कनाडा के वोटर ट्रूडो को माफ़ी देंगे या सज़ा?

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- Author, वात्सल्य राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की नज़र एक बार फिर देश की सबसे अहम राजनीतिक कुर्सी पर है. वोटरों के सपनों को पूरा करने का वादा करते हुए ट्रूडो दावा कर रहे हैं कि कनाडा के लिए वो ही 'सर्वश्रेष्ठ विकल्प' हैं.
ट्रूडो 47 बरस के हैं. चार साल पहले मतदाताओं ने उन पर एतबार किया था. तब उन्हें वैसा ही समर्थन मिला जैसा 1970 के दशक में उनके पिता पिएर ट्रूडो को मिलता था. साल 2015 में जस्टिन ट्रूडो की लिबरल पार्टी सरकार बनाने में कामयाब रही.
क्षेत्रफल के लिहाज़ से दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश कनाडा की आबादी क़रीब साढ़े तीन करोड़ है. कनाडा की संसद यानी हाउस ऑफ़ कॉमन्स में कुल 338 सीटें हैं और एक पार्टी को बहुमत की सरकार बनाने के लिए 170 सीटों की ज़रूरत होती है.
कनाडा में भारत के राजदूत रहे विष्णु प्रकाश वहां की राजनीति पर क़रीबी नज़र रखते हैं.
वो बताते हैं, "कनाडा में संसदीय लोकतंत्र है. इंग्लैंड के क्वीन हों या किंग वो कनाडा में अपना प्रतिनिधि नियुक्त करते हैं जिनको गवर्नर जनरल कहा जाता है. हालांकि वो ये फ़ैसला प्रधानमंत्री के सुझाव पर ही करते हैं. वहां फ़र्स्ट पास्ट द पोस्ट सिस्टम है. जैसी ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली है, कनाडा में भी वैसी ही है."
अपने व्यवहार से जीता दिल
चार साल पहले ट्रूडो हवा के ताज़ा झोंके की तरह आए और चुनावी समीकरण को अपने हक़ में कर लिया. अपने लुक्स के लिए दुनिया भर में चर्चा पाने वाले 'चार्मिंग' ट्रूडो का जादू प्रधानमंत्री बनने के बाद भी बना रहा.
वो बेटे को लेकर ऑफ़िस पहुंचे तो सुर्खियां बनीं. पतलून के नीचे से मोज़े दिखे तो चर्चा हुई और जब उन्होंने कोई चुनावी वादा पूरा किया तो वाह वाही मिली.
कनाडा के सरी में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार राजीव विश्वकर्मा कहते हैं कि पीएम ऑफ़िस में ट्रूडो का हनीमून पीरियड उम्मीद से कहीं लंबा रहा.
वो बताते हैं, "लोगों को ये अंदाज़ा नहीं था कि ट्रूडो अपने आधे कार्यकाल के बाद भी इतने लोकप्रिय रहेंगे. उन्होंने शुरुआत में ऐसे क़दम उठाए जिन्हें लेकर लोगों ने उनको काफ़ी पसंद किया."

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ट्रूडो के फ़ैसले
ट्रूडो के मंत्रिमंडल में महिलाओं की ख़ासी नुमाइंदगी ने दुनिया का ध्यान खींचा. उन्होंने मारिजुआना से पाबंदी हटाने का चुनावी वादा पूरा किया. कई दूसरे वादे भी उनके एजेंडे में रहे लेकिन चुनाव सुधार समेत कई अहम वादों को उन्होंने हाशिए पर डाल दिया.
राजीव विश्वकर्मा बताते हैं, "ऐसी बातें हुईं जिन्हें लेकर उनके लिए मुश्किलें हुईं जैसे यहां मारिजुआना लीगल हो गया. लेकिन इसे लेकर जिन लोगों पर आपराधिक मामले चल रहे थे और जो लोग पकड़े गए थे, उन्हें उम्मीद थी कि उनके केस ख़त्म हो जाएंगे लेकिन उन्होंने इसे ख़त्म नहीं किया. ट्रूडो ने अपनी कैबिनेट में महिलाओं को प्रतिनिधित्व दिया. उसके बाद उम्मीद की जा रही थी कि वो चुनाव व्यवस्था में सुधार करेंगे ताकि अधिक महिलाएं चुनाव लड़ सकेंगी लेकिन वो संवैधानिक सुधार नहीं हुए."
सऊदी अरब के साथ हुई डील, बिटुमिन सप्लाई के लिए पाइप लाइन ख़रीदने के समझौते और प्रवासियों पर मेहरबानी दिखाने को लेकर भी ट्रूडो विरोधियों के निशाने पर आए.
कनाडा की कुल आबादी के क़रीब चार फीसद लोग इंडीजिनस यानी देशज समुदाय के हैं. ट्रूडो और लिबरल पार्टी उनसे किए वादे भी पूरे नहीं कर सके और अब चुनाव अभियान के दौरान ट्रूडो के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी और कंज़रवेटिव पार्टी के नेता एंड्रयू शीयर उन्हें सीधे- सीधे 'धोखेबाज़' कह रहे हैं.

