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उत्तर कोरिया क्यों जा रहे हैं चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग गुरुवार को उत्तर कोरिया के सुप्रीम लीडर किम जोंग-उन से मुलाक़ात करने वाले हैं. शी जिनपिंग उत्तर कोरिया के दो दिन के दौरे पर हैं.
माना जा रहा है कि शी जिनपिंग और किम जोंग-उन के बीच परमाणु निरस्त्रीकरण और आर्थिक मुद्दों पर बातचीत हो सकती है.
दोनों की ये मुलाक़ात जापान में होने वाले जी20 सम्मेलन से ठीक पहले हो रही है. जापान में शी जिनपिंग अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप से भी मुलाक़ात करने वाले हैं.
बीते सालों में शी जिनपिंग और किम जोंग-उन की चार मुलाक़ातें हुई हैं लेकिन 2005 के बाद से दोनों राष्ट्राध्यक्षों की उत्तर कोरिया में ये पहली मुलाक़ात है.
2012 में सत्ता संभालने के बाद से शी जिनपिंग का ये पहला उत्तर कोरियाई दौरा है.
इसी साल फ़रवरी में वियतनाम की राजधानी हनोई में किम और ट्रंप की मुलाक़ात हुई थी. दोनों के बीच परमाणु निरस्त्रीकरण को लेकर सहमति बननी थी लेकिन ये मुलाक़ात बेनतीजा रही थी.
माना जा रहा है कि इसके बाद परमाणु निरस्त्रीकरण पर रुकी चर्चा को इस मुलाक़ात के ज़रिए आगे बढ़ाया जा सकता है.
हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि शी जिनपिंग ये जानना चाहते हैं कि हनोई में क्या हुआ था और क्या बातों को आगे बढ़ाने का कोई रास्ता अब भी बाक़ी है.
विश्लेषक मानते हैं कि शी जिनपिंग इस बारे में जानकारी जापान में डॉनल्ड ट्रंप के साथ साझा कर सकते हैं.
उत्तर कोरिया के लिए चीन उसका प्रमुख ट्रेडिंग पार्टनर है और बेहद अहम है. साथ ही फ़िलहाल अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना कर रहे उत्तर कोरिया के लिए कूटनीतिक तौर पर भी चीन बेहद महत्वपूर्ण है.
चीन को उत्तर कोरिया से क्या चाहिए?
किम जोंग-उन और शी जिनपिंग की मुलाक़ात मात्र एक सप्ताह पहले ही तय हुई थी. अमरीका स्थित विश्लेषण साइट 38 नॉर्थ के प्रबंध संपादक जैनी टाउन का कहना है कि दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना की 70वीं सालगिरह नज़दीक आ रही है और इस कारण इममें इतने आश्चर्य की कोई बात नहीं है.
हालांकि वो कहती हैं कि जी20 सम्मेलन से ठीक पहले इस दौरे के कुछ "सांकेतिक मायने" भी हो सकते हैं. चीन का मुख्य उद्देश्य है उत्तर कोरिया में स्थायित्व और उसके साथ आर्थिक सहयोग.
ये दोनों देशों में काफ़ी पहले से कम्युनिस्ट नेतृत्व के तहत दोस्ताना संबंध थे. हालांकि रिश्तों में बीते एक दशक में तब तनाव आया, जब चीन ने उत्तर कोरिया के परमाणु महत्वाकांक्षा की आलोचना की.
चीन से छपने वाले अख़बार चाइना डेली ने बुधवार को लिखा था कि इस मुलाक़ात के दौरान दोनों के बीच "कुछ अहम परियोजनाओं पर सहमति बन सकती है."
वहीं उत्तर कोरिया के अख़बार रोडोंग सिनमुन ने अपने पहले पन्ने पर छपे संपादकीय मे कहा कि शी जिनपिंग परमाणु कार्यक्रम के मुद्दे पर पर बातचीत के लिए तैयार हैं. अख़बार ने लिखा, "कोरियाई प्रायद्वीप के मुद्दे को सुलझाने में सही दिशा बनाए रखने के लिए चीन उत्तर कोरिया का समर्थन करता है."
उत्तर कोरिया को चीन से क्या चहिए?
जैनी टाउन कहती हैं कि "उत्तर कोरियाई चाहते हैं कि भले ही भरोसा थोड़ा कम हुआ हो लेकिन उनके पुराने मित्र उनके नज़दीक बने रहें."
उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था फ़िलहाल अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण मुश्किल में है. चीन के साथ उनके अच्छे व्यावसायिक संबंध हैं और उनके लिए काफ़ी कुछ दांव पर लगा है.
लेकिन इसे बराबरी का रिश्ता नहीं कहा जा सकता क्योंकि चीन को उत्तर कोरिया की जितनी ज़रूरत है उससे कहीं अधिक ज़रूरत उत्तर कोरिया को चीन की है.
उत्तर कोरिया मामलों के विश्लेषक पीटर वार्ड कहते हैं, "उत्तर कोरिया का अधिकांश निर्यात चीन से होता है. खनिज, मछली, कपड़े और मज़दूर."
पारंपरिक तौर पर भी चीन उत्तर कोरियाई कारखानों में बना काफ़ी सामान आयात करता है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण फ़िलहाल ये व्यापार रुक गया है.
पीटर वार्ड कहते हैं, "चीन चाहेगा कि संयुक्त राष्ट्र उत्तर कोरिया पर लगे प्रतिबंध ख़त्म करे. चीन सुनिश्चित करना चाहता है कि उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था तरक्की करे और उसे बैलिस्टिक मिसाइलों या परमाणु हथियारों के परीक्षण की आवश्यकता महसूस न हो."
संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध न उठाने की सूरत में चीन बहुत कुछ नहीं कर पाएगा.
कोरियाई नेशनल डिप्लोमैटिक अकादमी के प्रोफ़ेसर किम ह्यून-वुक ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा है, ''चीन आर्थिक मदद से उत्तर कोरिया पर लगे प्रतिबंधों को कम कर सकता है ताकि किम जोंग उन ट्रंप लेकर अपनी कमज़ोर स्थिति के कारण नकारात्मक ना हों.''
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