India Vs NZ : न्यूज़ीलैंड के बारे में कितना जानते हैं आप?

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    • Author, भरत शर्मा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत बनाम न्यूज़ीलैंड. क्रिकेट की दुनिया में जब-जब इस मुक़ाबले की बात आती है, तो तड़के होने वाले टेस्ट मैच और सबेरे की चाय के समय शुरू होने वाले वनडे मैच याद आते हैं.

लेकिन अगर आप क्रिकेट को हटा दें, तो न्यूज़ीलैंड के बारे में आप क्या जानते हैं? शायद बहुत कम. है ना? अगर ऐसा है तो भी झिझकने की बात नहीं है.

क्योंकि आप तो सिर्फ़ न्यूज़ीलैंड के बारे में कम ही जानते हैं, इतिहास की नज़र से देखें तो बहुत पुरानी बात नहीं, जब ये दुनिया न्यूज़ीलैंड के बारे में कुछ भी नहीं जानती थी.

दरअसल, न्यूज़ीलैंड दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत महासागर में स्थित एक संप्रभु देश है. इसके भूगोल की बात करें तो ज़मीन के दो बड़े टुकड़े हैं, जिन्हें नॉर्थ आइलैंड और साउथ आइलैंड कहा जाता है. और बीच में क़रीब 600 छोटे द्वीप हैं.

ऑस्ट्रेलिया से कितनी दूर?

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न्यूज़ीलैंड ऑस्ट्रेलिया से क़रीब 1500 किलोमीटर के फ़ासले पर है और दोनों देशों के बीच तस्मानिया सागर है. न्यू कैलेडोनिया, फ़िजी और टोंगा जैसे दूसरे द्वीपों से ये क़रीब एक हज़ार किलोमीटर दूर है.

ये देश इतना दूर है कि इंसानी बसावट भी यहां काफ़ी देर बाद पहुंची. न्यूज़ीलैंड की सरकारी वेबसाइट के मुताबिक यहां का इतिहास शानदार है, जिसमें माओरी और यूरोपीय संस्कृति का मिश्रण मिलता है.

न्यूज़ीलैड पहुंचने वाला सबसे पहला कबीला माओरी था. वो क़रीब एक हज़ार साल पहले हवाईकी से छोटी नौकाओं में सवार होकर यहां पहुंचे थे.

नीदरलैंड्स के रहने वाले एबल टैसमैन, इस देश को देखने वाले पहले यूरोपीय थे. हालांकि, वो ब्रिटेन था जिसने इस देश को अपने साम्राज्य का हिस्सा बनाया. माओरी जब न्यूज़ीलैंड आए तो उसे औटेरो का नाम दिया, जिसका मतलब होता है 'लंबे सफ़ेद बादल वाली ज़मीन.'

माओरी में कौन सबसे पहले पहुंचा?

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माओरी के मुताबिक़ यहां पहुंचने वाले पहले शख़्स का नाम था क्यूप. वो सितारों और समंदर की लहरों को नेविगेशनल गाइड के तौर पर इस्तेमाल करते हुए अपने पोलीनेशियन घर हवाईकी से केनोइ पर सवार होकर यहां पहुंचे थे. ऐसा माना जाता है कि ये घटना क़रीब एक हज़ार साल पुरानी है.

एक दिलचस्प बात ये है कि अगर आप नक्शे पर हवाईकी खोजेंगे तो निराशा हाथ लगेगी लेकिन ऐसी मान्यता है कि माओरी साउथ पैसिफ़िक ओशियन के किसी द्वीप या द्वीप समूह से यहां आए थे.

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क्यूप के बाद कई सैकड़ों साल तक दूसरे माओरी भी न्यूज़ीलैंड के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचे. ऐसा भी माना जाता है कि पोलीनेशिया से ये पलायन सुनियोजित था क्योंकि कई वाका हूरुआ यानी माओरी समाज के लोगों ने न्यूज़ीलैंड से हवाईकी का सफ़र भी किया.

माओरी समुदाय के लोग कुशल शिकारी और मछुआरे होते थे. उन्होंने ना केवल जानवरों, पंछियों और समंदर के जीवों का शिकार सीख लिया था बल्कि खेती करने में भी माहिर हो गए थे.

न्यूज़ीलैंड में यूरोपीय लोगों का आना

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न्यूज़ीलैंड में यूरोपीय लोगों के आने से पहले माओरी कबीलों के बीच युद्ध आम बात हुआ करती थी. माओरी योद्धा ताक़तवर और निडर हुआ करते थे और उन्होंने कई पारंपरिक हथियार तैयार करना सीख लिया था. आज भी इन्हें माओरी समारोहों में देखा जा सकता है.

माओरी के बाद अब बात न्यूज़ीलैंड के यूरोप से जुड़े तारों की. साल 1840 में वैतांगी संधि पर दस्तख़त हुए, जो ब्रिटिश क्राउन और माओरी के बीच हुए समझौते का आधार थी.

इस संधि ने न्यूज़ीलैंड में ब्रिटिश क़ानून की नींव रखी और इसे न्यूज़ीलैंड का आधारभूत दस्तावेज़ माना जाता है और इस देश के इतिहास का अहम हिस्सा भी.

उस वक़्त न्यूज़ीलैंड में क़रीब सवा लाख माओरी और दो हज़ार बाहरी लोग रहते थे, जो यूरोप से वहां जाकर बसे थे. पहले सील और व्हेल का शिकार करने वाले यूरोपीय यहां पहुंचे, फिर मिशनरी और उसके बाद कारोबारी.

