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क्या सीरिया संकट, ट्रंप शासन के अंत की दस्तक है? नज़रिया
सीरिया पर राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की नीति एक ऐसी विपदा है जो उन्होंने ख़ुद पैदा की है, जिसकी क़ीमत शायद उन्हें 2020 के आम चुनावों में चुकानी पड़े. महाभियोग में ऐसा कोई अनुच्छेद नहीं होगा जिसमें ट्रंप के कथित भारी अपराधों और ग़लतियों के साथ-साथ सीरिया के संबंध में लिया गया उनका ताज़ा फ़ैसला शामिल हो. ऐसा कहना है अमरीका के पूर्व उप विदेशमंत्री पीजे क्राउली का.
लेकिन तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन के सामने उनके समर्पण के बाद जो विपदा अब सामने आ रही है, वो ट्रंप के शासन के अंत की शुरुआत भी हो सकती है.
पढ़ें अमरीका के पूर्व उप विदेशमंत्री पीजे क्राउली का विश्लेषण
ट्रंप महाभियोग से बच जाएंगे, क्योंकि रिपब्लिकन नियंत्रित सीनेट शायद ही उन्हें दोषी क़रार दे, बावजूद उनका अपना ही सबसे घातक दुश्मन बने रहना जारी रहेगा.
राष्ट्रपति सोचते हैं कि यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लादिमीर ज़ेलेंस्की को फ़ोन करना बिल्कुल 'ठीक' था. लेकिन व्हाइट हाउस ने इस बातचीत का जो मज़मून सार्वजनिक किया है, वो इस बात का ठोस सबूत है कि अपराध किया गया था.
यूक्रेन घरेलू राजनीति में एक मुद्दा बन चुका है, लेकिन ट्रंप समर्थक अभी भी सौम्य छवि ही देख रहे हैं.
सीरिया एक अलग मुद्दा है. ये ऐसा कुछ नहीं है कि वो बराक ओबामा या डेमोक्रेट्स पर दोष मढ़ दें. ताज़ा प्रतिबंधों के साथ तुर्की को सज़ा देने की प्रशासन की मंशा के बावजूद, ये एक ऐसा संकट है जिसे ट्रंप ने ख़ुद पैदा किया.
ट्रंप के लिए, सीरिया और तुर्की के बीच अशांत सीमाई इलाक़े से अमरीकी फ़ौजों को हटाने का उनका फ़ैसला, उनके चुनावी जनमत के अनुसार ही है, क्योंकि उन्होंने वादा किया था कि बहुत जटिल और ख़र्चीले मध्यपूर्व संकट से अमरीकी फ़ौजों को वापस बुलाया जाएगा.
उन्होंने ट्वीट किया था, "अब समय आ गया है कि हम इन मूर्खतापूर्ण अंतहीन युद्धों से बाहर आएं." और उन्होंने बड़े अक्षरों में ज़ोर देकर कहा था, "हम वहीं लड़ेंगे जहां हमारे फ़ायदे की बात होगी और जहां हम जीत सकते हैं."
हालांकि उनके अधिकांश डांवाडोल और विरोधाभासी बयानों और ट्वीट को नज़रअंदाज़ करने की इच्छा होती है लेकिन इस मामले में अर्दोआन ट्रंप को किताब की तरह पढ़ रहे हैं और बहुत चतुराई से पेश आ रहे हैं.
जब अर्दोआन ने हालिया फ़ोन कॉल के दौरान ट्रंप को बताया कि उन्होंने सीरिया में अपनी फ़ौजें भेजने की योजना बनाई है ताकि तुर्की की सीमा के पास एक स्वायत्त क़ुर्द इलाक़ा बनने की संभावना को ख़त्म किया जा सके, तो ये संभव है कि उन्होंने ये सोचा होगा कि ट्रंप उन्हें न्यूनतम प्रतिरोध खड़ा करने का आश्वासन देंगे.
2018 के अंत में एक अन्य बातचीत में ट्रंप ने सीरिया से अमरीकी सैनिकों को वापस बुलाने की अपनी इच्छा का संकेत दिया था और कथित तौर पर उन्होंने अर्दोआन से कहा था, "ठीक है, अब ये सब आपका है. हमारा काम ख़त्म."
इसी का नतीजा रहा कि रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस का इस्तीफ़ा हो गया, जो राष्ट्रीय सुरक्षा में मौजूद 'अंतिम समझदार' व्यक्ति थे जो ट्रंप की उत्तेजना को नियंत्रित करने की इच्छा रखते थे.
साख पर सवाल
इसके 10 महीने बाद, जब अर्दोआन ने सैन्य कार्रवाई का फ़ैसला लिया, तो वे जानते थे उनके लिए रास्ता खुला है.
