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तालिबान और अफ़ग़ान नेताओं में समझौता होगा?
- Author, सिकंदर किरमानी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
एक साल पहले, अभूतपूर्व युद्ध विराम के दौरान अफ़ग़ान सुरक्षा बलों और तालिबान लड़ाकों ने ईद का त्यौहार मनाने के लिए अपने अपने हथियार एक तरफ़ रख दिए थे. लेकिन अब जबकि देश के भविष्य पर बातचीत जारी है, क्या वे नेता शांति को लेकर एक दूसरे के और क़रीब आने को तैयार हैं?
एक दूसरे के खून के प्यासे लोग जून 2018 में तीन दिन के लिए एक दूसरे के क़रीब आए, गले लगे और सेल्फ़ी ली.
इस घटना ने शांति समझौते की प्रक्रिया को शुरू करने में मदद की और अब ये काफ़ी आगे बढ़ चुकी है. विद्रोहियों से मिलने वालों में नानगरहर प्रांत के तत्कालीन गवर्नर हयातुल्ला हयात भी शामिल थे.
उस समय पूर्वी शहर जलालाबाद में तालिबान लड़ाकों और सरकारी अधिकारियों के संयुक्त जुलूस की उन्होंने अगुवाई की थी.
उन्होंने बहुत गर्व के साथ मुझे बताया, "हमने 230 तालिबान सदस्यों की मेज़बानी की और जब वे हमारी जगह आए तो उनमें से किसी की तलाशी नहीं ली गई."
ग़ौरतलब है कि हयात पर तालिबान की ओर से कई हमल हुए जिनमें वो बाल बाल बचे थे. उन्होंने कहा कि पिछले कुछ सालों में इस संघर्ष में वो अपने 50 क़रीबी सहयोगियों को खो चुके हैं.
जब गवर्नर ने लड़ाकों की मेज़बानी की
उन्होंने माना कि उन्हें पहले इस बात का शुबहा था कि उनके मेहमान उन पर हमला कर सकते हैं.
वो कहते हैं, "व्यक्तिगत रूप से मैं चिंतित था, लेकिन अफ़ग़ानी लोगों के लिए शांति की अहमियत को देखते हुए ये ख़तरा उठाया, भले इसमें मेरी मौत हो जाती."
पिछले पांच साल में इन संघर्षों में अफ़ग़ान सुरक्षा बलों के 45,000 से अधिक सदस्य मारे जा चुके हैं.
लेकिन एक बड़े हॉल में हयात और उनके साथियों की दर्जनों तालिबान लड़ाकों से मुलाक़ात हुई, जो उन्हें गले लगाने के लिए क़तार में खड़े थे. इन्हीं में एक युवा लड़ाका था जिसने संभावित गिरफ़्तारी से बचने के लिए अपना ख़ंजर रख लिया था.
ख़ंजर ने बीबीसी सहयोगी को बताया, "हमने दिल से एक दूसरे को ईद की मुबारक़बाद दी...मैंने उन्हें गले लगाया और उनको शुभकामनाएं दीं."
ख़ंजर ने कहा कि 'आम तौर पर मुलाक़ात होती तो युद्ध के मैदान में होती.'
हालांकि उन्हें इस बात में कोई संदेह नहीं है कि अगर गवर्नर से आज मुलाक़ात हो तो वो क्या करेंगे, "अगर हमारे नेता इजाज़त देंगे तो हम उनका स्वागत करेंगे. लेकिन अगर वो कहेंगे तो मैं लड़ूंगा."
युद्धविराम के कुछ समय बाद ही तालिबान और अमरीका के बीच क़तर में शांति वार्ता शुरू हो गई. यहां तालिबान का राजनीतिक कार्यालय है. अभी तक विद्रोहियों ने अफ़ग़ान सरकार के किसी नुमाइंदे से मिलने से इनकार किया है क्योंकि वे उन्हें कठपुतली कह कर ख़ारिज़ करते हैं.
वार्ता का ताज़ा दौर
रविवार को क़तर में एक वार्ता आयोजित है, जिसमें तालिबान और अफ़ग़ानिस्तान की राजनीतिक शख़्सियतें शामिल हो रही हैं.