फिर ब्रिटेन का हिस्सा बना

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जैसे-जैसे न्यूज़ीलैंड में यूरोपीय लोगों की तादाद बढ़ने लगी, माओरी के बीच ये डर भी बढ़ने लगा कि ज़मीन को लेकर उनके साथ होने वाली सौदेबाज़ी में गड़बड़ की जा रही है. ये ख़ौफ़ भी बढ़ गया कि अगर इसे वक़्त रहते नहीं रोका गया तो फ़्रांस जैसा देश न्यूज़ीलैंड पर कब्ज़ा कर सकता है.

साथ ही वो ब्रिटिश लोगों की गैरकानूनी हरकतों को भी रोकना चाहते थे.

ब्रिटिश सेटलमेंट बढ़ने के साथ-साथ ब्रिटिश सरकार ने माओरी कबीलों के प्रमुखों के साथ मिलकर औपचारिक दस्तावेज़ तैयार किया जिसके तहत न्यूज़ीलैंड को ब्रिटिश कॉलोनी बनाया गया.

वीडियो कैप्शन, यहां सरकार ने बनाई हैं ड्रग्स लेने की जगहें

लेकिन संधि पर दस्तख़त होने के बाद काफ़ी विवाद भी हुआ जिसकी सबसे बड़ी वजह ग़लत तर्जुमा. इन हिंसक टकराव को न्यूज़ीलैंड लैंड वॉर का नाम दिया गया.

इन विवादों को पीछे छोड़ने के लिए साल 1975 में वैतांगी ट्रिब्यूनल बनाया गया. हालांकि, इसे लेकर अब भी मतभेद हैं, लेकिन फिर भी ये काफ़ी अहम है.

कितनी आबादी, कितनी अमीरी?

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इतिहास के बाद अब आज के न्यूज़ीलैंड की बात. इस देश की आबादी क़रीब 44 लाख है, जिन्हें किवीज़ कहा जाता है. इनमें 69% यूरोपीय मूल के, 14.6% स्वदेशी माओरी, 9.2% एशियाई और 6.9% गैर माओरी पैसिफ़िक आइलैंडर हैं.

कुदरती ख़ूबसूरती की बात करें तो न्यूज़ीलैंड में ये इफ़रात में है. बर्फ़ से ढंके ग्लेशियर, हरियाले पहाड़, ख़ूबसूरत मैदानी इलाक़े, तालाब-झीलें, नीला आसमान, और समंदर का किनारा, यहां आपको सब कुछ मिलेगा.

अब जानवरों की बात. ऐसा कहा जाता है कि न्यूज़ीलैंड में इंसान के पहुंचने से पहले यहां काफ़ी शोर-शराबा हुआ करता था, वजह हरियाली की वजह से ख़ूब सारे पंछी.

दिलचस्प बात है कि वक़्त गुज़रने के साथ-साथ यहां के पंछियों के पंख गायब हो गए क्योंकि उन्हें शिकार करने वाले जानवरों का डर नहीं था और उड़ने की ज़रूरत भी नहीं थी. यानी एक समय रहा होगा जब कीवी भी उड़ता होगा.

जब माओरी और यूरोपीय न्यूज़ीलैंड पहुंचे, तो उन्होंने पंछियों का शिकार किया और अपने साथ चूहे भी लाए, जिन्होंने हमले करना शुरू किया. इस वजह से मोआ और हुइया जैसे कुछ पंछी ख़त्म भी हो गए.

क्रिकेट से आगे रग्बी

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खेलों की बात करें, तो क्रिकेट में न्यूज़ीलैंड हमेशा ताक़तवर टीम रही है और घर में उसे हराना कभी आसान नहीं रहा. वहां का दौरा करने वाले पूर्व भारतीय कप्तान भी ये बात मानते होंगे.

लेकिन न्यूज़ीलैंड का राष्ट्रीय खेल है रग्बी. अगर आप यूट्यूब पर न्यूज़ीलैंड का कोई रग्बी मैच देखेंगे तो शुरुआत में कीवी टीम का माओरी डांस भी दिखेगा, जो इस नए देश की पुरानी जड़ों का आभास भी देता है.

अब पैसे और कारोबार का ज़िक्र. पूर्व ब्रिटिश कॉलोनी न्यूज़ीलैंड एशिया-पैसिफ़िक क्षेत्र के सबसे समृद्ध मुल्कों में से एक है. साल 1980 के बाद यहां डीरेगुलेशन और निजीकरण अपनाया गया, जिसके बाद अर्थव्यवस्था के दरवाज़े खुले और निवेश बढ़ा.

भारत से रिश्ते कैसे

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कृषि के अलावा मैन्युफ़ैक्चरिंग, पर्यटन और जियोथर्मल एनर्जी संसाधन न्यूज़ीलैंड को मज़बूत बनाते हैं और साल 2010 के बाद से यहां की अर्थव्यवस्था लगातार बढ़ रही है. साल 2017 में यहां की प्रति व्यक्ति आय 36,560 पीपीपी डॉलर थी.

अब भारत और न्यूज़ीलैंड के कनेक्शन की बात. भारतीय विदेश मंत्रालय के मुताबिक क़रीब दो लाख भारतीय और भारतीय मूल के लोग न्यूज़ीलैंड में रहते हैं. इसके अलावा तीस हज़ार छात्रों ने पढ़ाई के लिए इस देश को चुना है. भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच साल 1952 में दोतरफ़ा रिश्तों की शुरुआत हुई थी.

दोनों देशों के बीच साल 2015 से 2018 के बीच दोतरफ़ा कारोबार लगातार बढ़ रहा है जो साल 2018 में 1.91 अरब डॉलर रहा था. भारत न्यूज़ीलैंड को फ़ार्मास्युटिकल दवाएं, कीमती धातु और आभूषण, कपड़ा, मोटर व्हीकल भेजता है और वहां से मिनरल फ़्यूल, वुड पल्प, ऊन और फल मंगाता है.

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