हालांकि ट्रंप की नीति की दोनों दलों की ओर से स्पष्ट आलोचना हुई, यहां तक कि सीनेट में बहुमत के नेता मिच मैककोनल ने भी आलोचना की, लेकिन अधिकांश अमरीकी मध्य-पूर्व के युद्ध से ऊब चुके हैं और उन्होंने सैनिकों की घर वापसी का समर्थन किया था.
लेकिन ट्रंप ने इसे सबसे घातक तरीक़े से अंजाम दिया.
ब्रितानी और फ़्रांसीसी सेना के साथ, अमरीकी फ़ौज की अपेक्षाकृत एक छोटी टुकड़ी इस्लामिक स्टेट के उभार को रोकने के लिए वहां मौजूद थी. सीरिया का पुनर्निर्माण और भविष्य के शासन के लिए लंबित कूटनीतिक प्रक्रिया के दरमियानी वक़्त के लिए ये सैनिक वहां रखे गए थे.
अपनी उद्यमी पृष्ठभूमि के बावजूद ट्रंप ने वो सारे फ़ायदे रूस, ईरान, असद सरकार और यहां तक कि इस्लामिक स्टेट के सामने गंवा दिए जो अमरीका के पास एक नए सीरिया को आकार देने के लिए हो सकते थे.
अमरीका के पीछे हटने से पैदा हुए शून्य में जगह लेने सीरियाई और रूसी फ़ौजें चल चुकी हैं. तुर्की की सैन्य कार्रवाई के दौरान कुर्दों की हिरासत में मौजूद इस्लामिक स्टेट के लड़ाके आज़ाद हो गए हैं और इनकी संख्या कितनी है पता नहीं. कोई भी ये अनुमान लगा सकता है कि ट्रंप की 'रास्ते से हटने' की रणनीति, ईरान के ख़िलाफ़ अधिकतम दबाव की नीति के साथ कैसे फ़िट बैठती है.
इससे भी महत्वपूर्ण बात ये है कि मध्यपूर्व और अन्य जगहों पर भी एक साझीदार के रूप में अमरीका की साख़ और विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा हो गया है.
इस्लामिक इस्टेट के ख़िलाफ़ सैन्य अभियान के दौरान कुर्दों और अमरीकी सैनिकों के बीच, युद्ध में आज़माया गया रिश्ता क़ायम हो गया था, जिसकी अहमियत को ट्रंप ने ख़ारिज कर दिया है.
रक्का और इस्लामिक स्टेट के अन्य गढ़ों पर फिर से क़ब्ज़ा करने में ज़मीनी स्तर पर कुर्द लड़ाके गठबंधन फ़ौजों के अगुवा थे.
सहयोगी हताश
यहां बहुत कुछ भविष्य की गर्त में है.
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान कुछ कुर्दों ने गठबंधन पक्ष की ओर से लड़ाई में हिस्सा लिया था, लेकिन तब इस देश को पहचान नहीं मिली और फ़िलहाल अभी भी वही हाल है.
जर्मनी और जापान इस समय अमरीका के पक्के सहयोगी हैं, तब ये दोनों इसके दुश्मन थे. दक्षिण कोरिया और इसराइल क़ब्ज़े में थे या स्वतंत्र देश नहीं बने थे.
जापान और दक्षिण कोरिया पहले ही इस बात से हताश हैं कि उत्तर कोरिया से ट्रंप की बातचीत आख़िरकार, उनके सुरक्षा और मानवाधिकार की वैध चिंताओं को हल नहीं कर पाएगी.
कुर्दों के प्रति ट्रंप का घमंडी रवैया, इन चिंताओं को और बढ़ाएगा ही.
नैटो के जो आज सहयोगी देश हैं उनमें से अधिकांश देश और जो मध्यपूर्व में अपनी सुरक्षा के लिए अमरीका पर भरोसा करते हैं, उनके लिए भी ये कोई अच्छा संकेत नहीं है. और न ही वे ट्रंप की कसौटी पर खरे उतरते हैं.
ईरान को लेकर ट्रंप के विरोधाभासी रवैये से सऊदी अरब पहले ही हतोत्साहित हो गया है. मसलन एक अमरीकी ड्रोन के मार गिराए जाने के ख़िलाफ़ सैन्य हमले का आदेश देना और अचानक इसे रद्द कर देना.
सऊदी कथित तौर पर तेहरान से बातचीत की कोशिश कर रहा है. असल में ट्रंप ईरान को अलग थलग करने की बजाय इलाक़ाई समायोजन कर रहे हैं.
लेकिन उनके इस रवैये ने इसराइल में समस्या खड़ी कर दी है.
सीरिया ने ईरान को इसराइल के दरवाज़े पर ला खड़ा किया है. इसराइल जितना महसूस करेगा कि वो ईरान से भिड़ने के लिए अकेला छोड़ दिया गया है, सीधी सैन्य भिड़ंत का ख़तरा भी उतना ही ज़्यादा होगा, जिसमें अनिवार्य रूप से अमरीका को शामिल होना पड़ेगा.
