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कार बाज़ार में आई मंदी के 5 कारण
- Author, डेनियल थॉमस
- पदनाम, बिज़नेस रिपोर्टर, बीबीसी न्यूज़
ब्रिटेन के कार उद्योग को लग रहे लगातार झटकों के बीच एक और खब़र है कि फोर्ड ने अपने ब्रिजेंड प्लांट को अगले साल बंद करने की योजना बनाई है, जिससे 1700 नौकरियां चली जाएंगी.
बीती फ़रवरी में, होंडा ने कहा था कि वह अपने स्विन्डन प्लांट को 2021 तक बंद कर देगी, जिससे लगभग 3500 नौकरियां चली जाएंगी, वहीं जगुआर लैंड रोवर और निसान भी उत्पादन और नौकरियों में कटौती कर रहे हैं.
दुनिया भर के कार निर्माता कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं , दूसरी तरफ़ पहले के मुकाबले लोग कम कारें खरीद रहे हैं.
तो क्या वजह है की निर्माता अपने पांव पीछे खींच रहे हैं?
1. मांग मे कमी
कई सालों तक ऊंची विकास दर के बाद वैश्विक कार बाज़ार आम तौर पर 2018 में मंदा था. इसका मुख्य कारण दुनिया के सबसे बड़े बाजार चीन में मांग में कमी आना था.
कार उद्योग की वेबसाइट 'जस्ट-ऑटो' के संपादक डेव लेगेट कहते हैं कि चीन में अच्छा कारोबार करते आ रहे कार निर्माताओं के लिए ये एक झटका था.
वो कहते हैं, "वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच चल रहे व्यापार तनाव ने चीन में आम तौर पर भरोसे को प्रभावित किया है. अर्थव्यवस्था वैसे भी धीमी हो रही थी, लेकिन इसने कार बाज़ार पर और असर डाला."
जगुआर लैंड रोवर में अपने ख़राब प्रदर्शन की वजह चीन में मांग की कमी को बताया, जबकि फ़ोर्ड ने व्यापार शुल्कों के कारण अमरीका में एक चीन निर्मित फ़ोर्ड फ़ोकस बेचने की योजना को वापस ले लिया.
उपभोक्ताओं का भरोसा कम होने के कारण दो बड़े कार बाज़ार पश्चिमी यूरोप और अमेरिका में मांग में कमी आई और इसका भी चीन की मंदी पर असर हुआ.
लेगेट कहते हैं, "प्रतिस्पर्धा बढ़ गई, जो इसे सभी के लिए और चुनौतीपूर्ण बना रहा है."
2. उत्सर्जन संकट
यूरोप में कार उद्योग के लिए उत्सर्जन संकट भी बड़ा सरदर्द बना हुआ है.
वायु गुणवत्ता की चिंताओं और टैक्स में बदलाव के कारण डीज़ल कारों की बिक्री में बड़ी गिरावट आई है, जिससे 2018 में ब्रिटेन में में नई कार पंजीकरण कराने में 7 फीसदी की कमी आई है.
और उससे भी ज़्यादा चुनौतीपूर्ण शायद नए कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन मानकों का लाना था जोकि ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए डिज़ाइन किया गया है, लेकिन इससे कारें महंगी हो गईं.
साल 2021 से, निर्माताओं को यूरोपीय संघ में बड़े ज़ुर्माना का सामना करना पड़ेगा यदि वे तय उत्सर्जन मानकों का पालन नहीं करते हैं और ये मानक लगातार कड़े होते जाएंगे.
एवरकोर आईएसआई में एक मोटर वाहन उद्योग विश्लेषक, अर्न्ट एलिंघोस्ट के अनुसार, "कार निर्माताओं को कारों में 1,000 यूरो (लगभग 8,000 रुपये) के उपकरण को और जोड़ना होगा तब जाकर वे नए नियमों का पालन कर पाएंगे."
"इसका मतलब है कि लोग कार कम खरीदेंगे, जिसके चलते उपभोक्ता का भरोसा कम होगा."
3. इलेक्ट्रिक कार की चुनौती
अपने उत्सर्जन स्तर को कम करने के लिए, कार निर्माताओं को बहुत अधिक इलेक्ट्रिक वाहनों को बेचने की आवश्यकता है, लेकिन रास्ते में बड़ी बाधाएं हैं.
लेगेट कहते हैं, "बहुत से कार निर्माता पर्याप्त मात्रा में इलेक्ट्रिक वाहन तैयार करने को तैयार नहीं हैं, उन्हें अपने संचालन को बदलने और कारों को बड़े पैमाने पर बाज़ार में उतारने की आवश्यकता है, लेकिन इसके लिए निवेश की भी आवश्यकता है."