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भारत के साथ ट्रूडो के रिश्ते
ट्रूडो का भारत दौरा भी विवादों में रहा और इसे लेकर भी उन्हें मुश्किल सवालों का सामना करना पड़ा. कनाडा में भारत के राजदूत रहे विष्णु प्रकाश ट्रूडो के कार्यकाल का आकलन करते हुए कहते हैं, "ट्रूडो साहब की कुछ कमज़ोरियां हैं. अगर आप चार साल सत्ता में रहेंगे तो कोई न कोई ग़लती होगी. ऐसा कोई व्यक्ति मैंने नहीं देखा कि चार साल सत्ता में रहे और ग़लती न करे. उनसे जो ग़लतियां हुईं हैं उसका प्रभाव पड़ा है."
ट्रूडो को भी अंदाज़ा है कि वोटरों के सामने आईं उनकी कमज़ोरियां चुनाव के गणित पर असर डाल सकती हैं और इसलिए वो मौक़े बे मौक़े माफ़ी मांग रहे हैं.
उन ग़लतियों के लिए भी जो उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के डेढ दशक पहले भी की थीं.

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अपने ही दे रहे हैं चुनौती
ट्रूडो की मुश्किलें हैं कि कम होती नहीं दिख रहीं. उन्हें घेरने, सवाल उठाने और चुनौती देने वालों में वो चेहरे भी शामिल हैं, जो कभी उनके सहयोगी थे. मसलन पूर्व अटॉर्नी जनरल जूडी विल्सन रेबॉल्ड.
इस साल की शुरुआत में एक स्कैंडल सामने आने के बाद ट्रूडो ने पहले जूडी का पद बदला फिर पार्टी से बाहर कर दिया. अब वो निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर ट्रूडो को चुनौती दे रही हैं.
राजीव विश्वकर्मा बताते हैं, "फ़रवरी में ये मामला जब सामने आया, तब कहा गया कि ट्रूडो और उनके अधिकारी जूडी विल्सन पर दबाव डाल रहे हैं. हुआ ये कि क्यूबिक प्रांत की एक कंपनी थी एसएनसी लेवलीन. उस पर एक भ्रष्टाचार का मुक़दमा था और जूडी ने एक संसदीय समिति को बताया कि वो (ट्रूडो और उनकी टीम) चाहते थे कि ये मुक़दमा न हो क्योंकि ऐसा हुआ तो कंपनी अपना मुख्यालय हटा लेगी. अगर ऐसा हुआ तो हज़ारों लोग बेरोज़गार हो जाएंगे और इसका असर चुनाव पर पड़ेगा."

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जूडी अब ट्रूडो की राह मुश्किल करने की तैयारी में हैं. मुक़ाबले में दूसरे नेता और पार्टियां भी हैं लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर हुए चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों और विश्लेष्कों की राय में ट्रूडो की लिबरल पार्टी को असल चुनौती कंज़रवेटिव पार्टी से मिल रही है.
ताज़ा समीकरण की चर्चा करते हुए राजीव विश्वकर्मा कहते हैं, "यहां दो ही बड़ी पार्टियां हैं, जिनके बीच मुख्य चुनावी मुक़ाबला है. प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की लिबरल पार्टी और दूसरी कंज़रवेटिव पार्टी है. जिसके नेता हैं एंड्रयू शीयर."

