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'सऊदी अरब की महिलाएं पर्दे में हैं लेकिन बेअक्ल कठपुतली नहीं'
- Author, वात्सल्य राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"सऊदी अरब, ख़ासकर वहां की महिलाओं के बारे में कई ग़लत धारणाएं हैं. ये माना जाता है कि पुरुष हमें चलाते हैं लेकिन ये सही नहीं है."
नवंबर 2017 में मध्य पूर्व के ग्लोबल फोरम में शिरकत कर रहीं सऊदी अरब की एक युवती ने वहां महिलाओं की स्थिति को लेकर अपनी राय कुछ इस अंदाज़ में जाहिर की थी.
अगले साल यानी 2018 में सऊदी सरकार ने महिलाओं के हक़ में कई ऐसे फ़ैसले किए जिनसे लगा कि ये समाज महिलाओं को बंधन में जकड़े रहने को लेकर बनी अपनी छवि तोड़ने को लेकर गंभीर है.
इसे सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के 'विज़न 2030' का हिस्सा बताया गया. कई विश्लेषकों की राय है कि सऊदी अरब की असल सत्ता प्रिंस सलमान के ही हाथ में है और वो सऊदी शासन को तरक्की पसंद और उदारवादी चेहरा देना चाहते हैं.
सऊदी महिलाओं को वोट देने का अधिकार तो साल 2015 में ही मिल गया था. 2018 में उनके हाथों में ड्राइविंग सीट भी आ गई. फिर उन्हें सिनेमा और स्टेडियम में जाकर फुटबॉल मैच देखने की इजाज़त भी हासिल हो गई.
साल बदला और 2019 के पहले रविवार से नियम लागू हुआ कि सऊदी अरब में कोई पुरुष अपनी पत्नी को जानकारी दिए बिना तलाक़ नहीं ले सकेगा. यानी आगे से ऐसे 'सीक्रेट डिवोर्स' नहीं होंगे जिसके बारे में संबंधित महिला को जानकारी न हो.
महिलाओं के अधिकार पुरुषों के हाथ
लेकिन बदलते समाज की छवि को उस वक़्त धक्का लगा जब थाईलैंड के बैंकॉक में एक सऊदी युवती सामने आईं. रहाफ़ मोहम्मद अल-क़ुनून नाम की 18 बरस की इस युवती ने बताया कि वो अपने घर से भागकर आईं हैं और वापस नहीं जाना चाहतीं.
इसके साथ ही अचानक बहस का रुख सऊदी अरब के 'गार्डियनशिप सिस्टम' की ओर मुड़ गया. सऊदी अरब में भारत के राजदूत रहे तलमीज़ अहमद इसे सऊदी महिलाओं की राह की सबसे बड़ी रुकावट बताते हैं.
वो कहते हैं, "सऊदी अरब में जो तब्दीलियां हो रही हैं मैं उन्हें गंभीरता से नहीं ले पाता हूं. ये दिखावा है. सुधार का छलावा भर है. बुनियादी तौर पर वहां इस्लाम के नाम पर महिलाओं पर बहुत ज़्यादा सख्तियां हैं."
तलमीज़ अहमद कहते हैं, "जो सबसे मूल बात है, वो है गार्डियनशिप सिस्टम. यानी महिला क़ानूनी तौर पर कभी स्वतंत्र शख्सियत बन ही नहीं सकती है. उन्हें हमेशा एक पुरुष अभिभावक की ज़रूरत होती है. जब तक ये सिस्टम ख़त्म नहीं होगा तब तक वहां समानता नहीं आएगी."
क्या है गार्डियनशिप सिस्टम?
सऊदी क़ानून के मुताबिक़ कोई भी महिला अपने पुरुष अभिभावक की इजाज़त के बिना ज़िंदगी के कई काम नहीं कर सकती. पासपोर्ट बनवाने, विदेश यात्रा करने और शादी करने के लिए ही नहीं बैंक में अकाउंट खोलने और कोई बिज़नेस शुरू करने के लिए भी उन्हें किसी पुरुष रिश्तेदार की अनुमति लेनी ज़रूरी है.