वहीं दूसरी समस्या यह है कि बाज़ार अभी इलेक्ट्रिक कारों के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है.
बैटरी इलेक्ट्रिक कारों की दुनिया भर में बिक्री 2018 में 73 फीसदी से बढ़कर 13 लाख यूनिट हो गई, लेकिन यह अभी भी कुल मिलाकर बेची गई 8 करोड़ 60 लाख कारों का एक अंश ही है.
यूनिवर्सिटी ऑफ सलफ़ोर्ड बिज़नेस स्कूल के सप्लाय चेन और लॉजिस्टिक्स विशेषज्ञ डॉ जोनाथन ओवेन्स के अनुसार, यूरोप और अमेरिका में सड़कों पर इलेक्ट्रिक कारों के चार्जिंग के लिए बुनियादी ढांचे की कमी बड़ी समस्या है, हालांकि उनका कहना है कि चीन इस क्षेत्र में काफी अच्छी प्रगति कर रहा है.
दूसरी समस्या यह कि मध्य से लेकर निचले बाज़ार में इलेक्ट्रिक कारों की सीमित रेंज है.
डॉ. ओवेन्स कहते हैं, "फ़ोर्ड के पास 2011 से एक इलेक्ट्रिक फ़ोर्ड फोकस है, जो 100 मील तक के प्रतिद्वंद्वी कार निर्माताओं के मुकाबले बहुत निराशाजनक है."
"और केलव वॉक्सवैगन गोल्फ़ ही केवल 120 मील तक की दूरी तय कर सकती है."
4. स्वामित्व में बदलाव?
दूसरी चिंताएं भी कार निर्माताओं को परेशान कर रही हैं. मसलन नई टेक्नोलॉजी जो कार और चालक के बुनियादी रिश्ते को बदल रही हैं.
लेगेट कहते हैं, "अगर ड्राइवरलेस कारें अगले 15 वर्षों में मुख्यधारा में आती हैं, तो हममें से कई खुद के वाहनों के बजाय शेयर या किराए पर कारें ले लेने लगेंगे."
यह यात्रा की लागत को कम कर सकता है, जिससे खुद की कार खरीदने में ग्राहक की रूचि कम होगी.
पारंपरिक कार कंपनियों को उबर जैसे टेक्नोलॉजी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने वाली कंपनियों से कड़ी चुनौती मिल रही है. गूगल ड्राइवरलेस कार बाज़ार में वेमो को उतारने जा रहा है.
हालांकि, अनुसंधान और विकास की लागत बहुत अधिक होती है और कोई जोखिम नहीं लेना चाहता इसलिए सब जोख़िम को बांटने की कोशिश कर रहे हैं.
अभी हाल ही में फ़ोर्ड और वोक्सवैगन के बीच इलेक्ट्रिक और ड्राइवरलेस कारों को विकसित करने का क़रार हुआ है.
जबकि होंडा ने प्रतिद्वंद्वी जनरल मोटर्स के ड्राइवरलेस यूनिट में 2.75 अरब डॉलर का निवेश किया है ताकि ड्राईवरलेस टैक्सियों का एक पूरा बेड़ा उतारा जा सके.
5. ब्रेक्ज़िट
2016 में यूरोपीय संघ को लेकर हुए जनमत संग्रह के बाद से ब्रिटेन में, कार कंपनियां ब्रेक्ज़िट समझौता न होने पाने पर आने वाले खतरों से बार-बार आगाह कर रही हैं.
और ब्रिटेन के कार बाज़ार में निवेश पिछले दो सालों से लगातार गिरता जा रहा है, अकेले 2017 में ही इसकी विकास दर 46.5 फीसदी पर पहुंच गई.
विश्लेषकों का कहना है कि ब्रिटेन के कार प्लांट यूरोपीय संघ से आयात किए गए पुर्जों पर बहुत अधिक निर्भर हैं, जबकि तैयार कारों का बड़ा हिस्सा वो यूरोप के अन्य देशों को भेजते हैं.
डॉ. ओवेन्स कहते हैं, "अगर हम शुक्ल के रूप में अनिश्चितता की स्थिति में आ रहे हैं, तो इससे अड़चनें आएंगी जिससे और देरी होगी, जोकि ब्रिटेन के प्लांट को आर्थिक रुप से असर डालेगा."
हालांकि, लेगेट ने कहना है कि ब्रिटेन को परेशान करने वाले कई कारणों में से ब्रेक्ज़िट प्रमुख है.
वो कहते हैं, "कंपनियां चीन को कम निर्यात कर पा रही हैं, जबकि यूरोप में बिक्री सुस्त है और इस समय ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था भी पहले जैसी नहीं है."
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