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चीन की ग्वादर परियोजना से क्यों नाखुश है पाकिस्तान का स्थानीय समुदाय?
- Author, शुमाइला जाफ़री
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, ग्वादर, पाकिस्तान
नाखुदा अल्लाह बख्श चिल्ला रहे थे, वो चाहते थे कि उनके साथ काम कर रहे लोग नाव जल्दी तैयार करें. वो थोड़े नाराज़ और निराश दिख रहे थे.
इन लोगों ने फुर्ती से नाव साफ़ करना शुरू किया. ये नाव में जाल और अन्य सामान रखने लगे. अल्लाह बख्श ने फिर नाव की मोटर चालू की और ग्वादर के सागर में उतर गए.
अल्लाह बख्श बचपन से ही मछली पकड़ने का काम कर रहे हैं, यह उनके परिवार का व्यवसाय है, उनके पिता और दादा ने यही किया है, सागर की दया उन पर हमेशा बनी रही है, उनका जीवन और जीविका इसी पर निर्भर है.
लेकिन अब चीज़ें पहले की तरह नहीं रह गई हैं.
अल्लाह बख्श समझाते हुए कहते हैं, "हमें जहां सबसे अधिक मछलियां मिलती थीं, वहां मछली पकड़ने से रोक दिया गया है." ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि यहां बंदरगाह में एक नई सड़क का निर्माण किया गया है.
ईस्टबे एक्सप्रेस चीन के पैसों से, चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे या सीपीईसी के तहत चल रहे बुनियादी ढांचे और ऊर्जा परियोजनाओं का हिस्सा है.
कई लोग इस परियोजना को पाकिस्तान के आर्थिक विकास के साधन और इलाके के लिए गेम चेंजर के रूप में देखते हैं. हालांकि ग्वादर का स्थानीय मछुआरा समुदाय इससे खुश नहीं है.
ग्वादर, बलूचिस्तान के अरब सागर तट पर स्थित है जो पाकिस्तान के उग्रवाद प्रभावित दक्षिण-पश्चिम प्रांत में पड़ता है.
अल्लाह बख्श कहते हैं, "वो हमें बंदरगाह और दूतावास के क़रीब नहीं जाने देते, यहां तक कि रात को भी वो हमारा पीछा करके हमें रोकते हैं."
चीन की सीपीईसी परियोजना का हिस्सा
चीन ने ग्वादर में बंदरगाह के क़रीब एक बड़े व्यापारिक केंद्र का निर्माण किया है, स्थानीय मछुआरे इसे बेहद महफ़ूज़ बताते हैं.
अल्लाह बख्श दावा करते हैं कि यदि कोई मछुआरा प्रतिबंधित क्षेत्र के पास पकड़ा गया तो गार्ड उनकी पिटाई तक कर देते हैं और पुश-अप्स करने के लिए कहते हैं.
सीपीईसी ग्वादर से शुरू होकर काशगर में खत्म होता है. ईस्टबे एक्सप्रेसवे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की एक महत्वपूर्ण कड़ी है. 19 किलोमीटर लंबे, छह लेन वाले एक्स्प्रेसवे ग्वादर के बंदरगाह को सड़क से जोड़ेगा, जो अंत में इसे चीन के काशगर शहर से जोड़ने जा रहा है.
भारत की आपत्तियां
भारत ने इस परियोजना पर अपनी चिंताएं जाहिर की हैं और उसका यह मानना है कि यह क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन करता है. आर्थिक गलियारा गिलगिट बाल्टिस्तान से होकर गुजरता है. यह वो इलाका है जिसके बारे में भारत दावा करता है कि यह विवादित, पाकिस्तान प्रशासित, जम्मू-कश्मीर क्षेत्र का हिस्सा है.
चीन और पाकिस्तान, दोनों ने भारत की आपत्तियों को ख़ारिज कर दिया है और दावे से कहा है कि यह परियोजना उनकी आबादी के विकास के लिए ज़रूरी है और वो इस परियोजना से पीछे नहीं हटेंगे.
सीपीईसी परियोजना की लागत 43 लाख करोड़ रुपये (60 बिलियन अमरीकी डॉलर) है. इससे चीन अरब सागर तक पहुंच जायेगा जिससे आयात-निर्यात लागत में कटौती होगी. पाकिस्तान को इस परियोजना से देश की बीमार अर्थव्यवस्था में निवेश आने की उम्मीद है.
मछुआरा समुदाय परेशान
मोहम्मद यूनिस ग्वादर मछुआरा संघ के नेता हैं.
वो कहते हैं, "हम न तो यहां अपनी नाव लगा सकते हैं, न ही इसकी सफ़ाई कर सकते हैं और सड़क जहां बन रही है वहां से समुद्र तट से सागर में जाने की भी मनाही है.
