पाकिस्तान की मलेशिया, तुर्की से यारी सऊदी अरब ने रोकी?

    • Author, टीम बीबीसी हिन्दी
    • पदनाम, दिल्ली

जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा भारत ने ख़त्म किया तो पाकिस्तान, मलेशिया और तुर्की की दोस्ती काफ़ी सुर्ख़ियों में रही थी.

इस मामले में तुर्की और मलेशिया दो ऐसे देश थे, जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र की आम सभा को संबोधित करते हुए भारत को कश्मीर मामले में घेरा था.

पाकिस्तान ने दोनों देशों के रुख़ की खुलकर सराहना की थी.

लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आपकी किससे दुश्मनी है इससे भी दोस्ती तय होती है. सऊदी अरब पाकिस्तान का सदाबहार दोस्त रहा है लेकिन उसके संबंध तुर्की और मलेशिया से अच्छे नहीं हैं.

ऐसे में इसकी छाया अब पाकिस्तान की मलेशिया और तुर्की से दोस्ती पर भी पड़ती दिख रही है.

पाकिस्तानी मीडिया में यह रिपोर्ट प्रमुखता से छपी है कि कुआलालंपुर समिट में शरीक होने से पाकिस्तान पीछे हटने पर विचार कर रहा है क्योंकि सऊदी अरब इसे लेकर सहज नहीं है.

कुआलालंपुर में 19-20 दिसंबर को यह समिट होने वाला है. इसमें सऊदी के नेतृत्व वाले ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन के विकल्प के तौर पर एक इस्लामिक ब्लॉक बनाने की योजना है.

प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की विशेष सहयोगी डॉ फ़िरदौस आशिक़ अवान ने सोमवार को पत्रकारों से कहा कि कुआलालंपुर समिट में इमरान ख़ान के जाने पर फ़ैसला उनके बहरीन और स्विटज़रलैंड से लौटने के बाद बुधवार को होगा.

पाकिस्तानी अख़बार डॉन के अनुसार इस समिट में 52 देशों के 400 मुस्लिम नेता, बुद्धिजीवी, स्कॉलर और थिंकर्स आएंगे. इसके साथ ही 19 दिसंबर को मुस्लिम देशों के नेता मुस्लिम दुनिया की समस्याओं को देखते हुए नए संगठन बनाने पर बात करेंगे.

डॉ फ़िरदौस आशिक़ ने कहा, ''अपनी प्राथमिकताएं और राष्ट्रहित के हिसाब से फ़ैसला होगा. प्रधानमंत्री इमरान ख़ान इस मामले में कोई भी फ़ैसला बातचीत के आधार पर लेंगे. इस मसले पर फ़ैसला सभी पहलुओं को देखते हुए होगा.''

डॉन के अनुसार उससे एक राजनयिक सूत्र ने इस बात की पुष्टि की है कि इमरान ख़ान इस समिट में शामिल होने को लेकर फिर से विचार कर रहे हैं.

इससे पहले इमरान ख़ान ने 20 नवंबर को कहा था कि वो इस समिट में शामिल होंगे. मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद के विशेष दूत और उप-विदेश मंत्री मार्ज़ुकी बिन हाजी याह्या ने इमरान ख़ान को औपचारिक रूप से आमंत्रण दिया था.

इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि यह आइडिया इमरान ख़ान का ही था. उन्होंने तुर्की और मलेशिया के राष्ट्र प्रमुखों से मुलाक़ात के दौरान ये आइडिया रखा था. तीनों नेताओं की इसी साल सितंबर महीने में न्यूयॉर्क में मुलाक़ात हुई थी. पीएम महातिर और तुर्की के राष्ट्रपति रेचेपा तैय्यप अर्दोआन ने इमरान ख़ान के प्रस्ताव पर सहमति जताई थी.

शनिवार को इमरान ख़ान सऊदी अरब के दौरे पर गए थे. पाकिस्तानी मीडिया में कहा जा रहा है कि इमरान ख़ान सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को आश्वस्त करने गए थे कि उनके समिट में जाने से सऊदी के हितों से समझौता नहीं होगा.

क़र्ज़ के जाल में उलझे पाकिस्तान को सऊदी अरब ने डिफॉल्टर होने से बचाया है. सऊदी ने कई बार मुश्किल घड़ी में पाकिस्तान की मदद की है. 2018 में आम चुनाव के बाद जब इमरान ख़ान सत्ता में आए तब पाकिस्तान आर्थिक बदहाली से जूझ रहा था और सऊदी अरब ने पाकिस्तान को 6 अरब डॉलर की मदद की थी. अगर सऊदी ये मदद नहीं करता तो पाकिस्तान डिफॉल्टर हो सकता था.

इसके अलवा 27 लाख पाकिस्तानी सऊदी अरब में काम करते हैं और वहां से आने वाली विदेशी मुद्रा का पाकिस्तान के फॉरेक्स में बड़ा योगदान है.