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कौन से मुद्दे हैं हावी?
कनाडा अमीर मुल्क है. अर्थव्यवस्था गतिशील है लेकिन वोटरों को भविष्य की चिंता परेशान करती है. टोरंटो जैसे शहरों में घर ख़रीदना बहुत महंगा है. चुनाव में भी अर्थव्यवस्था, रोज़गार और शिक्षा के मुद्दे छाए हुए हैं.
चुनाव के मुद्दों की बात करते हुए पूर्व राजनयिक विष्णु प्रकाश कहते हैं, "कनाडा बहुत बड़ा देश है. यहां आबादी महज़ तीन करोड़ साठ लाख है. जो मिडिल क्लास हैं, वो महसूस कर रहे हैं कि उनकी आय पर दबाव पड़ रहा है. आम तौर पर कनाडा के चुनाव में विदेश नीति का ज़्यादा प्रभाव नहीं पड़ता. सिर्फ़ अमरीका के साथ क़रीबी संबंधों पर असर होता है. उनका 70 फीसदी से ज़्यादा व्यापार अमरीका के साथ होता है. इस वक़्त उनके अमरीका के साथ संबंध स्थिर हैं और अर्थव्यवस्था ठीक है."
इन मुद्दों के अलावा वोटरों के लिए क्लाइमेट चेंज भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है. क़रीब दो साल पहले कंज़रवेटिव पार्टी की कमान संभालने वाले एंड्रयू शीयर इन सभी मुद्दों पर ट्रूडो को घेरने और वादों की झड़ी लगाकर वोटरों को लुभाने की कोशिश में हैं.
लेकिन, दोहरी नागरिकता रखने वाले शीयर के लिए भी प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचना आसान नहीं. नेशनल पोल्स में तीसरे नंबर पर दिख रही वामपंथी रुझान वाली न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी यानी एनडीपी के नेता जगमीत सिंह के ताज़ा रुख़ ने उनकी कंज़रवेटिव पार्टी की राह मुश्किल कर दी है.

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21 अक्तूबर को होने वाले चुनाव के पहले राजनीतिक समीकरणों में आ रहे बदलाव पर नज़र रखने वाले राजीव विश्वकर्मा बताते हैं, "ज्यादातर लोगों का मानना है कि चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिलेगा. तीसरे नंबर पर दिख रही पार्टी है एनडीपी. उनके नेता जगमीत सिंह हैं. उन्होंने अभी हाल में कहा है कि अगर किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला तो वो लिबरल पार्टी को समर्थन देने के लिए तैयार हैं."
जगमीत सिंह सिख समुदाय से आते हैं और विष्णु प्रकाश बताते हैं कि इस समुदाय का एक बड़ा तबक़ा ट्रुडो को पसंद करता रहा है.
वो बताते हैं, "कनाडा में भारतीय समुदाय के 15 से 16 लाख लोग हैं. उनमें क़रीब 5 लाख सिख हैं. उनके लिए ट्रूडो लोकप्रिय नेता हैं. वो उनको प्यार से जस्टिन सिंह कहते हैं. दुर्भाग्य से कनाडा में क़रीब सभी राजनीतिक दल राजनीति के लिए ख़ालिस्तानी तर्जों को सपोर्ट करते हैं. उनके पास गुरुद्वारे का पैसा है. वो संगठित हैं. चुनाव में मदद करते हैं."
माना जाता है कि एक ये वजह भी है कि ट्रूडो अपने कार्यकाल में भारत के साथ उम्मीद के मुताबिक़ रिश्ते नहीं बना सके. हालांकि, राजीव विश्वकर्मा और विष्णु प्रकाश दोनों ही दावा करते हैं कि मौजूदा चुनाव का कनाडा और भारत के रिश्तों पर ख़ास असर नहीं होगा.

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हालांकि, रिश्तों की परिभाषा नए सिरे से लिखने के लिए जस्टिन ट्रूडो को पहले वोटरों का भरोसा हासिल करना होगा.
क्या वो ऐसा कर पाएंगे... जवाब कनाडा के वोटर देंगे. तारीख़ होगी 21 अक्तूबर.
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