यूनिस के मुताबिक, अधिकारियों ने मछुआरों के सागर में जाने के लिए सड़क के नीचे से होकर 12 फ़ीट चौड़ी तीन सुरंगें बनाने का प्रस्ताव रखा है.
लेकिन उनका मानना है कि सुरंग का आकार एक औसत आकार के समान है यानी प्रस्तावित सुरंग से होकर कोई नाव नहीं गुजर सकती.
वो कहते हैं, "साढ़े चार किलोमीटर का यह इलाका समुद्र का सबसे उपजाऊ हिस्सा है, हम यहां पूरे साल मछली पकड़ते थे. अगर सड़क मौजूदा डिजाइन से बनाई जाएगी, तो इसका मतलब है कि हमें समुद्र से निकाल दिया जाएगा. हमारी आजीविका ख़त्म हो जाएगी."
ग्वादर में मछुआरे मांग कर रहे हैं कि मछुआरों के लिए समुद्र में जाने का रास्ता 200 फ़ीट चौड़ा होना चाहिए और समुद्र में मछली पकड़ने की पूरी छूट होनी चाहिए.
यूनिस कहते हैं, "उन्होंने समुद्र के एक बड़े इलाके को रेड ज़ोन घोषित कर दिया है, हम न तो वहां मछली पकड़ सकते हैं और न ही वहां जा सकते हैं."
यूनिस दावा करते हैं कि 3 महीने के विरोध प्रदर्शन के बाद आखिरकार एक सरकारी प्रतिनिधिमंडल ने उनसे संपर्क किया और उन्हें आश्वासन दिया गया कि उनकी चिंताओं को दूर किया जाएगा. लेकिन वो कहते हैं कि अभी तक कुछ भी नहीं किया गया है.
वे कहते हैं, "हम उम्मीद करते हैं कि वो हमारी परेशानियों को ध्यान में रखेंगे, लेकिन अगर हमारी बात नहीं सुनी गई तो मछुआरों के पास सड़क पर आने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा."
ग्वादर की कहानी
ग्वादर में लगभग 70 फ़ीसदी स्थानीय आबादी मछली पकड़ने का काम करती है. शहर में 2,500 नावें पंजीकृत हैं और प्रत्येक पर कम से कम सात से आठ लोग काम करते हैं.
साल 1958 में पाकिस्तान के ख़रीदने से पहले यह बंदरगाह 178 साल तक ओमान के अधीन रहा.
दशकों तक ग्वादर को नज़रअंदाज किया गया. कोई विकास नहीं हुआ. फिर साल 2001 में सैन्य शासक परवेज़ मुशर्रफ़ ने यहां एक बंदरगाह बनाने का फ़ैसला किया. लेकिन निवेश, सुरक्षा और राजनीतिक चुनौतियों की वजह से इस पर अमल नहीं हो सका.
साल 2015 में चीन ने इसके रणनीतिक महत्व को समझा और अपने मुस्लिम बहुसंख्यक इलाके शिनजियांग प्रांत को इस बंदरगाह से जोड़ने के लिए एक आर्थिक गलियारा बनाने का फ़ैसला किया.
अधिकारियों का दावा है कि ग्वादर की स्थानीय आबादी को इस परियोजना से बहुत फ़ायदा पहुंचेगा. सीपीईसी के तहत यहां एक नया हवाई अड्डा, अत्याधुनिक अस्पताल, विश्वविद्यालय, वाटर ट्रीटमेंट प्लांट के साथ ही व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थान का निर्माण भी किया जाएगा.
लेकिन यूनिस को इस पर संदेह है.
वो कहते हैं, "आप देख सकते हैं कि नाले का पानी सड़कों पर बह रहा है, सड़के ख़राब स्थिति में हैं, हमारे पास पीने के लिए पानी भी नहीं है, हम समुद्र से मछली भी नहीं पकड़ सकते, सुरक्षाकर्मी हर वक्त हमें परेशान करते हैं. सीपीईसी से हमें यही मिला है."
ग्वादर बंदरगाह प्राधिकरण का दावा है कि इस्टबे एक्सप्रेसवे के निर्माण में मछुआरा समुदाय के हितों का ख्याल रखा जाएगा. मछुआरों की सुविधा के लिए बंदरगाह का भी आधुनिकीकरण किया गया है. ग्वादर बंदरगाह प्राधिकरण इस दावे को भी ख़ारिज करता है कि इस निर्माण से इलाके में मछली पकड़ने की गतिविधि प्रभावित होगी.
नाखुदा अल्लाह बख्श को इससे मिलने वाले लाभ नहीं दिखते, वो तो बस इतना ही जानते हैं कि वो अब यहां के पानी में खुलकर मछली नहीं पकड़ सकते.
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