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आख़िर ईरान का कसूर क्या है जिसे अमरीका और सऊदी अरब मिटाना चाहते हैं
- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, नई दिल्ली
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप अमरीकी सुरक्षा में ईरान को सबसे बड़ा ख़तरा बता रहे हैं.
लेकिन 2003 में अमरीका ने यह तर्क देकर इराक़ पर हमला किया था तो उसके सारे तर्क ग़लत साबित हुए थे और जो कुछ हासिल हुआ उससे वो ख़ुश भी नहीं था.
ऐसे में ईरान के साथ क्या अमरीका वही ग़लती करेगा जो इराक़ के साथ कर चुका है? कई विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान के साथ अमरीका युद्ध में जाता है तो वो इराक़ युद्ध के सबक़ के साथ जाएगा.
1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से ही ईरान संकट को लेकर अमरीका एक किस्म की नकारात्मक राय रखता है. ऐसे में ट्रंप और उनके सलाहकारों के लिए ईरान के ख़िलाफ़ तर्क पेश करने में बहुत दिक़्क़त नहीं होती है.
अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो का कहना है कि मध्य-पूर्व की तमाम समस्याओं की जड़ में ईरान है. लेकिन हक़ीक़त यह है कि वर्तमान में ईरान आक्रामक नहीं है बल्कि अमरीका के सबसे क़रीबी सहयोगी सऊदी अरब ज़्यादा आक्रामक है.
अगर मध्य-पूर्व में ईरान और सऊदी अरब की तुलना करें तो सऊदी की भूमिका ज़्यादा संदिग्ध लगती है. सबसे पहले दोनों देशों को सैन्य खर्चों के आधार पर समझिए.
इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के अनुसार 2017 में सऊदी ने ईरान की तुलना में चार गुना ज़्यादा रक़म सेना पर खर्च की. हालांकि यह कोई नई बात नहीं है. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार ईरान ने 1989 से अब तक रक्षा पर अपनी जीडीपी का 3.3 फ़ीसदी से ज़्यादा खर्च नहीं किया है. इसी अवधि में सऊदी अरब ने हर साल सात फ़ीसदी से ज़्यादा खर्च किया.
सऊदी के हथियार भी ईरान की तुलना में बेहतर हैं. स्ट्रैटिजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज की 2015 की एक रिपोर्ट के अनुसार सऊदी अरब और खाड़ी के उसके सहयोगी दुनिया के सबसे बेहतरीन हथियार हासिल कर रहे हैं जबकि ईरान अपने पुराने हथियारों से ही काम चला रहा है.
ईरान में लगभग सिस्टम 50 के दशक के ही हैं. आयात के ज़रिए भी जो हथियार मिले हैं उनमें 1960 और 1980 के दशक के तकनीक हैं.
ईरान की तुलना अगर सैन्य मामलों में इसराइल से किया जाए तो मध्य-पूर्व में उसके सामने कोई टिकता नहीं है. ऐसे में यह कहना कि मध्य-पूर्व की सुरक्षा के लिए ईरान ख़तरा है तो यह तर्क की कसौटी पर बहुत खरा नहीं उतरता.
एक दूसरी बात कही जाती है कि ईरान ने सीरिया में बहुत मज़बूती से हस्तक्षेप किया लेकिन कई विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान से ज़्यादा दख़ल सऊदी अरब का रहा है.
सीरिया में ईरान के दख़ल को समझना है तो इराक़-ईरान युद्ध को भी समझना होगा. 1980 में सद्दाम हुसैन ने ईरान पर हमला किया था. 20वीं सदी का यह सबसे भयावह ख़ूनी संघर्ष था. इस युद्ध में कम से कम 10 लाख ईरानी मारे गए थे.
इस यु्द्ध में सद्दाम हुसैन ने काफ़ी आक्रामक रुख़ दिखाया था. इराक़ ने इस जंग में रासायनिक हथियारों का भी इस्तेमाल किया था. इस युद्ध में अरब के सभी बड़े देशों और अमरीका ने सद्दाम हुसैन का साथ दिया. अरब का एकमात्र देश सीरिया था जिसने इस युद्ध में ईरान का साथ दिया था.
इसके बाद से सीरिया हर मुश्किल हालात में ईरान के साथ खड़ा रहा. 2011 में सीरिया में बशर अल-असद सरकार के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन शुरू हुआ ईरान का यह डर लाज़िमी था कि अगर सीरिया में अमरीकी परस्त सरकार बनती है तो इसका असर तेहरान की सरकार पर भी होगा और ईरान की शिया मुल्क की पहचान ख़त्म हो सकती है. तुर्की तरह ईरान को डर था कि कहीं सीरियाई कुर्द भी अलग मुल्क के लिए आंदोलन ना शुरू कर दें.
ईरान ने सीरिया में यथास्थिति को बनाए रखने में मदद की. यह वैसा ही था जैसे सऊदी अरब ने बहरीन में शिया प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ अपनी फ़ौज भेज दी थी. इसके साथ ही मिस्र में भी 2014 में तख़्तापलट में सऊदी अरब की भूमिका प्रत्यक्ष तौर पर संदिग्ध रही.
