कोरोना: सीरिया और बांग्लादेश के कैंपों की स्थिति हो सकती हैं विनाशकारी

कोरोना वायरस का दंश झेल रही पूरी दुनिया की नज़र शायद अभी उन शरणार्थी शिविरों की ओर नहीं है, जहाँ ये वायरस विनाशकारी हो सकता है.

चिंता सीरिया से लेकर बांग्लादेश तक के उन कैंपों की है जहाँ लाखों की संख्या में शरणार्थी रह रहे हैं. एक साथ रहने और कई बार आधारभूत सुविधाओं की कमी झेल रहे ये कैंप कोरोना वायरस के लिए अनुकूल हो सकते हैं.

संयुक्त राष्ट्र का आकलन है कि पूरी दुनिया में 66 लाख लोग शरणार्थी कैंपों में रहते हैं.

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ हर दूसरे सेंकंड दुनियाभर में कहीं न कहीं कोई न कोई विस्थापित हो रहा है. यही आबादी किसी भी महामारी में आसानी से निशाना बन सकती है.

सीरिया

दशकों से चल रहे युद्ध के कारण सीरिया के इदलिब में तुर्की की सीमा से लगे इलाक़ों में 10 लाख विस्थापित लोग शर्णार्थी कैंपों में रह रहे हैं.

लगातार हाथ धोने और सोशल डिस्टेंसिंग को कोरोना के ख़िलाफ़ प्रभावी क़दम माना जा रहा है, लेकिन इन शरणार्थी शिविरों में ये दोनों क़दम प्रभावी नहीं दिखते.

कैंप पानी की कमी से जूझते रहते हैं और जहाँ पीने के पानी की दिक़्क़त हो, वहाँ हाथ धोने के लिए कोई पानी कहाँ से लगाए.

यहाँ लोगों को आइसोलेशन में रखना भी एक अलग तरह की जंग के सामन है. कम जगह पर रहने वाले ये लाखों लोग सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कैसे करें.

राहत की बात ये है कि अभी इन कैंपों से संक्रमण का कोई मामला सामने नहीं आया है. लेकिन स्वास्थ्य अधिकारियों ने आगाह किया है कि अगर मेडिकल सप्लाई नहीं पहुँची, तो एक लाख लोगों की जान जा सकती है

सीरिया के इन इलाक़ों में आज कोविड-19 नामक अदृश्य दुश्मन से एक नई जंग की तैयारी चल रही है. मलबे से लोगों को ज़िंदा निकालने के एक्सपर्ट सिविल डिफ़ेंस के अधिकारी अब संक्रमण का ख़तरा ख़त्म करके लोगों को बचाने की जंग लड़ रहे हैं.

सीरिया का ये कैंप कोरोना वायरस फैलने के अनुकूल है. अगर यहाँ कोरोना फैला, तो ये काफ़ी ख़तरनाक हो सकता है.

इस कैंप में अपने दो बच्चों के साथ रह रहीं उम बिलाल को डर है कि वो और उनके जैसे तमाम विस्थापित कोरोना वायरस के आसान शिकार बन सकते हैं.

वो कहती हैं, ''संक्रमण फैलने को लेकर जो हमने सुना है, उससे लगता है कि ये कैंप प्रभावित होगा. हम दुआ करते हैं कि अल्लाह हमें इससे दूर रखे. हमें इसके फैलने का डर है. क्योंकि यहाँ तादाद से ज़्यादा लोग हैं और सावधानी रखना मुश्किल है. आप अपना टेंट तो साफ़ रख सकते हैं लेकिन बाहर का नहीं.''

पिछले सप्ताह बुधवार को इदलिब में पहली टेस्टिंग किट पहुँची है. फ़िलहाल राहत की बात है कि अभी तक हुए सभी टेस्ट निगेटिव रहे हैं.

