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सऊदी अरब: बदल रहा है या और पुराना हो रहा है
- Author, टीम बीबीसी
- पदनाम, नई दिल्ली
सऊदी अरब ने पिछले दो हफ़्ते में कम से कम आठ वैसे लोगों को गिरफ़्तार किया है जो शाही शासन की आलोचना करते रहे थे.
सऊदी में इससे पहले भी ऐसी गिरफ़्तारियां होती रही हैं. एक तरफ़ सऊदी अरब निवेश और पर्यटन बढ़ाने के लिए ख़ुद को उदार दिखाने की कोशिश कर रहा है तो दूसरी तरफ़ विरोध की मामूली आवाज़ को भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है.
ऐसा तब है जब सऊदी मूल के पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या में अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसियों की जाँच में सऊदी अरब के शाही शासन की संलिप्तता खुलकर सामने आई थी.
सऊदी अरब एक रूढ़िवादी इस्लामिक राजशाही व्यवस्था वाला देश है. यहां की अर्थव्यवस्था तेल पर निर्भर है और इसी दम पर बेशुमार पूंजी भी है.
अर्थव्यवस्था के आधार पर कहा जा सकता है कि मध्य-पूर्व का सबसे ताक़तवर मुल्क सऊदी है. एक प्राचीन इलाक़े में सऊदी अरब नया मुल्क है.
इसकी स्थापना 1932 में क़बिलाई नेता अब्दुलअज़ीज़ अल-साऊद ने की थी. सऊदी अरब का नाम भी अब्दुलअज़ीज़ ने अपने ही नाम पर ही रखा था. इन्हीं के वंशज अब तक सऊदी अरब पर शासन कर रहे है.
अब्दुलअज़ीज़ ने बहुत ही विपरीत हालात में मुल्क को अपने अधीन किया था. उन्होंने रूढ़िवादी इस्लामिक समूह जिन्हें वहाबी कहा जाता है, के साथ सहयोग के लिए हाथ बढ़ाया था. मशहूर अमरीकी पत्रकार स्टीव कोल ने कहा था कि सऊदी अरब एकमात्र देश है जो आधुनिक नेशन-स्टेट जिहाद से बना.
सऊदी अरब में तेल का मिलना उसके भविष्य के लिए नई करवट थी. तेल मिलने के बाद ही सऊदी अरब की विदेश नीति ने आकार लिया.
दुनिया भर के देशों में राजशाही के ख़िलाफ़ कई आंदोलन हुए और वो व्यवस्थाएं ध्वस्त भी हो गई लेकिन सऊदी इस मामले में अकेला है.
सऊदी के इस शाही परिवार के लिए आंदोलन और विरोध हमेशा से चिंता के विषय रहे हैं. पड़ोसी देशों में लोग सड़क पर उतरते हैं तो इस परिवार की चिंता बढ़ जाती है कि कहीं यहां के लोग भी सड़क पर न उतर जाएं. जब अरब स्प्रिंग हुआ तो सऊदी इसे लेकर काफ़ी चिंतित था. इन गिरफ़्तारियों को भी इसी से जोड़कर देखा जाता है.
1932 में औपचारिक रूप से किंगडम ऑफ सऊदी के बनने के बाद से उसे कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. ये चुनौतियां बाहरी और भीतरी दोनों हैं.
सऊदी ने इराक़ और ईरान के साथ हमेशा आक्रामक तरीक़े से ख़ुद को पेश किया है. सऊदी की आक्रामकता अपने सभी पड़ोसियों के साथ रही है.
1979 के नंवबर महीने में हथियारबंद इस्लामिक चरमपंथियों के एक समूह ने मक्का की अल-हराम मस्जिद को अपने क़ब्जे में कर लिया था और हाऊस ऑफ़ सऊद को गिराने की घोषणा की थी.
इस घटना से सऊदी की प्रतिष्ठा पर काफ़ी चोट पहुंची थी. हालांकि इसके बावजूद वहां का शाही शासन चलता रहा. 2000 के दशक के मध्य में अल-क़ायदा का चरमपंथ मज़बूत हुआ तब भी सऊदी का शासन सलामत रहा.
जिन आठ लोगों को गिरफ़्तार किया गया है वो पत्रकार और एक्टिविस्ट हैं. इन गिरफ़्तारियों के बाद सऊदी में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर दुनिया भर में सवाल उठ रहे हैं.
लंदन स्थित समूह ALQST सऊदी में मानवाधिकारों की वकालत करता है. उसने इन गिरफ़्तारियों की पुष्टि की है. इस ग्रुप में जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के सीनियर फेलो अब्दुल्लाह अलाउद भी हैं, जिनके पिता को सऊदी में मौत की सज़ा मिली हुई है.
अब्दुल्लाह ने कहा, ''गिरफ़्तार किए गए लोगों के परिवारों और दोस्तों ने इन गिरफ़्तारियों की पुष्टि की है.'' इस मामले में सऊदी की तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. सऊदी में ऐसी गिरफ़्तारियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर उस तरह से सवाल भी नहीं उठाए जाते हैं.
