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अफ़ग़ानिस्तान से निकलने में अमरीका की मुश्किलें
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अफ़ग़ान तालिबान के साथ ऐसे समय में अचानक शांति वार्ता रद्द की है जब दोनों के बीच समझौता होने की बहुत अधिक संभावनाएं थीं.
ट्रंप ने कई सारे ट्वीट करके बताया था कि उन्हें रविवार को कैंप डेविड में तालिबान नेताओं और अफ़ग़ान राष्ट्रपति के साथ एक गुप्त बैठक में हिस्सा लेना था मगर अब इसे रद्द कर दिया गया है.
अमरीका काफ़ी वक़्त से अफ़ग़ानिस्तान से निकलने की कोशिश कर रहा है लेकिन इसे लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं हो पाया है. अमरीका के इस क़दम के समर्थन और विरोध में कई बातें कही जाती रही हैं.
ऐसे में जानते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान से निकलने को लेकर अमरीका की कश्मकश क्या है और वो इतने लंबे समय से अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध क्यों लड़ रहा है?
सितंबर 11 का हमला
11 सितंबर 2001 को अमरीका में हुए हमले में क़रीब तीन हज़ार लोग मारे गए थे. हमले के कुछ समय बाद ही सामने आ गया था कि चरमपंथी संगठन अल-क़ायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन ने इसके लिए ज़िम्मेदारी ली है.
अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद चरमपंथी संगठन तालिबान ने उस वक़्त ओसामा बिन लादेन को अमरीका को सौंपने से इनकार कर दिया था. इसके एक महीने बाद अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान के ख़िलाफ़ हवाई हमला शुरू कर दिया था.
उस वक़्त अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का शासन था. पर अमरीका समेत दूसरे देशों के इस लड़ाई से जुड़ने के बाद तालिबान को अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता से हटना पडा. लेकिन, तालिबान पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ. उसने वापसी की और उसका प्रभाव बढ़ने लगा.
तब से अमरीका और उसके सहयोगी इस जद्दोजहद में हैं कि अफ़ग़ान सरकार को गिरने से बचाया जाए और तालिबान के हमलों को रोका जाए.
ओसामा बिन लादेन
7 अक्तूबर, 2001 को अफ़ग़ानिस्तान पर हवाई हमले से पहले तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने कहा था, ''हमने ये मिशन नहीं चाहा था, लेकिन हम इसे पूरा करेंगे.''
उन्होंने कहा था, ''ये मिशन अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन को आतंकवाद के लिए इस्तेमाल होने से रोकना है और तालिबान शासन की सैन्य ताक़त पर हमला करना है.''
इन हमलों में तालिबान के सैन्य ठिकानों और अल-क़ायदा के प्रशिक्षण शिविरों को निशाना बनाया गया.
लेकिन, 18 साल बाद आज ये विवाद का विषय है कि अफ़ग़ान में अमरीकी मिशन सफल हुआ या नहीं. अगर शांतिवार्ता सफल होती है तो फिर से अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का शासन हो सकता है. हालांकि, इस बार उसके मुख्य धारा में आने की बात कही जा रही है.
तालिबान ने सबसे पहले 1996 में काबुल पर क़ब्ज़ा किया था और लगभग दो सालों में पूरे देश पर शासन करने लगा था. उसने इस्लाम के कंट्टरपंथी रूप को बढ़ावा दिया और सरेआम फांसी जैसी सजाएं लागू कीं.
अमरीका और उसके सहयोगियों के हमले के दो महीनों के अंदर तालिबान का शासन ख़त्म हो गया और तालिबानी लड़ाके पाकिस्तान में भाग गए.
इसके बाद साल 2004 में अमरीका के समर्थन वाली सरकार बनी लेकिन पाकिस्तान के सीमांत इलाक़ों में तब भी तालिबान का दबदबा बना रहा. साथ ही उसने ड्रग्स, खनन और टैक्स के ज़रिए हर साल लाखों डॉलर की कमाई की.
फिर से ताक़त जुटा रहे इस नए तालिबान ने लगातार आत्मघाती हमले किए और अंतरराष्ट्रीय व अफ़ग़ान सेना के लिए इन पर क़ाबू पाना मुश्किल हो गया.
साल 2014 के अंत तक नाटो के देश इस लड़ाई में लंबे समय तक शामिल होने से पीछे हटने लगे और अफ़ग़ानी सेना पर भार बढ़ गया.
इससे तालिबान को और हिम्मत मिल गई. उन्होंने कई इलाक़ों पर क़ब्ज़ा किया और लगातार बम धमाके किए. पिछले साल छपी बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ अफ़ग़ानिस्तान के 70 प्रतिशत हिस्से पर तालिबान खुले तौर पर सक्रिय है.
कहां से आया तालिबान
अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी हमले से 20 साल पहले से ही युद्ध के हालात थे.
सत्ता पलटने के एक साल बाद 1979 में सोवियत सेना ने वामपंथी सरकार के समर्थन के लिए अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया था. उसकी लड़ाई मुजाहिदीन से थी जिसे अमरीका, पाकिस्तान, चीन और सऊदी अरब का समर्थन हासिल था.
1989 में सोवियत संघ की सेनाएं वहां से चली गईं लेकिन देश में गृह युद्ध चलता रहा. अराजकता के उस माहौल में तालिबान (पश्तो में इसका मतलब है विद्यार्थी) का उदय हुआ.
शुरुआत में उत्तरी पाकिस्तान के सीमांत इलाक़ों में इसका प्रभाव था और फिर 1994 में ये दक्षिणी-पश्चिमी अफ़ग़ानिस्तान तक पहुंच गया. उन्होंने लोगों से भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ने और सुरक्षा बढ़ाने का वादा किया. उस वक़्त अफ़ग़ान के लोग लगातार चल रहे गृह युद्ध से भी थक चुके थे.
