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ग्रीनलैंड: 12वां सबसे बड़ा देश पर आबादी 56 हज़ार, चीन की नज़र क्यों
चीन हजारों किलोमीटर दूर एक ऐसी जगह पर पैर पसार रहा है, जिसने अमरीका की चिंताएं बढ़ा दी हैं.
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के कारण चीन के कारोबारियों और राजनेताओं का एशिया, अफ़्रीका और लातिन अमरीका में हर जगह दख़ल है.
अब चीन दुनिया के सुदूर हिस्से आर्कटिक में दिलचस्पी दिखा रहा है. आर्कटिक सर्कल से बीजिंग की दूरी 3,000 किमी. (1,800 मील) है लेकिन चीन वहां निवेश के नए आयाम ढूंढ रहा है.
चीन ने आर्कटिक की बर्फ़ से सामान की आवाजाही के रास्ते बनाने के लिए कई आइसब्रेकर्स (बर्फ़ पर चलने वाले जहाज) ख़रीद लिए हैं या वहां भेज दिए हैं. इनमें परमाणु शक्ति से चलने वाले आइसब्रेकर्स भी शामिल हैं.
इस काम को अंजाम देने के लिए चीन की नज़र ग्रीनलैंड पर है. यहां चीन अपने पोलर सिल्क रोड पर स्टेशन बनाने की संभावनाएं ढूंढ रहा है.
ग्रीनलैंड एक स्व-शासित देश है लेकिन ऊपरी तौर पर डेनमार्क का उस पर नियंत्रण है.
यह अमरीका के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, जो सुदूर उत्तर में थियूल में अपना बड़ा सैन्य ठिकाना बना रहा है. इसके चलते अमरीका और डेनमार्क दोनों की परेशानी बढ़ गई है.
सबसे कम जनसंख्या वाला देश
क्षेत्रफल के मामले में ग्रीनलैंड दुनिया का 12वां सबसे बड़ा देश है और ब्रिटेन से 10 गुना ज़्यादा बड़ा है. इसके 20 लाख वर्ग किमी. में चट्टान और बर्फ़ हैं.
ग्रीनलैंड की जनसंख्या सिर्फ़ 56 हज़ार है जो इंग्लैंड के लगभग एक शहर के बराबर है. यहां की 88 प्रतिशत जनसंख्या इनूएट की है और बाक़ी डेनिश (डेनमार्क की भाषा बोलने वाले) लोग रहते हैं.
पिछले कई सालों में अमरीकियों और डेनमार्क के लोगों ने ग्रीनलैंड और उसकी राजनधानी नूक में ज़्यादा पैसा नहीं लगाया है. वहां की आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है.
हर दिन यहां एक जगह पर कुछ लोग इकट्ठे होकर सामान बेचते हैं, जिससे कुछ नक़दी इकट्ठा होती है. यहां कपड़े, स्कूलबैग, केक, सूखी मछली और रेंडियर के सींग बिकते हैं.
वर्तमान में आप सिर्फ़ छोटे विमानों में ही नूक जा सकते हैं. लेकिन, चार साल में यहां काफ़ी कुछ बदलने वाला है.
ग्रीनलैंड की सरकार ने तीन बड़े अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट बनाने का फ़ैसला लिया है जहां पर बड़े यात्री विमान उतारे जा सकेंगे.
चीन इन एयरपोर्ट के कॉन्ट्रैक्ट पाने की कोशिश कर रहा है.
डेन्स और अमरीकियों का दबाव है कि ये कॉन्ट्रैक्ट चीन के हाथ में न जाएं. लेकिन, इसके बावजूद चीन ग्रीनलैंड में अपनी सक्रियता कम नहीं करने वाला है.
वहीं, अमरीका और डेनमार्क के लिए एक मुश्किल ये भी है कि ग्रीनलैंड में चीन को लेकर लोगों की राय बंटी हुई है. जहां डेनिश लोगों को चीन की मौजूदगी से डर है वहीं, इनूएट इससे एक अच्छी शुरुआत मान रहे हैं.
ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री ने चीन को लेकर उनकी सरकार के नज़रिए पर कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया है लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री कूपैक क्लाइस्ट ने कहा कि यह ग्रीनलैंड के लिए अच्छा होगा.
डेनिश गठबंधन की सरकार मुख्य वेंस्ट्रॉ पार्टी के विदेश मामलों के प्रवक्ता माइकल ऑस्ट्रप यनसन ग्रीनलैंड में चीन की भागीदारी को लेकर साफ़तौर पर अपनी राय जाहिर करते हैं.
वह कहते हैं, ''हम अपने बगल में साम्यवादी तानशाही नहीं चाहते.''
चीन के निवेश की क़ीमत
जहां चीन की कंपनियां व्यापार करती हैं वहां वो उस तरह का बुनियादी ढांचा देने की पेशकश करते हैं, जिसकी उस देश को सख़्त ज़रूरत हो. जैसे एयरपोर्ट, सड़क और साफ़ पानी.
जिन पश्चिमी शक्तियों ने इन देशों पर शासन किया उन्होंने यहां ख़ासी मदद नहीं की और इन देशों को अब चीन की मदद काफ़ी पसंद आई है.
लेकिन, ये मदद कुछ क़ीमत के साथ आती है.
चीन को इन देशों के कच्चे माल, मेटल, लकड़ी और ईंधन तक पहुंच हो गई है. यहां तक कि इससे स्थानीय लोगों को भी लंबे समय तक काम नहीं मिला है. बड़ी संख्या में चीन के लोग यहां काम करने के लिए लाए जाते हैं.
एक बाद एक कई देशों को ये पता चला है कि चीन के निवेश से उस देश को कम और चीन को ज़्यादा फ़ायदा हुआ है.
दक्षिण अफ़्रीका इसका एक उदाहरण है जहां ये शिकायतें की जा रही हैं कि चीन की भागीदारी से वहां भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला है.
लेकिन, नूक में लोगों को इस तरह की बातें समझा पाना मुश्किल है.
इस बड़ी और ख़ाली जगह को एक बड़ी राशि का इंतज़ार है, जो वहां आने वाली है. कूपैक क्लाइस्ट साफतौर पर कहते हैं, ''जैसा कि आप देख रहे हैं, हमें इसकी ज़रूरत है.''
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