You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
कोरोना वायरस: किसी ग़रीब देश की तरह बेबस इटली
इटली में कोरोना वायरस के ख़िलाफ जंग लड़ रहे डॉक्टरों के सामने एक अजीब मुश्किल खड़ी हो गई है. उनके सामने चुनौती इस बात का चुनाव करने की है कि वे किसका इलाज पहले करें और किसे छोड़ दें.
इटली में हर दिन हज़ारों की तादाद में कोरोना वायरस संक्रमण के नए मामले सामने आ रहे हैं. ऐसे में यह देश बीमारों का इलाज करने के लिए हॉस्पिटल बेड्स की कमी से जूझ रहा है. आमतौर पर जंग में इस तरह के हालात पैदा होते हैं, लेकिन इटली को शांतिकाल में इस तरह की चुनौतीभरी स्थिति से दो-चार होना पड़ रहा है.
- कोरोना वायरस का बढ़ता ख़तरा, कैसे करें बचाव
- कोरोना वायरस से बचने के लिए मास्क पहनना क्यों ज़रूरी है?
- कोरोना: मास्क और सेनेटाइज़र अचानक कहां चले गए?
- अंडे, चिकन खाने से फैलेगा कोरोना वायरस?
- कोरोना वायरस: बच्चों को कोविड-19 के बारे में कैसे बताएं?
- कोरोना वायरस: संक्रमण के बाद बचने की कितनी संभावना है
- कोरोना वायरस का कहर बरपा तो संभल पाएगा भारत?
लोंबार्डिया के उत्तरी इलाके बर्गामो के एक हॉस्पिटल में आईसीयू के हेड क्रिश्चियन सालारोली ने न्यूज़ पेपर कोरियेरे डेला सेरा को बताया, 'गंभीर रेस्पिरेटरी बीमारी से गुजर रहा कोई 80 से 95 साल का शख्स अगर आता है तो आप शायद उसका इलाज नहीं करेंगे. ये शायद बेहद कड़वे शब्द हैं, लेकिन यही हक़ीक़त है. हम इस वक़्त चमत्कार करने की कोशिशें करने की स्थिति में नहीं हैं.'
अहम बात यह है कि इटली में यह वायरस इतनी गंभीर शक्ल ले चुका है कि जीवन और मौत के फ़ैसले लेने पड़ रहे हैं.
मुश्किल चुनाव
कोरोना वायरस ख़ासतौर पर इटली के लिए ज़्यादा घातक साबित हो रहा है. शुक्रवार 12 मार्च तक इस वायरस से पीड़ित 15,000 लोगों में से 1,000 लोग अपनी जान गंवा चुके थे. यह आँकड़ा चीन में हुई मौतों का क़रीब एक-तिहाई बैठता है.
यूनाइटेड नेशंस (यूएन) के मुताबिक, जापान के बाद इटली दूसरा ऐसा देश है जहां सबसे ज्यादा बुज़ुर्ग हैं. इसका मतलब यह भी है कि अगर ये लोग कोरोना की चपेट में आ जाते हैं तो इनके गंभीर बीमार होने का सबसे ज्यादा खतरा है.
मार्च की शुरुआत में इटैलियन सोसाइटी ऑफ एनेस्थेसिया, एनल्जेसिया, रेस्सीटेशन एंड इंटेन्सिव थेरेपी (एसआईएएआरटीआई) ने नैतिक सिफ़ारिशें जारी कीं. इनका मक़सद डॉक्टर्स को यह सलाह देना था कि केवल असाधारण स्थितियों में ही किसी को इंटेंसिव केयर बेड मिलना चाहिए. यानी कि अस्पताल में हर किसी का इलाज नहीं होगा.
पहले आओ-पहले पाओ के आधार पर मरीज़ों को भर्ती करने की बजाय इसमें डॉक्टरों और नर्सों को सलाह दी गई है कि वे इस मुश्किल चुनाव का फ़ैसला ऐसे मरीज़ों पर फोकस करने के लिए करें जिनके इस गहन इलाज के बाद बचने के ज़्यादा आसार हैं.
इसमें कहा गया है, 'एसआईएएआरटीआई इस बात का प्रस्ताव नहीं कर रहा कि किन मरीज़ों का इलाज होना चाहिए और किनका नहीं. इसके उलट, इस वक़्त आपातकालीन हालात हैं जो कि डॉक्टरों को रोक रहे हैं कि वे अपना ध्यान ऐसे मरीज़ों पर लगाएं जिन्हें इस इलाज का सबसे ज़्यादा फ़ायदा हो सकता है.'
