इराक़ में लोगों का ग़ुस्सा आख़िर क्यों फूटा?

    • Author, इक़बाल अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

इराक़ के शहर कर्बला में स्थित ईरानी वाणिज्य दूतावास में घुसने की कोशिश कर रहे प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ सुरक्षाकर्मियों की जवाबी कार्रवाई में तीन प्रदर्शनकारी मारे गए. लेकिन इराक़ की मौजूदा सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन और प्रदर्शनकारियों की मौत का ये सिलसिला यहीं से शुरू नहीं हुआ.

इसकी शुरूआत हुई एक अक्तूबर (2019) से जब प्रदर्शनकारी राजधानी बग़दाद में बड़ी संख्या में सड़कों पर आ गए. जल्द ही विरोध प्रदर्शन और हिंसा की ये आग दक्षिणी इराक़ के कई शहरों में फैल गई. लेकिन सरकार ने लोगों के प्रदर्शन को सख़्ती से कुचल दिया.

एक से लेकर छह अक्तूबर के बीच हुई हिंसा में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ 149 आम नागरिक और आठ सुरक्षाकर्मी मारे गए. इसमें तीन-चौथाई मौत अकेले बग़दाद में हुई थी. हिंसा की जाँच के लिए बनी सरकारी कमेटी के अनुसार सुरक्षाकर्मियों ने अत्यधिक बल का प्रयोग किया.

प्रदर्शन और हिंसा का दूसरा दौर 25 अक्तूबर को शुरू हुआ. 25 अक्तूबर को प्रधानमंत्री आदिल अब्दुल महदी की सत्ता के एक साल पूरे हुए थे. इराक़ में पिछले साल मई में आम चुनाव हुए थे, लेकिन सरकार बनने में सात-आठ महीने लग गए और बड़ी मुश्किल से आदिल अब्दुल महदी को प्रधानमंत्री बनाया गया.

एक अक्तूबर से शुरू हुए इन प्रदर्शनों में अब तक 250 से ज़्यादा लोग मारे गए हैं और 5000 से ज़्यादा लोग घायल हो चुके हैं.

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वो भ्रष्टाचार, बढ़ती बेरोज़गारी और बहुत ही ख़राब नागरिक सुविधाओं के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरे हैं.

इराक़ के राष्ट्रपति बरहाम सालेह ने कहा है कि प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए किसी दूसरे व्यक्ति को चुन लेने और नए चुनावी क़ानून का ड्राफ़्ट तैयार होने के साथ ही मौजूद प्रधानमंत्री इस्तीफ़ा देने को तैयार हैं. लेकिन प्रदर्शनकारी सिर्फ़ इस्तीफ़ा नहीं चाहते हैं, पूरी व्यवस्था को बदलना चाहते हैं.

एक प्रदर्शनकारी नौजवान का कहना था, ''हम लोग कर्फ़्यू के बावजूद प्रदर्शन कर रहे हैं. अपने अधिकार को माँगने के लिए. हम शासन को बदलना चाहते हैं. उन्होंने हमारे साथ जो किया है, वैसे तो उन्होंने इस्लामिक स्टेट के साथ भी नहीं किया. हम लोग क्या आत्मघाती हमलावर हैं. हम लोग तो सिर्फ़ अपने और अपने लोगों के अधिकार को माँगने के लिए जमा हुए हैं.''

क्या और भी हैं वजहें

क्या ये सिर्फ़ भ्रष्टाचार और बेरोज़गारी के कारण लोगों का ग़ुस्सा है जो इराक़ के कई शहरों में फूट रहा है या इसके पीछे कुछ और है.

मध्य-पूर्व के विशेषज्ञ और जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में पढ़ा चुके प्रोफ़ेसर एके पाशा के अनुसार इसके कई कारण हैं.

बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, ''इराक़ के हालात बहुत संगीन हैं. इसके कई कारण हैं. एक तो वहाँ के अंदरुनी हालात बद से बदतर हो रहे हैं. दूसरी वजह है ईरान के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. तीसरी वजह है सऊदी अरब और यूएई मिलकर इराक़ के अंदरुनी मामलात को प्रभावित कर रहे हैं और चौथी वजह है अमरीका, इस्लामिक स्टेट, कुर्द और तुर्की का हस्तक्षेप इराक़ में है. इन सबके अलावा वहाँ की आर्थिक स्थिति बेहद ख़राब हो गई है. बेरोज़गारी, महंगाई, बिजली-पानी का संकट और सालों से मौजूद दूसरे मसले, इन सबको लेकर वहाँ शोले भड़क गए हैं.''