अभिभावक पिता और पति के अलावा भाई या बेटे भी हो सकते हैं. कुछ बरस पहले समाजिक कार्यकर्ता मधु किश्वर ने सऊदी अरब का दौरा किया था. उन्होंने वहां की महिलाओं के जीवन को क़रीब से देखा था.
वो बताती हैं, "औरतों को पूरे नागरिक या पूरे इंसान का दर्ज़ा नहीं दिया जाता है. वहां दहशत है. पासपोर्ट के लिए भी आवेदन नहीं कर सकते हैं. ये नहीं कर सकते. वो नहीं कर सकते. कितनी चीजें हैं जो वो नहीं कर सकते."
तलमीज़ अहमद बताते हैं कि सऊदी महिलाओं पर ये तमाम पाबंदियां इस्लामिक क़ानून के नाम पर थोपी गईं हैं. हालांकि वो दावा करते हैं कि हक़ीकत में इसका इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं है.
वो कहते हैं, "सऊदी अरब ने अपने आप को एक बहावी देश बताया है. लेकिन किसी को नहीं मालूम कि बहाविया का क्या मतलब है? बहाविया तो एक धार्मिक 'वाद' है. जो कुछ भी हम सुनते हैं वो इस्लाम के नाम पर सामाजिक बाधाएं हैं. इसका इस्लाम से कुछ लेना-देना नहीं है."
तरक्की पसंद हैं महिलाएं
सऊदी अरब क़रीब 19 बरस पहले यानी साल 2000 में संयुक्त राष्ट्र के महाधिवेशन में सहमति दे चुका है कि वो अपने देश में महिलाओं के साथ भेदभाव ख़त्म करेगा. लेकिन अब भी वहां पैदा होने से लेकर आखिरी सांस तक महिलाएं पाबंदियों के घेरे में रहती हैं. लिंग के आधार पर होनी वाली असमानता में सिर्फ़ यमन और सीरिया जैसे देश ही उससे आगे हैं.
वहां जाने वाली विदेशी महिलाओं को भी पाबंदियों का सामना करना पड़ता है. सिर्फ़ राष्ट्र प्रमुख या फिर मिशेल ओबामा और मेलानिया ट्रंप जैसी फर्स्ट लेडी ही नियमों के परे दिखती हैं.
मधु किश्वर कहती हैं कि इन पाबंदियों के बाद भी सऊदी अरब की महिलाएं तरक्की के किसी पैमाने पर किसी भी जमात से पीछे नहीं हैं.
"कोई सोचे कि सऊदी महिलाएं बिल्कुल दबी कुचली हैं तो ये ग़लतफहमी होगी. हमें ज़्यादातर औरतों से ही मिलने ले जाया जाता था. जैसे महिला डॉक्टर, प्रोफ़ेसर, विमेन बिजनेस चैंबर, अच्छी खासी पढ़ी लिखी महिलाएं, आत्मविश्वास से भरी महिलाओं से मिलाया जाता था."
वो आगे कहती हैं, "आज भी मैं जब वो मंजर याद करती हूं तो मेरी आंखें फटी रह जाती हैं. हम मीटिंग में मिलते थे. फिर हमारे साथ रहकर जब वो बुर्के निकालती थीं तो अंदर वेस्टर्न कपड़े होते. हम भौंचक्के रह जाते थे. अगर किसी को लगे कि बुर्के और हिजाब के पीछे एक ब्रेनलैस पपेट है, तो ऐसी ग़लतफहमी वहां जाकर दूर हो गई."
सरकार की सख्ती
सऊदी अरब में साल 1979 में रुढिवादी ताक़तों के उभार के साथ 'गार्डियनशिप सिस्टम' के नियम सख्ती के साथ लागू हुए. लेकिन इसके बाद भी वहां 15 साल तक की लड़कियों के लिए शिक्षा अनिवार्य है. स्नातक की उपाधि लेने वालों में पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं की संख्या ज़्यादा है.
मधु किश्वर कहती हैं कि सपन्न परिवारों की महिलाएं तो शिक्षा हासिल करने के लिए पश्चिमी देशों का भी रुख करती हैं.