लेकिन सीरिया की सरकार और उसके सहयोगी लगातार अस्पतालों पर बम बरसा रहे हैं. यहाँ कर्मचारियों के साथ-साथ दवा और उपकरणों की भी कमी है.

समस्या का अंत नहीं

इदलिब के एक डॉक्टर और मेडिकल कॉर्डिनेटर मोहम्मद तेनारी कहते हैं, "यहाँ लोगों को आइसोलेशन में रखना काफ़ी मुश्किल है. कुछ लोग अब भी स्कूलों और मस्जिदों में रह रहे हैं. अगर यहाँ किसी को कोरोना हुआ, तो वायरस बहुत तेज़ी से फैलेगा."

इदलिब में अभी संघर्ष विराम है, लेकिन अगर वायरस ने हमला किया, तो हालात विनाशकारी हो सकते हैं.

बांग्लादेश

बांग्लादेश के कॉक्स बाज़ार में चेकुफ़ा अपने पति, अपनी दो बेटियों और बहन के साथ एक छोटे से टेंट में रह रही हैं. वो बताती हैं, "10 परिवारों के लिए एक शौचालय और एक बॉथरूम है. जबकि एक ट्यूबवेल पर 50 परिवार आश्रित हैं. अगर यहाँ वायरस फैला तो हमारे लोग कैसे बचेंगे."

म्यांमार में हुए तनाव के कारण सात लाख से ज़्यादा रोहिंग्या मुसलमान पड़ोसी बांग्लादेश में शरण लिए हुए हैं.

कोरोना वायरस फैलने की चिंताओं के बीच कोशिशें भी चल रही हैं कि कैसे इन कैंपों को कोरोना के प्रकोप से बचाया जाए.

इसी के तहत बाज़ार बंद हैं, मदरसों को भी बंद कर दिया गया है. ग़ैर सरकारी संगठन लोगों को हाथ धोने के बारे में बता रहे हैं और मास्क भी दिए जा रहे हैं.

बांग्लादेश दुनिया की घनी आबादी वाले देशों में से एक है. रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर वो पहले से ही परेशान रहा है और अब इस महामारी का डर.

अभी तक बांग्लादेश में कोरोना की वजह से पाँच लोगों की मौत हुई है. चेकुफ़ा को उम्मीद है कि उनके कैंप में और अधिकारी स्वास्थ्य कर्मचारियों को लगाया जाए.

संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी यूएनएचसीआर का कहना है कि कोविड-19 का कोई संदिग्ध मामले बांग्लादेश स्थित कैंप से नहीं आया है.

एजेंसी ने 400 मरीज़ों के लिए आइसोलेशन फैसिलिटी बनाई है और एक हज़ार अतिरिक्त बेड के लिए और जगह मांगी है.

अन्य शिविर भी हैं निगरानी में

इनके अलावा बोस्निया, लेबनॉन और अफ़्रीका में बड़ी संख्या में शरणार्थी रह रहे हैं. कहीं की स्थिति थोड़ी बेहतर है, तो कहीं की बदतर.

लेकिन सबको चिंता इसी बात की है कि कहीं इन कैंपों में वायरस फैला, तो रोकना मुश्किल होगा.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने कहा है कि वो संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों और कई सरकारों के साथ मिलकर काम कर रहा ताकि ऐसे लोगों को मदद दी जा सके.

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में पब्लिक हेल्थ रिसर्चर एडम काउट्स ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया, "अगर हम ये सोच रहे हैं कि कोरना अमरीका और यूरोप के लिए बड़ा मुद्दा है, तो हम अभी शरणार्थी शिविरों के बारे में नहीं सोच रहे हैं. लोग अपने बच्चों को नहला तक नहीं पाते, हाथ धोना तो छोड़ दीजिए."

ये भी माना जा रहा है कि टेस्टिंग की कमी के कारण अभी तक इन कैंपों से कोरोना के मामले सामने नहीं आ पा रहे हैं.

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