लेकिन क्या केवल भ्रष्टाचार या बेरोज़गारी और मंहगाई के कारण हालात इस क़दर ख़राब हो गए हैं कि लोग सड़कों पर उतरकर सुरक्षाकर्मियों की गोली खाने के लिए भी तैयार हैं.

इराक़ पर अमरीकी हमले (2003) का असर?

जॉर्डन और लीबिया में भारत के राजदूत रह चुके पूर्व राजनयिक अनिल त्रिगुनायत के अनुसार इराक़ में आज जो कुछ हो रहा है, उसकी जड़ें बहुत हद तक साल 2003 में हैं जब अमरीका ने इराक़ पर हमला किया था.

अनिल त्रिगुनायत कहते हैं, ''इस पूरे रीजन (मध्य-पूर्व) में चाहे आतंकवाद की शुरुआत हो या अस्थिरता हो, ये सब हुई है साल 2003 के बाद से. उस समय इराक़ धर्मनिरपेक्ष मुल्क होता था. लेकिन जब ये लड़ाई हुई तो लोगों का मानना है कि अमरीका ने इराक़ को ईरान के हवाले कर दिया. वहाँ पर जो शिया-सुन्नी का झगड़ा है उसे और हवा मिल गई. इसके अलावा अमरीकी हमले के बाद वहाँ जो कॉन्फ़ेशनल सिस्टम लागू हुआ, वो सबसे बड़ी राजनीतिक समस्या है. वहाँ पर ईरानी प्रभाव भी काफ़ी है. अब लोग ये नहीं चाहते हैं कि वहां अमरीकी या ईरानी प्रभाव बढ़ता रहे. अब लोग चाहते हैं कि इराक़ी प्रभाव बढ़े. वो चाहते हैं कि इराक़, इराक़ियों के ज़रिए और इराक़ियों के लिए आगे बढ़े. आपने इराक़ में सद्दाम हुसैन को हटा तो दिया लेकिन उसके बाद कैसे वहां एक सिस्टम डेवेलप होगा, कैसे वहां लोगों का समग्र विकास होगा उन सबके बारे में आपने सोचा ही नहीं.''

विदेशी ताक़तों की दख़लअंदाज़ी

ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता आयातुल्लाह ख़ामेनेई ने इन सबके लिए अमरीका और मध्य-पूर्व के दूसरे देशों को ज़िम्मेदार ठहराया है.

प्रोफ़ेसर पाशा का भी मानना है कि इराक़ में विदेशी हस्तक्षेप बहुत है. उनके मुताबिक़ कुछ महीने पहल बसरा में भी जो ईरान विरोधी प्रदर्शन हुए थे, उनमें जानकार सऊदी अरब का हाथ बता रहे थे और इस बार भी बाहरी शक्तियां शामिल हैं.

वो कहते हैं, ''चूंकि अमरीका ने ईरान पर हमला करने से गुरेज़ कर दिया जो कि सऊदी अरब, यूएई और इसराइल चाहते थे, तो अब इन्होंने अप्रत्यक्ष तरीक़ा अपनाया है. इराक़ और लेबनान में अगर आप ग़ौर से देखें तो दोनों देशों में प्रदर्शनकारियों की माँग एक जैसी हैं. लेबनान में हिज़बुल्लाह (ईरान समर्थित संगठन) के ख़िलाफ़ और इराक़ में ईरान के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हो रहे हैं.''

लेकिन इराक़ में ये पहली बार हो रहा है कि शिया बहुल इलाक़े में ईरान के ख़िलाफ़ लोग सड़कों पर हैं. ईरानी दफ़्तरों पर हमले कर रहे हैं और ईरान के ख़िलाफ़ नारे लगा रहे हैं.

इसका कारण बताते हुए प्रोफ़ेसर पाशा कहते हैं, ''ढाई लाख सीरिया के शरणार्थी हैं और 10-12 लाख आंतरिक विस्थापिक लोग हैं. उनपर क़रीब 100 अरब डॉलर का ख़र्च आने वाला है. इराक़ी सरकार इन चीज़ों में उलझी हुई है. सुन्नी इलाक़े में जो असुरक्षा थी, उससे इस्लामिक स्टेट उबर कर निकला और वहाँ अमरीका भी उलझ गया. शिया बहुल इलाक़ों की अनदेखी की गई जिसके कारण हालात ऐसे पैदा हो गए हैं कि उनका इस्तेमाल ईरान के ख़िलाफ़ कर रहे हैं और प्रधानमंत्री मेहदी को निशाना बना रहे हैं.''

दूसरा अरब स्प्रिंग?