सीरिया में ईरान सत्ता परिवर्तन नहीं चाहता था जबकि सऊदी अरब और खाड़ी के उसके सहयोगियों ने असद विरोधी ताक़तों को मदद की और इन ताक़तों का संबंध जबात अल-नुसरा और स्थानीय अल-क़ायदा से भी था.
तीसरा इल्ज़ाम ईरान पर यमन को अस्थिर करने का है. ईरान यमन में हूती विद्रोहियों को मदद पहुंचा रहा है और पश्चिमी यमन में इसका नियंत्रण है. लेकिन यमन में भी ईरान की संलिप्तता अकारण नहीं है.
सीरिया में सऊदी अरब चाहता था कि वो ईरान समर्थक सरकार को उखाड़ फेंके. यमन में हूती विद्रोहियों ने सऊदी समर्थक राष्ट्रपति अब्द्राब्बुह मंसुर हादी को उखाड़ फेंका था.
ईरान को मंसुर का यमन की सत्ता से जाना रासा आया था. ईरान यमन को सऊदी के वियतनाम के तौर पर देखता है. रियाद के साथ संयुक्त अरब अमीरात ने यमन के बंदगाहों को बंद कर दिया और लोगों पर बम भी बरसाए. आज की तारीख़ में यमन दुनिया के सबसे ख़तरनाक मानवीय संकट से जूझ रहा है.
ईरान पर आख़िरी इल्ज़ाम अमरीका यह लगाता है कि वो राज्य प्रायोजित आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है. ज़ाहिर है ईरान से हिज़्बुल्लाह, फ़लस्तीनी इस्लामिक जिहाद और हमास को मदद मिलती है.
हालांकि इन्हें अमरीका के सहयोगी क़तर और तुर्की से भी मदद मिलती है. कहा जाता है कि बेरूत में 1983 में अमरीकी दूतावास पर जो हमला हुआ था उसमें हिज़्बुल्लाह का हाथ था. इसके साथ ही सऊदी अरब में 1996 में अमरीकी वायु सेना के एक कॉम्पेलक्स पर हमला हुआ था और इसके लिए भी इन्हीं संगठनों पर आरोप लगे थे.
लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि सुन्नी जिहादी समूह जैसे- आईएसआईएस और अल क़ायदा ने ज़्यादा अमरीकी नागरिकों की हत्या है और इन्हें भारी मदद ईरान से नहीं बल्कि सुन्नी नेतृत्व वाले देश और ख़ास कर सऊदी अरब से मिल रही है.
2016 में अमरीका में 9/11 के हमले की जांच रिपोर्ट के कई ऐसे तथ्य सामने आए थे जिसमें कहा गया था कि विमान हाइजैकर्स को उन लोगों से मदद मिली जो शायद सऊदी सरकार के संपर्क में थे. सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार इस साल की शुरुआत में सऊदी और यूएई ने यमन में अल क़ायदा को अमरीका में बने हथियार मुहैया कराए हैं.
2014 में पेंटागन की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि ईरान की सैन्य रणनीति में आत्मसुरक्षा केंद्र में है. अमरीका और इसराइल के कई विशेषज्ञों का यह आकलन रहा है कि ईरान अपनी सुरक्षा को लेकर सतर्क रहता है न कि किसी पर हमला करने की आकांक्षा रखता है.
1953 में अमरीका और ब्रिटेन ने ईरान में लोकतांत्रिक तरीक़े से चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग को अपदस्थ कर पहलवी को सत्ता सौंप दी थी. मोहम्मद मोसादेग ने ही ईरान के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया था और वो चाहते थे कि शाह की शक्ति कम हो.
किसी विदेशी नेता को शांतिपूर्ण वक़्त में अपदस्थ करने का काम अमरीका ने पहली बार ईरान में किया. लेकिन यह आख़िरी नहीं था. इसके बाद अमरीका की विदेश नीति का यह एक तरह से हिस्सा बन गया.
1953 में ईरान में अमरीका ने जिस तरह से तख्तापलट किया उसी का नतीजा 1979 की ईरानी क्रांति थी. इन 40 सालों में ईरान और पश्चिम के बीच कड़वाहट ख़त्म नहीं हुई.
अब अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप कह रहे हैं कि अगर ईरान युद्ध में गया तो उसका अस्तित्व मिट जाएगा. लेकिन अमरीका को भी युद्ध के ख़तरों का अंदाज़ा है क्योंकि 2003 में वो इराक़ में सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाने के लिए ऐसा कर चुका है.
इस्लामिक क्रांति के 40 सालों बाद ईरान ने कई संकट देखे हैं लेकिन इस बार का ख़तरा काफ़ी गंभीर है. कई विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान अगर झुकता है तब भी हारेगा और लड़ता है तब भी जीत नहीं मिलेगी.
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