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कुलभूषण जाधव की सुनवाई अब पाकिस्तान के किस कोर्ट में होगी?
नीदरलैंड्स के हेग में अंतरराष्ट्रीय अदालत ने पाकिस्तान में पकडे गए कथित भारतीय जासूस कुलभूषण जाधव के केस का फ़ैसला सुनाया है.
अदालत ने पाकिस्तान को हिदायत दी है कि वो कुलभूषण की सज़ा की दोबारा समीक्षा करें, जिसमें उन्हें मौत की सजा सुनाई गई थी. इसके साथ ही उन्हें काउंसलर भी मुहैया कराया जाए.
अदालत में भारत की तरफ़ से अपील दायर की गई थी कि उनकी फांसी की सज़ा को रद्द किया जाए और उन्हें बरी कर दिया जाए. कोर्ट ने इस अपील को ख़ारिज कर दिया है.
पाकिस्तान ने भारत की दायर की गई अपील पर आपत्ति जताई थी जिसे बुधवार को अंतरराष्ट्रीय कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया. अदालत ने ये भी माना है कि कुलभूषण जाधव को इतने दिनों तक क़ानूनी सहायता नहीं देकर पाकिस्तान ने वियना संधि का उल्लंघन किया है.
पाकिस्तानी अधिकारियों का दावा है कि मार्च 2016 में बलूचिस्तान के बॉर्डर इलाक़े से जाधव को गिरफ्तार किया था. जाधव पर सैन्य अदालत में मुक़दमा चलने के बाद मौत की सज़ा सुनाई गई थी.
अंतरराष्ट्रीय कोर्ट के फ़ैसले को दोनों देशों में अपनी-अपनी क़ामयाबी के तौर पर देखा जा रहा है. मोदी सरकार की पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने इस फ़ैसले को अपनी जीत बताया है.
फ़ैसले के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने दावा किया कि अंतरराष्ट्रीय कोर्ट का फ़ैसला पाकिस्तान की जीत है.
उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय अदालत ने पाकिस्तान की सैन्य अदालत का फ़ैसला रद्द नहीं किया. उन्होंने कहा कि कुलभूषण जाधव से पाकिस्तानी क़ानून के मुताबिक़ व्यवहार किया जाएगा. शाह महमूद क़ुरैशी का यह भी कहना था कि कुलभूषण के पास सफ़ाई और बेगुनाही पेश करने का हक़ है.
दूसरी तरफ सुषमा स्वराज ने फ़ैसला सामने आने के बाद ट्विटर पर अपनी प्रतिक्रिया में इसकी सराहना की और कहा कि वह इस फ़ैसले का स्वागत करती हैं और यह भारत के लिए एक ज़बरदस्त जीत है.
समीक्षा का तरीक़ा क्या होगा?
अंतरराष्ट्रीय कोर्ट ने अपने फ़ैसले में जहां कुलभूषण जाधव को बरी करने की अपील को ख़ारिज कर दिया वहीं पाकिस्तान को इसकी सजा पर समीक्षा करने को भी कहा है.
पाकिस्तान के कानून विशेषज्ञों में अंतरराष्ट्रीय अदालत के समीक्षा निर्देश की व्याख्या के मुद्दे पर मतभेद नज़र आता है.
सीनियर वकील और सुप्रीम कोर्ट बार के पूर्व अध्यक्ष हामिद ख़ान ने इस बारे में पत्रकार इबादुलहक़ से बात करते हुए कहा कि समीक्षा वही अदालत कर सकती है जिसने पहली बार सज़ा सुनाई है.
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उनका कहना था कि कई देशों में मौत की सज़ा नहीं दी जाती, इसलिए उस सज़ा को सख़्त समझते हुए इस पर समीक्षा करने के लिए कहा गया है.
उनके अनुसार सिविलियन कोर्ट की बजाय वही कोर्ट समीक्षा करेगी, जिसने सज़ा सुनाई है. ध्यान रहे कि कुलभूषण जाधव को ये सज़ा सैन्य अदालत ने सुनाई थी.
हामिद ख़ान का कहना था कि अंतरराष्ट्रीय अदालत ने सैन्य अदालत को अधिकृत अदालत माना है और इसकी सुनवाई के दायरे पर कोई सवाल नहीं उठाया है. फिर भी उनके अनुसार अगर ये मामला पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा जाता है तो फिर स्थिति बदल सकती है.
अंतरराष्ट्रीय क़ानून के विशेषज्ञ और वकील अहमर बिलाल सूफ़ी का कहना है कि समीक्षा का मतलब ऐसा मंच हो सकता है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय क़ानून के विशेषज्ञों को भी शामिल किया जा सकता है या फिर देश के क़ानून के विशेषज्ञ सज़ा की समीक्षा करें.
फिर भी पूर्व क़ानून मंत्री बैरिस्टर अली ज़फर का कहना था कि पाकिस्तानी अदालतें इस पर गहरी समीक्षा कर सकती हैं और अंतरराष्ट्रीय अदालत ने पाकिस्तानी अदालतों पर भरोसा किया है और पेशावर हाई कोर्ट के फ़ैसले का उदाहरण दिया है.
बैरिस्टर अली ज़फर और अहमर बिलाल सूफी इस मुद्दे पर सहमत नज़र आए कि पाकिस्तान को एक ज़िम्मेदार देश होने के नाते अंतरराष्ट्रीय क़ानून का पालन करना चाहिए.
अहमर बिलाल सूफी ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि किसी भी ज़िम्मेदार देश को अंतरराष्ट्रीय कोर्ट के फ़ैसलों को स्वीकार करना चाहिए और उन्हें मानना चाहिए.
लेकिन उनका यह भी कहना था कि पूर्व में ऐसी मिसालें मौजूद हैं, जहाँ कुछ देशों ने अंतरराष्ट्रीय अदालत के फ़ैसलों को स्वीकार नहीं किया और ऐसे में सुरक्षा परिषद फ़ैसला स्वीकार न करने की वजहों पर गौर करता है.
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