अहम बात ये भी है कि इस वार्ता में अफ़ग़ानिस्तानी सरकार के कुछ सदस्य भी शामिल हो सकते हैं, लेकिन वे निजी हैसियत में होंगे.
हयात कहते हैं कि पिछले साल युद्ध विराम के दौरान जब वो तालिबान सदस्यों से मिले तो उन्होंने उनसे पूछा कि 'वो हिंसा को कैसे सही ठहरा सकते हैं?'
"वो केवल अंतरराष्ट्रीय फ़ौजों की मौजूदगी का ही बहाना दे पाए. मैंने उनसे कहा कि अगर हम शांति समझौते पर पहुंचते हैं तो अंतरराष्ट्रीय फ़ौजें चली जाएंगी. वे यहां मौजूद हैं क्योंकि अफ़ग़ानी ज़िंदगियां ख़तरे में हैं और दुनिया को भी अफ़ग़ानिस्तान से ख़तरा है. "
हयात बताते हैं, "उन्होंने कहा कि वे कोई फैसला नहीं ले सकते और इसके लिए उन्हें अपने नेताओं से बात करनी पड़ेगी. लेकिन उन्होंने ये ज़रूर कहा कि जबतक विदेशी फ़ौजें देश छोड़ नहीं देतीं, वे लड़ते रहेंगे."
हयात मानते हैं कि 'जो कुछ उन्होंने कहा, वार्ता के दौरान मौजूद लड़ाकों पर उसका कुछ हद तक असर हुआ.'
लेकिन वो कहते हैं कि सरकारी समर्थकों के लिए भी ऐसे हालात के सबक पहले से हैं. अक्सर उनमें से कई पड़ोसी देश पाकिस्तान की खुफ़िया एजेंसी के डमी होते हैं.
वो कहते हैं, "युद्धविराम से पहले अधिकांश अफ़ग़ान सोच रहे थे कि हम तालिबान के साथ नहीं बैठ सकते. लेकिन उन तीन दिनों ने साबित कर दिया कि तालिबान भी इसी समुदाय का हिस्सा हैं और हम उनके साथ रह सकते हैं."
लड़ाई मज़बूरी बन गई
हयात स्वीकार करते हैं कि कुछ तालिबान सदस्य मुख्य धारा से अलग अपना वैचारिक रुख़ अपना सकते थे और उन्होंने नागरिक मौतों वाले हमलों की आलोचना भी की थी. लेकिन वो मानते हैं कि 90 प्रतिशत लड़ाके समाज में घुलमिल सकते हैं.
उन तीन दिनों की मुलाक़ात के बाद खंजर का मानना था, "अमरीका हमें अपने ही मुस्लिम भाईयों से लड़ने का दबाव डाल रहा है, इससे मैं खुश नहीं हूं. लेकिन सरकार अमरीकियों की कठपुलनी है तो उनसे लड़ना हमारा कर्तव्य है."
जब युद्धविराम समाप्त हुआ तो उसके कुछ घंटे बाद ही नानगरहर प्रांत और बाकी देश में लड़ाई शुरू हो गई.
हालांकि संयुक्त रूप से उत्सव मनाने की घटना से कुछ तालिबान लीडर असहज भी हुए थे. उन्हें ये देखकर हैरानी हुई थी उनके लड़ाके हथियार डालने के प्रति काफ़ी उत्सुक थे.
ख़जर मानते हैं कि ये संघर्ष अब समाप्त होना चाहिए, "इस युद्ध से मैं भी थक चुका हूं. चूंकि मैं इसमें हूं तो इसे छोड़ नहीं सकता...ये मेरा पेशा है. जब तक ज़िंदा हूं क़ाफ़िरों से लड़ना जारी रखूंगा."
हालांकि अफ़ग़ानिस्तान में हिंसा जारी है लेकिन शांति के उन तीन दिनों ने हयात और अफ़ग़ानियों के दिल में ये उम्मीद तो जगा ही दी कि एक दिन दों पक्षों में समझौता भी हो जाएगा.
वो कहते हैं, "शांति और माफ़ी के अलावा हमारे पास और कोई रास्ता नहीं है. ख़ून को ख़ून से नहीं धोया जा सकता."
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