इराक़ के अलावा लेबनान में भी पिछले कई दिनों से लोग सड़कों पर हैं. लोगों ने सैकड़ों किलोमीटर लंबी ह्यूमन चेन बनाई और कई लोग कह रहे थे कि उन्हें पहली बार लेबनानी नागरिक होने पर गर्व हो रहा है.

तो क्या इन सबको नया या दूसरा अरब स्प्रिंग कहा जा सकता है.

अनिल त्रिगुनायत कहते हैं, ''इराक़ में, लेबनान में या सूडान और अलजीरिया में मैं समझता हूं कि ये अरब स्प्रिंग 2.0 की शुरुआत है. जहाँ लोग अपनी मौजूदा सरकारों से बहुत ख़फ़ा हैं. ख़फ़ा इसलिए हैं क्योंकि उनकी बुनियादी ज़रुरतों का भी ख़याल नहीं रखा गया. इराक़ में तो लोग समझते हैं कि उनकी सरकार या तो अमरीका के बारे में सोचती है या ईरान के बारे में.''

लेकिन प्रोफ़ेसर एके पाशा इससे पूरी तरह सहमत नहीं हैं.

उनके अनुसार, ''ये तो फ़िलहाल इराक़ और लेबनान में ही हो रहा है. मिस्र में छोटे-मोटे प्रदर्शन हुए हैं. लेकिन इन दोनों मुल्कों में मुख्य प्लेयर सऊदी अरब ही है जिसमें अमरीका, इसराइल और यूएई शामिल हैं. दोनों व्यवस्था को पूरी तरह बदलने की बात कर रहे हैं. जिसमें इन तीन-चार क्षेत्रीय शक्तियों का हाथ माना जाता है और ये ताक में थे कि ईरान को किसी न किसी तरह निशाना बनाएंगे.''

कुछ लोग इसे साल 2011 के अधूरे एजेंडे को पूरी करने की कोशिश भी कह रहे हैं. लेकिन प्रोफ़ेसर पाशा के अनुसार साल 2011 के अरब स्प्रिंग के दौरान गद्दाफ़ी, मुबारक, ज़ैनुल आबिदीन, अली अबदुल्लाह सालेह जैसे नेता जो 30-40 साल से सत्ता में थे, वो तो हटा दिए गए लेकिन उसके बाद जो हालात पैदा हुए उनमें ट्यूनीशिया को छोड़कर बाक़ी जगहों में रुझान लोकतंत्र की तरफ़ नहीं था.

क्या होगा भविष्य?

लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि आगे क्या होगा. इस सवाल पर अनिल त्रिगुनायत कहते हैं, ''अभी निकट भविष्य में तो आप नहीं कह सकते कि सबकुछ ठीक हो जाएगा. अगर हिंसा पर क़ाबू पा लिया गया तो संभव है कि वहां सत्ता परिवर्तन के साथ-साथ विकास और ख़ुशहाली आ सकती है. लेकिन जिस तरह के हालात इस वक़्त दिख रहे हैं उसमें बहुत ज़्यादा आशान्वित होना थोड़ा सा मुश्किल लगता है.''

प्रोफ़ेसर पाशा भी मानते हैं कि इराक़ में ईरान के हस्तक्षेप को कम करना फ़िलहाल मुश्किल है.

उनके अनुसार इतनी आसानी से ईरान वहां से हटने वाला नहीं है क्योंकि उसकी भी संस्थागत पहुंच है. ईरान के पास इराक़ में 'मोबिलाइजेशन फ़ोर्सेज़' है, राजनीतिक पार्टियां हैं. बिजली और दूसरे विभाग में उसका दख़ल है. सेना में भी उनका बहुत हस्तक्षेप है. प्रोफ़ेसर पाशा के अनुसार आने वाला समय और ख़राब हो सकता है.

वो कहते हैं, ''कुछ समय तक ये प्रदर्शन होते रहेंगे. मेरे ख़याल में ईरान और सऊदी अरब के बीच जो शीत युद्ध चल रहा है जिसके शिकार, इराक़, लेबनान और यमन हो रहे हैं, ये धीरे-धीरे बढ़कर दूसरे देशों में भी फैलने की आशंका है. इस आग की चपेट में सऊदी अरब, बहरीन और संभव है कि जॉर्डन भी शामिल हो सकता है.''

ये दूसरा अरब स्प्रिंग है या नहीं, इराक़ में लोग अपने हक़ के लिए सड़कों पर हैं या इराक़ बाहरी शक्तियों की लड़ाई का केवल एक मोहरा है, कुछ भी बहुत दावे से कहना मुश्किल है. जो सच है वो ये कि बग़दाद की सड़कों पर आम लोगों का ख़ून बह रहा है.

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