सऊदी के शाही शासन से असहमति रखने वाले रॉयल सऊदी एयर फ़ोर्स के पूर्व मेंबर याह्या असिरी ने कहा है, ''कई देशों का कहना था कि सऊदी अरब ने जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या के बाद बने अंतरराष्ट्रीय दबाव से सबक लिया है. लेकिन यह सच नहीं है. सऊदी में अब भी लोगों को दबाया जा रहा है और अब भी मानवाधिकारों की बात करने वालों को गिरफ़्तार किया जा रहा है.''
अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए ने दावा किया था कि ख़ाशोज्जी की हत्या क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के कहने पर हुई थी. एक तरफ़ क्राउन प्रिंस सलमान महिलाओं को कार चलाने, रंगीन बुर्क़ा पहनने की आज़ादी दे रहे हैं तो दूसरी तरफ़ विरोधी आवाज़ों के ख़िलाफ़ उतने ही सख़्त हैं.
दूसरी तरफ़ क्राउन प्रिंस सलमान ने भी सऊदी के रूढ़िवादी समाज में ख़ुद को एक सुधारक के तौर पर पेश किया. दूसरी तरफ़ उन्होंने बुद्धिजीवियों, महिला अधिकार की बात करने वालों की गिरफ़्तारियां भी करवाईं.
जून 2017 में क्राउन प्रिंस सलमान जब शाही शासन में आए तब से अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप से रिश्ते और मज़बूत हुए हैं.
एनबीसी को दिए इंटरव्यू में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने यहां तक कह दिया था कि उनके लिए सऊदी अरब से हथियारों का सौदा अमरीकी मूल्य लोकतंत्र और मानवाधिकारों से ज़्यादा अहम है. ट्रंप के उस नारे का मतलब साफ़ था कि वो अमरीका को फिर से कैसे महान बनाना चाहते हैं. ट्रंप ने साफ़ कह दिया था कि उनके लिए जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या से ज़्यादा अहम सऊदी से हथियार सौदा है.
आलोचकों का यह भी कहना है कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप अमरीका के मानवाधिकारों को लेकर झंडाबरदार बनने वाली छवि को स्वेच्छा से पीछे छोड़ देना चाहते हैं और वो सऊदी के साथ रिश्तों में इसे बिल्कुल आड़े नहीं आने देना चाहते. हालांकि ये भी कहा जाता है कि अमरीका मानवाधिकारों की पैरोकारी का चोला बहुत पहले ही उतार चुका है.
73 साल के संबंधों में ऐसे केवल दो मौक़े आए हैं जब अमरीका और सऊदी में तनाव की स्थिति बनी.
ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन और 'किंग्स एंड प्रेसिडेंट्स: सऊदी अरबिया एंड द यूनाइटेड स्टेट्स सिंस एफ़डीआर' के लेखक राइडेल ने वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा है, ''1962 में राष्ट्रपति जॉन एफ़ केनेडी को तब के क्राउन प्रिंस फ़ैसल को दास प्रथा को ख़त्म करने के लिए मनाना पड़ा था. दूसरा मौक़ा तब आया जब 2015 में राष्ट्रपति बराक ओबामा को किंग सलमान को जेल में बंद राइफ़ बदावी को सार्वजनिक रूप से शारीरिक सज़ा देने से रोकने के लिए मनाना पड़ा था."
"बदावी को दस सालों की क़ैद और इस्लाम को अपमानित करने के मामले में एक हज़ार कोड़े मारने की सज़ा मिली है. उन्हें ये सज़ा एक ब्लॉग लिखने के कारण मिली है. 50 कोड़े बदावी को पहले ही लगाए जा चुके हैं.''
जिमी कार्टर को अमरीका का इस मामले में पहला राष्ट्रपति माना जाता है जिन्होंने विदेश नीति में मानवाधिकार को शीर्ष पर रखा. 1977 से अमरीकी विदेश मंत्रालय ने दुनिया के देशों की मानवाधिकारों पर वार्षिक रिपोर्ट बनानी शुरू की थी. राइडेल का कहना है कि न तो कार्टर ने और न ही बाक़ी राष्ट्रपतियों ने कभी सऊदी पर इस तरह की रिपोर्ट बनाई.
क्राउन प्रिंस सलमान के आने के बाद से सऊदी में बड़ी संख्या में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली महिलाओं और वक़ीलों को गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिया गया और राष्ट्रपति ट्रंप ने भी अपने पूर्ववर्तियों का ही रुख़ अख़्तियार किया.
ट्रंप ने साफ़ कर दिया था, "उनके लिए फ़ायदे के आर्थिक संबंध मायने रखते हैं न कि मानवाधिकार." मई 2017 में ट्रंप ने पहला विदेशी दौरा के लिए सऊदी अरब को चुना था. इससे पहले के राष्ट्रपति पहले विदेशी दौरे के तौर पर पड़ोसी कनाडा या मेक्सिको को चुनते थे.
अपने सऊदी दौरे पर ट्रंप ने कहा था, ''मैं यहां भाषण देने नहीं आया हूं. मैं यहां इसलिए नहीं आया हूं कि आपको बताऊं कि कैसे रहना है, क्या करना है और कैसे अपने अराध्य की पूजा करनी है.''
पिछले तीन सालों में हाउस ऑफ सऊद और व्हाइट हाउस में क़रीबी और बढ़ी है. ट्रंप के दामाद जैरेड कशनर और सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन-सलमान में गहरी दोस्ती है. दोनों के बीच ये संबंध अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान पनपा था और 2016 में ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद भी जारी रहा.
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