलाह दी है क्योंकि अभी इस वायरस के बारे में बहुत कुछ मालूम नहीं है.
मिसाल के तौर पर इटली में स्वास्थ्य अधिकारी कहते हैं कि ये वायरस मौत के बाद नहीं फैलता, मगर ये कपड़ों पर जीवित हो सकता है. इसलिए इटली में लाशों को फ़ौरन सील कर दिया जाता है और परिवार के लोगों तक को वहाँ नहीं जाने दिया जाता.
ईरान की प्रतिक्रिया
मुर्दाघर का वीडियो वायरल होने के बाद सबसे पहली प्रतिक्रिया कट्टरपंथियों की ओर से आई.
इसकी रिकॉर्डिंग करने वाले शख़्स को गिरफ़्तार कर लिया गया, और फिर अधिकारियों ने लोगों को ये समझाना शुरु कर दिया कि सभी लाशों का सम्मान के साथ और इस्लामिक रीति से ध्यान रखा जा रहा है.
शरीयत के मुताबिक़ लाशों जल्द-से-जल्द दफ़ना दिया जाना चाहिए.
और इसके पहले शवों को पानी से तीन बार नहलाया जाना चाहिए जिसे ग़ुस्ल-ए-मय्यत कहते हैं.
और मार्च के आरंभ में ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतोल्ला ख़मेनेई ने एलान किया था कि कोविड-19 के शिकार लोगों का अंतिम संस्कार ठीक वैसे ही किया जाएगा जैसा सामान्य लोगों का होता है – यानी उन्हें नहलाया जाएगा, सफ़ेद कफ़न में लपेटा जाएगा, और फिर उनके लिए दुआ की जाएगी.
कोरोना लेडीज़
मगर वीडियो के वायरल होने के बाद जो नाराज़गी भड़की उसे शांत करने के लिए कट्टरपंथी ख़याल वाली वेबसाइट्स ने ख़ास तौर पर मुर्दाघरों में स्वयंसेवा करने वाले एक गुट की ज़ोर-शोर से चर्चा शुरु कर दी.
ये गुट महिला वॉलंटियर्स का एक गुट है जिसका नाम है कोरोना लेडीज़, और ये लोग क़ुम में भी सक्रिय हैं.
इन वेबसाइटों पर उन्हें बहादुर महिलाएँ बताया गया जो कि जोखिम उठाकर भी इस्लामिक रीति से लाशों का अंतिम संस्कार करवा रही हैं.
ये गुट तीन टीमें बनाकर काम करता है जिसमें हर टीम सात-सात घंटे काम करती है और जज़्बा बनाए रखने के लिए धार्मिक प्रार्थना या मंत्र का उच्चारण करते रहती हैं.
वे कहती हैं कि जवान लोगों की लाशों को नहलाते हुए वो और ज़ोर से प्रार्थना करती हैं ताकि आगे उनकी हिम्मत ना टूटे.
उनके कपड़ों पर पीछे लिखा एक नारा हैः "अगर तुम में सिंह जैसा साहस नहीं, तो तुम प्रेम की यात्रा पर नहीं निकल सकते. "
शोधकर्ताओं का अनुमान
अस्पतालों और मुर्दाघरों की ख़बरों के बीच सरकार को मुश्किल सवालों से जूझना पड़ रहा है कि क्या ये संकट जितना बताया जा रहा है उससे कहीं ज़्यादा गंभीर है.
सरकारी आँकड़ों के अनुसार ईरान में 60,000 से ज़्यादा लोग संक्रमित हैं और लगभग 4,000 लोगों की जान जा चुकी है.
मगर अमरीका में मौजूद कुछ ईरानी शोधकर्ताओं का मानना है कि असल संख्या बहुत ज़्यादा है.
केवल सरकारी आँकड़ों पर निर्भर रहने की जगह मैसाचुसेट्स इंस्टीच्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी और वर्जीनिया टेक यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक मॉडल तैयार किया जो बीमारी फैलने का अनुमान लगाता है.
इसमें उन्होंने दूसरे देशों में प्रवेश करने पर संक्रमित पाए गए ईरानी यात्रियों के डेटा और विभिन्न मेडिकल संगठनों के अनुमानों का इस्तेमाल कर एक आँकड़ा निकाला जिसे वो ज़्यादा वास्तविक बताते हैं.
उनका अनुमान है कि 20 मार्च तक 15,000 लोगों की जान जा चुकी है और संक्रमित लोगों की संख्या 10 लाख के आस-पास होगी.
ये ईरान के सरकारी आँकड़ों से दस गुना बड़ी संख्या है जिसके अनुसार अब तक 1,433 लोगों की मौत हुई है और संक्रमित लोगों की संख्या 20,000 है.
क्या बताया जा रहा है संबंधियों को?
हो सकता है कि ये कभी पता नहीं चले कि ईरान का संकट असल में कितना बड़ा है, मगर इसके जो संकेत मिल रहे हैं उनसे अनुमान लगाया जा रहा है.
जैसे कुछ जगहों पर लाशों को अलग-अलग दफ़नाने की बजाय उन्हें एक साथ लंबे गड्ढों में अगल-बगल रख दफ़नाया जा रहा है. इन इलाक़ों में ऐसा पहले कभी नहीं सुना गया.
उत्तरी ईरान के मज़ांदरन क्षेत्र के एक डॉक्टर ने बग़ैर अपनी पहचान ज़ाहिर किए बीबीसी को बताया कि सुरक्षा जानकारों को लाशों की अंत्येष्टि की निगरानी के लिए भेजा जा रहा है और क़ब्रों को चूने से कवर किया जा रहा है क्योंकि अधिकारियों का कहना है कि इससे लाशों का संक्रमण समाप्त होगा और वायरस का प्रसार रुकेगा.
डॉक्टर ने बताया कि मारे गए लोगों के मृत्यु प्रमाण पत्र में वजह कार्डियक अरेस्ट या फ़्लू लिखा होने के बावजूद सुरक्षा विशेषज्ञों का वहाँ भेजा जाना बताता है कि ये मौतें कोविड-19 की वजह से हुईं.
इस बीच कई परिवार के लोगों ने कहा कि उन्हें नहीं पता उनके संबंधी की लाशें कहाँ हैं.
उन्हें बताया गया है कि संकट समाप्त होने के बाद उन्हें सूचित किया जाएगा और तब वो उनकी क़ब्रों पर जा सकेंगे.
मगर तब तक, धार्मिक नेता मारे गए लोगों के संबंधियों को दिलासा दे रहे हैं कि उनके निकटजनों का पूरे सम्मान के साथ ख़याल रखा जा रहा है और उनकी अंत्येष्टि बिल्कुल इस्लामिक रीति से की जा रही है.
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