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ईरान के लोग अमरीका से युद्ध चाहते हैं या शांति?- नज़रिया
- Author, राकेश भट्ट
- पदनाम, ईरानी मामलों के जानकार
तेहरान की मेट्रो या बसों में सफ़र करते हुए अनायास ही एक सामूहिक उदासी को महसूस किया जा सकता है.
हर गुज़रते दिन के साथ यह उदासी और गहराती सी प्रतीत होती है. उदासी की कोख से या विद्रोह पनपता है या हताशा का जन्म होता है.
अपनों के ख़िलाफ़ विद्रोह तो तब हो जब वे उन मुश्किलों के ज़िम्मेदार हों, ईरानी आम जनमानस अपनी मुश्किलों का ज़िम्मेवार अमरीका की हठधर्मिता को मानते हैं.
1979 की इस्लामी क्रांति के बाद जब ईरान इराक युद्ध अपने चरम पर था और ईरान पूरे विश्व में अलग-थलग सा हो गया था, उस वक़्त ईरानी समाज आने वाले भविष्य को लेकर इतना चिंतित नहीं था, जितना आज के ईरान में परिलक्षित है.
लेकिन 40 साल से लगातार विभिन्न प्रतिबंधों से जूझते आम जनता में उम्मीद का समाप्त हो जाना स्वाभाविक है.
ईरान की कुल राष्ट्रीय आय का आधा हिस्सा कच्चे तेल के निर्यात से हुआ करता था लेकिन हालिया अमरीकी प्रतिबंधों के चलते तेल निर्यात से अर्जित आय लगभग ख़त्म होती दिखती है.
लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए की भले ही ईरान के पास आधिकारिक रास्ते बंद हो गए हों लेकिन तेल की अनाधिकारिक बिक्री पर रोक लगाना शायद बहुत कठिन होगा.
लेकिन प्रतिबंधों के चलते यह तो साफ़ दिखता है कि ईरानी अर्थव्यवस्था अपने 40 साल के इतिहास में सबसे कठिन दौर से गुज़र रही है जिसका अत्यधिक असर आम जनजीवन पर पड़ा है.
एक रोटी की क़ीमत जो साल भर पहले 1000 रियाल में मिलती थी और आज उसकी क़ीमत 25000 रियाल हो चुकी है.
खाने-पीने की वस्तुओं में तीन से चार गुना का उछाल आया है.
वैसे इस संकट को ईरानी सरकार भली भांति समझती है जिसके चलते निम्न और मध्यम वर्ग के तबके को रियायती दरों पर खाद्य पदार्थों की आपूर्ति की व्यवस्था की गई है.
इसके अलावा खाने-पीने की वस्तुओं की कमी से निपटने के लिए ईरानी सरकार ने कुछ समय पहले 68000 ऐसे व्यापारियों को लाइसेंस दिए हैं जो ट्रक या खच्चरों के ज़रिए इराक़ से इस सामान को बिना सीमा शुल्क के ईरान ला सकें.
प्रतिबंधों के चलते और आय के श्रोतों के कम होने के असर ईरान की मुद्रा पर पड़ा है.
एक साल के भीतर ही डॉलर के मुक़ाबले ईरानी रियाल की क़ीमत में तीन गुना से अधिक की गिरावट आई है.
ईरान की अर्थव्यवस्था डॉलर से इस तरह गुंथी हुई है जैसे सूरज और साये का सम्बन्ध होता है. जैसे-जैसे सूरज परवान चढ़ता है साया उतना ही बौना होने लगता है.
मुद्रा स्फीति की दर 37% तक चली गई है. आईएमएफ़ के अनुसार यदि हालात नहीं सुधरे तो इसमें भारी बढ़ोतरी हो सकती है.
गंभीर आर्थिक संकटों से गुज़रते हुए भले ही ईरानियों की मानसिक स्थिति उनके हाव-भाव में भले ही झलकती हो लेकिन चेहरों पर लालिमा अब भी बरक़रार है.
इस पहेली के जवाब में वे यह कहते हैं कि "सूरत- ए खुदेमान रा बा सीली सुर्ख मी कोनीम" - हम अपने गालों को थप्पड़ों से लाल किए रखते हैं.
अमरीकी प्रतिबंधों को ईरानी राज्य व्यवस्था ही नहीं बल्कि आम जन मानस भी अनुचित मानता है. आम लोगों की नज़र में अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप "ट्विटर वाली चिड़िया का योद्धा" मानते हैं.
वे राष्ट्रपति ट्रंप को कैसिनो में बैठे जुए का वह खिलाड़ी मानते हैं जो अपने प्रतिद्वंदी को डराने के लिए बिना सोचे समझे बहुत बड़ी बोली लगा देता है लेकिन जब प्रतिद्वंदी खिलाड़ी उसकी चाल को भांप जाए तो वह चुपचाप मैदान छोड़ देता है.
ईरानी सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह ख़ामेनेई पर अमरीका के द्वारा प्रतिबंध लगाना ईरान में ख़ासे मज़ाक का कारण बना.
ईरान में ट्विटर पर #ट्रंप कृपा करके मुझे भी प्रतिबंधित करें ट्रेंड करने लगा.
मज़ाकिया तौर पर @K. Jafari नाम के ईरानी ने ट्वीट किया कि "अब तो बस अमरीकी प्रतिबंधों से मैं, मेरे अब्बू और पड़ोसी का बच्चा ही बचा है.
ईरानी विदेश मंत्रालय से अनुरोध है कि ट्रंप का टेलीफोन नंबर मुहैय्या करवा दें ताकि हम अपने नाम और पता उनको भेज दें ताकि अगले ड्रोन को गिराने के बाद वो हम तीनों पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए उन्हें नाम न ढूंढ़ने पड़ें."
अपनी हालिया ईरान यात्रा के दौरान एक दिन मैं कुछ मित्रों के साथ तेहरान के वली-अस्र इलाके में कॉफ़ी पीने बैठे तो एक जवान ईरानी युवक से मैंने ईरान के हालचाल पूछे तो उसने कहा कि हालात तो ख़राब हैं, काम नहीं है, महंगाई इतनी है कि अब सोच के दायरे को लांघ चुकी है.
अंत में उसने मौलाना रूमी की ग़ज़ल का एक लाइन सुनाई और कहा कि "शेर तब अपने सबसे प्रभावशाली, ख़ूबसूरत और ख़तरनाक रंग में आता है जब वह भोजन की तलाश में हो."
फिर कुछ चुप्पी के बाद उसने कहा- कहीं ऐसा न हो कि ईरान भोजन की तलाश में निकल पड़े.
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