यही वो विनाशकारी पहलू है जिसकी वजह से ओबामा और उनके यूरोपीय समकक्षों ने सोचा था कि परमाणु समझौता एक आगे बढ़ी बात है, जिसे ट्रंप ने नष्ट कर दिया है.
अमरीका के वैश्विक गठबंधन का नेटवर्क उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय स्थिरता की बुनियाद पर खड़ा है. और ट्रंप जानबूझकर इसे नज़रअंदाज़ कर रहे हैं. इसके सबूत अधिकाधिक मिल रहे हैं और बिल्कुल स्पष्ट हैं.
हालांकि उन्होंने अमरीका के नेतृत्व की ज़िम्मेदारियों के प्रति अपने संशय को छिपाया नहीं, सीरिया इस बात का सबूत है कि ट्रंप अपने मुख्य काम के साथ कितना बुरा कर रहे हैं- अमरीका के राष्ट्रीय हित को बढ़ाने और इस प्रक्रिया में अपने सहयोगियों के साथ.
फ़ैसले की क़ीमत
दुनिया को अपनी फ़िक्र ख़ुद करने देने को ऊपर रखने की ट्रंप की नीति की वास्तविक क़ीमत बहुत ज़्यादा होने वाली है.
एक अच्छी ख़बर ये है कि ये ऐसा सरकारी फ़ैसला नहीं है जिसका अधिकांश अमरीकी समर्थन करते हों. हाल ही में शिकागो काउंसिल ऑन ग्लोबल अफ़ेयर पोल में पता चला कि निर्णायक बहुसंख्या दुनिया में अमरीका की सक्रिय भूमिका के पक्ष में हैं, इलाक़ाई गठबंधनों के समर्थन और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के प्रति उनका सकारात्मक रवैया है.
असल में ट्रंप की विदेश नीति के मुख्य आधार स्तंभ को नकारने जैसा है. सीरिया और इसके साथ ही रूस को लेकर अपनी आंखें बंद करने वाला उनका रुख़ दिखाता है कि वो अंतरराष्ट्रीय संबंधों को भी गड्डमड्ड कर रहे हैं. अपने राजनीतिक हितों के लिए उन्होंने राष्ट्रीय हित को देखना बंद कर दिया है.
कुल मिलाकर ट्रंप के पुनः चुने जाने की संभावना पर इसका असर पड़ना चाहिए. बुरी ख़बर ये है कि अपना अगला राष्ट्रपति और एक अलग विदेश नीति चुनने के लिए अमरीकी मतदाताओं को अगले नवंबर तक इंतज़ार करना पड़ेगा.
ट्रंप समर्थक सैनिकों की वापसी का सर्थन कर रहे हैं
लॉरेन टर्नर, बीबीसी न्यूज़, मिनीपोलिस
"हमें दुनिया का दरोगा बनने की क्या ज़रूरत है?"
सेंट्रल मिनीपोलिस में उनकी रैली में शामिल होने वाले ट्रंप के अधिकांश समर्थकों के लिए, अमरीका के पीछे हटने के बाद सीरिया पर तुर्की के हमले पर नज़रिए एक जैसे हैं.
24 साल के एलेक्स लेडेज़्मा के अनुसार, "मेरे हिसाब से ये बहुत बढ़िया है कि तुर्की और सीरिया की समस्या में अपने सैनिकों को शामिल करना हमने बंद कर दिया. हम उनकी आया नहीं हैं."
52 वर्षीय मेलिसा एरा का कहना था, "वहां जो कुछ हो रहा है, सैकड़ों साल से होता आया है. वहां हमारे कितने लोगों को मरना पड़ेगा, एक ऐसी चीज़ के लिए जो हमारा मुद्दा नहीं है. हम वहां हों या नहीं, वहां ये सब चलता रहना है."
लेकिन मैरीन कॉर्प्स के रिटायर्ड फ़ौजी एरिक रैडज़ीज का अलग मानना है.
वो कहते हैं, "मेरी सोच थी कि अफ़ग़ानिस्तान से इतनी जल्दी निकलना एक ग़लती थी. लेकिन हालात और ख़राब होते हैं, तो हमने ये भी नहीं कहा था कि हम वापस नहीं जाएंगे. अफ़ग़ानिस्तान में हमने वापसी के लिए काफ़ी इंतज़ार किया."
उनके मुताबिक़, "कुछ और साझीदार हैं जो वहां जा सकते हैं. हम हमेशा पूरी दुनिया का बोझ नहीं ढो सकते."
(पीजे क्रॉले अमरीका के पूर्व उप विदेश मंत्री और 'रेड लाइनः अमरीकन फॉारेन पॉलिसी इन ए टाइम ऑफ़ फ़्रैक्चर्ड पॉलिटिक्स एंड फ़ेलिंग स्टेट्स' के लेखक हैं.)
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