मरीज़ों की सूनामी
इटली में क़रीब 5,200 इंटेंसिव केयर बेड हैं, लेकिन सर्दियों में इनमें से कई रेस्पिरेटरी दिक्क़तों वाले मरीज़ों से भर गए हैं. उतरी इलाके लोंबार्डी और वेनेटो के उत्तरी इलाक़ों में निजी और सरकारी संथानों दोनों में मिलाकर केवल 1,800 बेड्स हैं.
लोंबाडी के हॉस्पिटल में काम करने वाले डॉ. स्टीफ़ेनो मैग्नोन ने बीबीसी को बताया कि वे अपनी अधिकतम क्षमता पर पहुंच चुके हैं.
उन्होंने कहा, 'हर गुजरते दिन के साथ ही हालात और ज़्यादा ख़राब होते जा रहे हैं. कोरोना वायरस से जूझ रहे मरीजों के इलाज के लिए हम आईसीयू बेड्स और जनरल वॉर्ड्स में अपनी क्षमता के उच्चतम स्तर पर पहुंच चुके हैं. इससे ज़्यादा मरीज़ भर्ती कर पाना हमारे लिए मुमकिन नहीं है.'
उन्होंने कहा, 'अपने प्रांत में हमारे सभी संसाधन ख़त्म हो चुके हैं. मानवीय और तकनीकी दोनों ही संसाधन ख़त्म हो चुके हैं. हम नए वेंटिलेटरों और नई डिवाइसेज का इंतज़ार कर रहे हैं.'
इस हफ़्ते की शुरुआत में बर्गामो के एक आईसीयू फ़िजीशियन डॉ. डेनियल मचिनी की गवाही ट्विटर पर वायरल हो गई.
इसमें उन्होंने बताया कि किस तरह से उनकी टीम को सूनामी का सामना करना पड़ गया. किस तरह से वेंटिलेटर्स जैसे सांस की शिकायत के मेडिकल उपकरण सोने की तरह से बेहद मूल्यवान हो गए.
उन्होंने कहा, 'मामले तेज़ रफ़्तार से बढ़ रहे हैं. हमारे यहां हर रोज़ 15-20 एडमिशन हो रहे हैं. सबकी वजह एक ही है. एक के बाद एक टेस्ट के नतीजे वही आ रहे हैं- पॉजिटिव, पॉजिटिव. इमर्जेंसी रूम के धराशायी होने के हालात पैदा हो गए हैं.'
'इस वायरस से पीड़ित हमारे कुछ सहयोगियों ने अपने रिश्तेदारों को भी इससे ग्रसित कर दिया और इनमें से कुछ ज़िंदगी और मौत से जूझ रहे हैं.'
डॉ. सालारोली ने कोरियेरे को बताया कि मेडिकल स्टाफ़ पर बेतहाशा इमोशनल बोझ है और उनकी टीम के कुछ डॉक्टर अपने सामने मौजूद विकल्प को चुनने में ख़ुद टूट गए हैं.
उन्होंने कहा, 'यह हालात एक चीफ़ डॉक्टर के सामने भी आ रहा है और एक नए आए युवा डॉक्टर के सामने भी. उन्हें मनुष्य के भाग्य को ख़ुद तय करना है. और ऐसा बड़े पैमाने पर करना है.'
'मैंने 30 साल के अनुभव वाली नर्सों को रोते देखा है. लोगों को अचानक कांपते और रोते देखा है.'
यूरोप से इटली का अनुरोध
बीबीसी से बात करते हुए इटली के विदेश मंत्री लुइजी डी माइयो ने एकल यूरोपीय यूनिट को खड़ा करने की मांग की जो कि पूरे यूरोप में हॉस्पिटलों और क्लीनिकों को होने वाली सप्लाई में सहयोग कर सके.
लेकिन, उन्होंने आशा भी जताई कि उत्तरी इटली के दस कस्बों में कोई भी इंफेक्शन रिकॉर्ड नहीं किया गया है जहां पर रेड जोन लागू किया जा चुका है.
डी माइयो ने कहा, 'यूरोप में इतनी बुरी तरह से प्रभावित होने वाला इटली पहला देश है. लेकिन, मुझे उम्मीद है कि इसका यह भी मतलब है कि इटली इस आपात स्थिति को पीछे छोड़ने वाला भी पहला देश होगा.'
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)