वे बताती हैं, "संपन्न परिवारों ने औरतों को अपने घरों में बंद नहीं किया. वो पढ़ी लिखी हैं. ये महिलाएं कोलंबिया यूनिवर्सिटी या ऑक्सफोर्ड में पढ़ रही हैं तो ज़ाहिर है वहां के तौर तरीके भी सीखेंगी. तो मुझे वहां की औरतों में एक स्प्लिट पर्सनालिटी दिखी, वो स्ट्रॉंग वूमेन हैं जो ज़्यादा दिन चुप बैठने वाली नहीं हैं, ये अंदेशा मुझे दस साल पहले ही हो गया था."
सऊदी अरब में अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने वाली महिलाओं की भी कमी नहीं है. साल 2016 में महिला संगठनों ने शाही कोर्ट में गार्डियनशिप सिस्टम के ख़िलाफ़ एक याचिका दी. इस पर 14 हज़ार महिलाओं ने दस्तख़्त किए थे.
लेकिन ऐसी कोशिशों को सरकार के स्तर पर ज़्यादा पसंद नहीं किया जाता है.
मधु किश्वर बताती हैं, "दहशत तो है. आप कह नहीं सकते कि कब क्रेकडाउन हो जाए और अब किस बात पर क्रेकडाउन हो जाए और आप बिल्कुल उड़ा दिए जाओ. छोटा सा एक उदाहरण देती हूं. एक मॉल में हम गए. तो मॉल का एक फ्लोर केवल महिलाओं के लिए सुरक्षित था. मैं महिला होने के नाते वहां चली गई. वहां मैंने देखा जिस किस्म के फैशनेबल कपड़े थे, वैसे तो मैंने कभी पेरिस में भी नहीं देखे होंगे. तो मैंने तुरंत फोटो खींचनी चाही. तो तुरंत दो गार्ड आए और उन्होंने मुझे दबोच लिया. आप पर बेहद क़रीबी निगाह रखी जाती है. एक फुसफुसाहट भी सरकार से छुपी नहीं रहती."
क्यों मुश्किल है सुधार होना?
सऊदी समाज को क़रीब से देखने वाले कई लोग मानते हैं कि सऊदी अरब में महिलाओं पर पाबंदी लगाकर दूसरे मक़सद हासिल करने की कोशिश की जाती है. सरकार सुधार की मांग को ख़तरे की तरह देखती है.
तलमीज़ अहमद कहते हैं, "सऊदी अरब में अभी सुधार की मांग की जा रही है. वहां शाही परिवार को फ़िक्र है कि अगर हम सुधार शुरू कर दें तो ये कहां तक जाएगा. फिर लोग मांग करेंगे कि शाही परिवार के विशेषाधिकार हमें क्यों बर्दाश्त करने चाहिए. वहां सारे अकाउंट पारदर्शी नहीं हैं. किसी को मालूम नहीं है कि आय कितनी है और खर्च कहां हो रहा है. लोग तो मांग करेंगे कि हमारी भागेदारी हुकूमत में होनी चाहिए. उसको रोकने के लिए वहां ये सारे प्रतिबंध हैं. महिलाओं को इसके लिए बहुत बड़ी कीमत अदा करनी पड़ रही है."
सुधार और महिलाओं के अधिकारों की आवाज़ उठाने वाले संगठनों की कई कार्यकर्ता जेल में है. लेकिन विरोध की आवाज़ें थम नहीं रहीं. तलमीज़ अहमद का दावा है कि मौजूदा स्थिति को लंबे वक़्त तक कायम रखना संभव नहीं होगा.
वो कहते हैं, "वहां की महिलाएं काबिल हैं. वो सम्मान की हक़दार हैं. आप देखेंगे कि कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां उनकी उपलब्धियां न हों. लेकिन सोशल अवरोधों से उनको दबाया जा रहा है. मुझे लगता है कि जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या के बाद सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की साख़ अब जा चुकी है. उनके ऊपर दबाव तो होगा. मैं उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूं जब वहां पर बुनियादी तब्दीली आएगी. उस वक्त आप देखेंगे कि महिलाएं आगे आएंगीं और वो एक सामान्य समाज बन जाएगा."
तीन करोड़ बीस लाख जनसंख्या वाले सऊदी अरब की क़रीब आधी आबादी भी एक ऐसे ही दिन की सुबह देखना चाहती है.
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