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'परवेज़ मुशर्रफ़ को सज़ा के ख़िलाफ़ थी इमरान सरकार'- नज़रिया
- Author, बेनज़ीर शाह
- पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक, पाकिस्तान से
पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ को देशद्रोह के मामले में इस्लामाबाद की विशेष कोर्ट से सुनाई गई मौत की सज़ा पाकिस्तान में एकदम अप्रत्याशित है.
यूं तो पाकिस्तान के संविधान में बहुत साफ़ तौर पर लिखा है कि गद्दारी के जुर्म की सज़ा क्या है. लेकिन पाकिस्तान में जिस तरह की राजनीति होती है, जिस तरह के ज़मीनी हालात हैं, निज़ाम जिस तरह से चलता है, उससे नहीं लगता था कि किसी पूर्व आर्मी चीफ़ को सज़ा सुनाई जाएगी.
पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान की मौजूदा हुकूमत ने भी ये कोशिश की थी कि ऐसा कोई फ़ैसला ना आए. हुकूमत ने इस्लामाबाद हाईकोर्ट में यहां तक कहा था कि विशेष कोर्ट ग़ैर-क़ानूनी तरीके से बनी है, इसे ख़त्म किया जाए.
विशेष अदालत जब परवेज़ मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ फ़ैसला सुना रही थी, उस समय भी हुकूमत की तरफ़ से तीन अलग-अलग याचिकाएं दाख़िल की गई थीं.
इनमें हुकूमत की ओर से अपील की गई थी कि पूर्व प्रधानमंत्री, पूर्व चीफ़ जस्टिस और पूर्व क़ानून मंत्री का नाम भी इसमें शामिल किया जाए.
लेकिन इस पर जज ने कहा कि हुकूमत ऐसा करके मामले की सुनवाई में देरी कराने की कोशिश कर रही है. इससे पहले लाहौर हाईकोर्ट में परवेज़ मुशर्रफ़ ने भी कोशिश की थी कि उनके ख़िलाफ़ फ़ैसला ना आए.
तारीख़ी फ़ैसला
पाकिस्तान के इतिहास में ये एक तारीख़ी फ़ैसला है. पाकिस्तान में ऐसा इससे पहले कभी नहीं हुआ. पाकिस्तान में इस तरह के मामलों पर सियाती जमातें कभी शोर नहीं मचाती और मामले ख़ुद-ब-ख़ुद सेटल हो जाते हैं.
इसीलिए माना जा रहा था कि इस मामले में भी देर हो जाएगी या फ़ैसला इस तरह का नहीं आएगा और सेटल हो जाएगा.
साल 2009 में जब पीपुल्स पार्टी की सरकार थी, तब भी कहा जा रहा था कि परवेज़ मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ गद्दारी का मुक़दमा होना चाहिए. लेकिन उस समय प्रधानमंत्री युसूफ़ रज़ा गिलानी का कहना था कि वो ये मुक़दमा नहीं कर सकते.
उसके बाद मुस्लिम लीग नून की सरकार आई तो उन्होंने भी इस मामले में हाथ डालने में ऐहतियात बरता. लेकिन तब सुप्रीम कोर्ट ने दबाव बनाया कि मुक़दमा एक निर्धारित अवधि के भीतर कीजिए, क्योंकि संविधान के मुताबिक गद्दारी का मुक़दमा सिर्फ़ सरकार दर्ज करा सकती है. इससे मुस्लिम लीग नून की सरकार थोड़ा घबराई थी.
इसके बाद परवेज़ मुशर्रफ़ को पाकिस्तान छोड़कर जाने की इजाज़त मिल गई. इस पर हुकूमत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जाने दिया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पलटकर कहा कि परवेज़ मुशर्रफ़ को जाने की इजाज़त तो सरकार ने दी है.
इस तरह के घटनाक्रम की वजह से पाकिस्तान में किसी को लगता नहीं था कि परवेज़ मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ कभी इस तरह का फ़ैसला भी आ सकता है. मौजूदा सरकार ने भी काफी कोशिश की थी कि मामला टल जाए.
मामले में ख़ामियां
लेकिन इस मामले में कुछ लूपहोल्स भी हैं जिनकी बुनियाद पर सवाल उठता है कि जब इस फ़ैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दी जाएगी तो वो टिकेगा या नहीं.
इस्लामाबाद हाईकोर्ट में जब इस मामले पर सुनवाई हुई थी, स्टे देते हुए हाईकोर्ट ने विशेष अदालत से कहा था कि इस पर दोबारा सुनवाई होनी चाहिए. हाईकोर्ट का कहना था कि चाहे जो इल्ज़ाम हो, परवेज़ मुशर्रफ़ को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार होना चाहिए. लेकिन मुशर्रफ़ के वकीलों को ठीक से सुना नहीं गया.
हाईकोर्ट ने इसे असाधारण मामला बताया था. अब जब ये मामला सुप्रीम कोर्ट में जाएगा, तो इस पर बहस ज़रूर होगी कि विशेष अदालत ने बहुत जल्दबाज़ी में फ़ैसला सुनाया है.
विशेष अदालत ने मुशर्रफ़ से कहा था कि वो आकर अपना बयान दर्ज कराएं. लेकिन मुशर्रफ़ ने कहा था कि इस हालत में नहीं है कि आकर बयान दर्ज कराएं. उन्होंने विशेष अदालत से आग्रह किया था कि एक टीम भेजकर बयान रिकॉर्ड करवा लें. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.
इस घटनाक्रम में एक बात और ध्यान देने वाली है कि अब हर कोई इस फ़ैसले का श्रेय लेने का कोशिश करेगा. इसमें मुस्लिम लीग नून और पीपुल्स पार्टी भी शामिल है. इस फ़ैसले से पाकिस्तान की न्यायपालिका भी संकेत दे रही है कि वो तमाम आलोचनाओं के बीच मज़बूत है.
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