यह माना जाता है कि पहले तालिबान धार्मिक स्कूलों में पहुंचा जिनमें से ज़्यादातर सऊदी अरब समर्थित थे और इस्लाम के कट्टर रूप की शिक्षा देते थे.
उन्होंने शरिया या इस्लामी क़ानून को अपने अर्थों में प्रचारित किया और क्रूर सज़ाओं को लागू किया. पुरुषों को दाढ़ी बढ़ाने के लिए कहा और औरतों को बुर्के में रहने के लिए मजबूर किया गया.
तालिबान ने टीवी, संगीत, सिनेमा और लड़कियों की शिक्षा पर रोक लगा दी.
बाद में अल-क़ायदा के लड़ाकों को पनाह देने के चलते तालिबान अमरीका, अफ़ग़ान और अंतरराष्ट्रीय ताक़तों के निशाने पर आ गया.
इतनी लंबी लड़ाई क्यों
अमरीका और तालिबान की लड़ाई इतनी लंबी खिंचने के पीछे कई कारण हैं. इसमें तालिबान का ज़बरदस्त प्रतिरोध, अफ़ग़ान सेना और सरकार की सीमाएं और अफ़ग़ानिस्तान में अपने सैनिकों को रखने की अन्य देशों की अनिच्छा जैसे कारण प्रमुख हैं.
पिछले 18 वर्षों में तालिबान बैकफुट पर रहा है.
इसकी वजह ये भी रही कि 2009 के आख़िर में अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी सैनिकों की संख्या एक लाख तक पहुंच गई थी. इससे तालिबान को दक्षिणी पाकिस्तान के इलाक़ों से निकालने में मदद मिली. हालांकि, ये स्थितियां हमेशा बनी नहीं रहने वाली थीं.
जब अंतरराष्ट्रीय सेनाएं वहां से हटने लगीं तो तालिबान ने ताक़त बटोरनी शुरू कर दी. अफ़ग़ान सेनाएं उनका सामना नहीं कर पाईं.
बीबीसी संवाददाता दाऊद अज़मी ने अफ़ग़ानिस्तान में इस लंबी लड़ाई चलने के पीछे ये मुख्य कारण बताए-
- अफ़ग़ानिस्तान में हमला शुरू होने के बाद से राजनीतिक स्पष्टता की कमी, और पिछले 18 वर्षों में अमेरिकी रणनीति के प्रभाव पर सवाल.
- हर पक्ष इस गतिरोध को तोड़ने की कोशिश कर रहा है लेकिन तालिबान शांति वार्ता के दौरान ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा उठाने की कोशिश में है.
- अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामिक स्टेट के चरमपंथियों की हिंसा में बढ़ोतरी.
- पाकिस्तान की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका रही है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि तालिबान की जड़ें पाकिस्तान में हैं और अमरीकी हमलों के दौरान उसे फिर से उठने में मदद मिली है. हालांकि, पाकिस्तान तालिबान को मदद और सुरक्षा देने की बात से इनकार करता रहा है.
ताक़तवर कैसे हुआ तालिबान
अफ़ग़ानिस्तान दुनिया में अफ़ीम का सबसे बड़ा उत्पादक है. इसकी अधिकतर पैदावर तालिबान के क़ब्ज़े वाले इलाक़ों में होती है. ये तालिबान की कमाई एक बड़ा ज़रिया है.
इसके अलावा तालिबान उसके इलाक़े से होकर जाने वालों से और संचार, बिजली और खनिज जैसे कारोबार से भी कर वसूलता है.
पाकिस्तान और ईरान तालिबान की मदद से इनकार करते रहे हैं लेकिन माना जाता है कि यहां रहने वाले लोगों से तालिबान को मदद मिलती है.
युद्ध की क़ीमत?
ये कह पाना मुश्किल है कि इस लड़ाई में कितने अफ़ग़ान सैनिक मारे गए. अभी तक ऐसी कोई संख्या जारी नहीं की गई है. लेकिन, जनवरी 2019 में, अफ़ग़ानी राष्ट्रपति अशरफ़ गनी ने कहा था कि 2014 से सुरक्षा बलों के 45 हजार सदस्य मारे गए हैं.
2001 के बाद से अंतरराष्ट्रीय सेना के 3500 सदस्य मारे जा चुके हैं जिनमें से 2300 अमरीकी सैनिक हैं.
अब तक मारे गए आम अफ़ग़ानी लोगों की संख्या पता लगा पाना तो और मुश्किल है. फरवरी 2019 में आई संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक 32 हजार से ज़्यादा आम नागरिक मारे गए हैं. वॉटसन इंस्टीट्यूट ऑफ ब्राउन यूनिवर्सिटी के अनुसार 42000 विरोधी लड़ाके मारे गए.
इसी इंस्टीट्यूट का कहना है कि 2001 से इराक़, सीरिया, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में चल रहे टकराव में अमरीका को 5.9 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हुआ है.
अमरीका अब भी तालिबान पर हवाई हमले कर रहा है लेकिन अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप नवंबर 2020 के चुनावों से पहले वहां सेना कम करना चाहते हैं.
अमरीका में कई लोगों का ये भी सोचना है कि अमरीकी सेनाओं के अफ़ग़ानिस्तान से पूरी तरह हटने के बाद एक खालीपन हो जाएगा जिसकी जगह तालीबानी लड़ाके ले लेंगे और पश्चिमी देशों पर हमले की कोशिश करेंगे.
वहीं, इस बीच अफ़ग़ानिस्तान के लोगों को इस ख़ूनी लड़ाई का दंश और झेलना होगा.
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