कुआलालंपुर समिट को लेकर सऊदी और उसके सहयोगी देश असहज हैं. ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन के बारे में कहा जा रहा है कि यह निष्क्रिय हो गया है, इसलिए मुस्लिम देशों को एक नए मंच की ज़रूरत है. इमरान ख़ान के लिए बहुत विकट स्थिति है.

कश्मीर मामले में तुर्की और मलेशिया खुलकर सामने आए थे जबकि सऊदी ने भारत का विरोध नहीं किया था. इसके अलावा एनएसजी में भी पाकिस्तान की सदस्यता का तुर्की और मलेशिया समर्थन करते रहे हैं.

इमरान ख़ान पिछले साल अगस्त में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने और नवंबर में मलेशिया के दौरे पर गए.

इमरान ख़ान से तीन महीने पहले 2018 में ही 92 साल के महातिर मोहम्मद फिर से मलेशिया के प्रधानमंत्री बने थे. इमरान और महातिर के चुनावी कैंपेन में भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा था. इसके साथ ही दोनों देशों पर चीन का क़र्ज़ भी बेशुमार बढ़ रहा था.

महातिर राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं. वो 1981 से 2003 तक इससे पहले सत्ता में रह चुके थे. वहीं इमरान ख़ान इससे पहले केवल क्रिकेट के खिलाड़ी थे. महातिर ने आते ही चीन के 22 अरब डॉलर की परियोजना को रोक दिया और कहा कि यह बिल्कुल ग़ैरज़रूरी थी.

दूसरी तरफ़ इमरान ख़ान ने वन बेल्ट वन रोड के तहत पाकिस्तान में चीन की 60 अरब डॉलर की परियोजना को लेकर उतनी ही बेक़रारी दिखाई जैसी बेक़रारी नवाज़ शरीफ़ की थी.

नवंबर 2018 में जब इमरान ख़ान क्वालालंपुर पहुँचे तो उनका स्वागत किसी रॉकस्टार की तरह किया गया. इमरान ख़ान ने कहा कि मलेशिया और पाकिस्तान दोनों एक पथ पर खड़े हैं.

इमरान ख़ान ने कहा था, ''मुझे और महातिर दोनों को जनता ने भ्रष्टाचार से आजिज आकर सत्ता सौंपी है. हम दोनों क़र्ज़ की समस्या से जूझ रहे हैं. हम अपनी समस्याओं से एक साथ आकर निपट सकते हैं. महातिर ने मलेशिया को तरक्की के पथ पर लाया है. हमें उम्मीद है कि महातिर के अनुभव से हम सीखेंगे.'' दोनों मुस्लिम बहुल देश हैं.

इमरान ख़ान और मलेशिया के क़रीबी की यह शुरुआत थी. भारत और पाकिस्तान में जब भी तनाव की स्थिति बनी तो इमरान ख़ान ने महातिर मोहम्मद को फ़ोन किया. कहा जाता है कि इमरान ख़ान के शुरुआती विदेशी दौरे में मलेशिया एकमात्र देश था जिससे इमरान ख़ान ने क़र्ज़ नहीं मांगा.

महातिर मोहम्मद के शासन काल में पाकिस्तान मलेशिया के सबसे क़रीब आया. पाकिस्तान और मलेशिया के बीच 2007 में इकनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट हुआ था.

इमरान ख़ान के दौरे पर महातिर ने पाकिस्तान को ऊर्जा सुरक्षा में मदद करने की प्रतिबद्धता जताई थी. पाँच अगस्त को जब भारत ने जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष दर्जे को ख़त्म करने की घोषणा की तो महातिर उन राष्ट्र प्रमुखों में शामिल थे जिन्हें इमरान ख़ान ने फ़ोन कर समर्थन मांगा और समर्थन मिला भी.

जब कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में गया तब भी मलेशिया पाकिस्तान के साथ था. यहां तक पिछले महीने संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में भी मलेशियाई प्रधानमंत्री ने कश्मीर का मुद्दा उठाया और भारत को घेरा. भारत के लिए यह किसी झटके से कम नहीं था.

तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने पिछले महीने 24 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा को संबोधित करते हुए कश्मीर का मुद्दा उठाया था.

राष्ट्रपति अर्दोआन ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय पिछले 72 सालों से कश्मीर समस्या का समाधान खोजने में नाकाम रहा है.

अर्दोआन ने कहा था कि भारत और पाकिस्तान कश्मीर समस्या को बातचीत के ज़रिए सुलझाएं. तुर्की के राष्ट्रपति ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के बावजूद कश्मीर में 80 लाख लोग फँसे हुए हैं.

कहा जा रहा है कि यूएन की आम सभा में तुर्की और मलेशिया का यह रुख़ भारत के लिए झटका है.

तुर्की के इस रुख़ पर भारत ने खेद जताया था. भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा था कि कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है. उन्होंने कहा था कि तुर्की और मलेशिया का रुख़ बहुत ही अफ़सोसजनक है.

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